षडयंत्र और छल में बहुत ताकत होती है

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संजय सिन्हा :

मुझे लगता है कि अगर राणा सांगा को उन्हीं के एक मंत्री ने छल से जहर नहीं दे दिया होता तो बाबर कभी दिल्ली पर शासन नहीं कर पाता।

तैमूरवंशी बाबर को दिल्ली पर कब्जा दिलाने के लिए राणा सांगा के एक मंत्री ने उनके भोजन में जहर मिलवा दिया और जहर की एक पुड़िया से बाबर के लिए दिल्ली पर सिर्फ फतह करना ही आसान नहीं हो गया, बल्कि अगले ढाई सौ साल उसने अपने वंशजों के नाम कर लिया। 

मुझे नहीं पता कि विश्रवा का सबसे छोटा बेटा विभीषण सचमुच राम भक्त था या फिर अपने बड़े भाई की शक्ति से जलता था, लेकिन इतना सुना है कि उसी ने रावण की नाभि का राज राम को बताया था। विश्रवा के तीनों पुत्र – रावण, कुंभकरण और विभीषण ईश्वर के भक्त थे। ब्रह्मा की गहन तपस्या कर तीनों ने वर माँगा था। रावण ने तीन लोकों में खुद को सबसे शक्तिशाली बन जाने का वर मांग लिया था, कुंभकरण ने छह महीने की नींद मांग ली थी और विभीषण ने ईश्वर की भक्ति मांग ली थी। 

रावण तीन लोकों पर शासन करने लगा।

जिस दिन हनुमान जी लंका में घुसे रावण के लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। रावण उन्हें बिना अनुमति के दूसरे राज्य में घुसने की बड़ी सजा दे सकता था, लेकिन विभीषण ने समझाया कि दूत को सजा नहीं देनी चाहिए। यहीं से रावण के राज्य की सुरक्षा का छेद सबकी नजर में आ गया। ये बात उसी दिन समझ में आ गई कि सात पहरों और अकूत शक्ति के बावजूद रावण के विनाश का दरवाजा विभीषण के घर से होकर गुजरेगा। 

आप सब लोगों को लगता होगा कि संजय सिन्हा अक्सर इतिहास कहां से लाकर सिर पर पटक देते हैं, लेकिन क्या करूं, इतिहास इकलौता विषय है, जिसके गर्भ में भविष्य छिपा होता है। अगर आप भारत में मुगलों और अंग्रेजों का इतिहास पढ़ेंगे तो हैरान रह जाएँगे कि मुगलों को भारत पर राज करने का मौका ही मिला राणा सांगा के एक मंत्री के छल की वजह से। और जिस छल का इस्तेमाल बाबर ने अपने हित में किया था, वही छल ढाई सौ साल के बाद अंग्रेजों ने उनकी बिरादरी के साथ कर दिया। 

ईस्ट इंडिया कंपनी जब बंगाल में व्यापार करने पहुंची तो उनके भीतर सत्ता की आकांक्षा हिलोरें मारने लगीं। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो वहां के नवाब को धोखा दे सके। अंग्रेजों को मीर जाफर के रूप में वो व्यक्ति मिल गया। वो वहां के नवाब सिराजुद्दौला को धोखा देने के लिए तैयार हो गया और रॉबर्ट क्लाइव से समझौता कर लिया कि अगर उसे बंगाल का नवाब बनने का मौका मिले तो वो ‘गद्दार ए अबरार’ बनने को तैयार है। 

अंग्रेजी कप्तान रॉबर्ट क्लाइव ने उसे बंगाल का नवाब बनाना कबूल कर लिया और 1757 में पलासी की लड़ाई में मीर जाफर ने सिराजुद्दौला के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सिराजुद्दौला को ये बात समझने में सिर्फ आठ घंटे लगे और 23 लोगों की जान गंवानी पड़ी कि जब अपना ही दगा दे दे, तो इस संसार में कोई युद्ध नहीं जीता जा सकता है। उसने अंग्रजों से लोहा लेने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसकी निगाहें मीर जाफर से मिलीं, वो समझ गया कि अब बच पाना नामुमकिन है। कोई अपना है, जो दुश्मनों से जा मिला है। उफ! राणा सांगा का वो जहरीला मंत्री ढाई सौ सालों बाद मीर जाफर के रूप में फिर जीवित हो उठा था। 

सिराजुद्दौला ने हार को गले लगा लिया और दो सौ साल के लिए भारत अंग्रेजों का हो गया। 

इतिहास भरा पड़ा है ऐसी कहानियों से। पौराणिक कहानियां भरी पड़ी हैं ऐसे उदाहरणों से। लेकिन हम फिर भी नहीं समझ पाते। हम समझ ही नहीं पाते कि कौन विभीषण है, कौन राणा सांगा का मंत्री है, कौन मीर जाफर है। 

इस संसार में दुश्मनों को पहचान लेना मुश्किल काम नहीं, मुश्किल काम है दोस्त के चेहरे में छिपे दुश्मन को पहचान पाना। इस संसार में दुश्मनों से डरने की दरकार नहीं होती, दरकार होती है दोस्त के रूप में छिपे दुश्मन से बचने की। इतिहास की कहानियाँ पढ़ाते हुए मेरे टीचर हमेशा समझाते थे कि सत्ता का पूरा खेल षडयंत्र की मोहरों से खेला जाता है। सत्ता चाहे व्यावसाियक हो, या राजनैतिक। इसकी शुरुआत चाहे जहां से हो, इस खेल के सारे मोहरे षडयंत्र की कोख से पैदा होते हैं। इसीलिए जब सत्ता की बात आती है, तो षडयंत्र बहुत बेशर्म होकर नंगा नाच करने लगता है। 

मुझे नहीं पता कि मेरे टीचर बार-बार ये क्यों समझाते थे कि दुनिया में कोई भी युद्ध बहादुरी के बल पर नहीं जीता जाता, युद्ध जीता जाता है छल से। शक्ति में अगर छल न मिलाया जाए तो शक्ति का अपना कोई वजूद होता ही नहीं। मेरे टीचर कहते थे कि षडयंत्र और छल ने ही इस कहावत को सार्वभौमिक बनने का अवसर दिया है कि युद्ध में सब जायज है। 

कल मैंने दिल्ली में वोट दिया। अधूरे राज्य की दिल्ली के लिए इन दिनों यहाँ जंग चल रही है। वोट देकर जब मैं वापस आया तो मेरे स्कूल के टीचर मेरे घर पर बैठे थे। पूछने लगे कि लोकतंत्र का धर्म निभा आए? उंगली में लगी स्याही की तस्वीर फेसबुक पर चिपका कर खुद के लोकतांत्रिक देश के सिपाही होने का फर्ज निभा आए?

मैं उनकी ओर देखता रहा। टीचर कहने लगे, तुम अच्छा करते हो राजनीति पर नहीं लिखते। अगर तुम राजनीति पर लिखते तो मैं तुम्हें सारे नतीजे आज ही बता देता, कि कैसे मीर जाफर ने सिराजुद्दौला को परास्त करने के लिए ‘गद्दार ए अबरार’ बनना मंजूर किया। मैं तुम्हें बता देता कि राणा सांगा के किस मंत्री ने उन्हें खाने में जहर देना कबूल किया। मैं तुम्हें बता देता कि विभीषण ने कैसे अपने त्रिकालदर्शी भाई की नाभि का राज बता कर उसे मिले वरदान का मोल भी मिटा दिया। टीचर बोलते जा रहे थे कि तुम राजनीति पर नहीं लिखते, इसलिए तुम्हें बताने से कोई फायदा नहीं। तुम तो रिश्तों की कहानी लिखते रहो, दिल्ली की राजनीति में तुम जैसे लोग सिर्फ उँगली में स्याही लगाने के लिए पैदा होते हैं। स्याही लगवा ली न, बस मस्त रहो। 

मेरे मन में ढेर सारे सवाल थे, पर टीचर चले गए। टीचर के जाने के बाद से मैं लगातार सोच रहा हूँ कि क्या सचमुच उँगली में लगी स्याही से ज्यादा ताकत छल और षडयंत्र में होती है? अगर ऐसा है तो फिर तो नतीजे जो भी आएँ, जीत मीर जाफर, विभीषण और राणा सांगा के मंत्री की होगी। आदमी गैरों से लड़ कर जीत सकता है, अपनों से तो उसे हारना ही पड़ता है।

देश मंथन (09-02-2015)

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