कुलधरा – पालीवाल ब्राह्मणों का एक अभिशप्त गाँव

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विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार:  

एक गाँव जो कभी आबाद था। हजारों लोग रहते थे। सुबह शाम संगीत गूंजता था। पर अब सिर्फ खंडहर। हम बात कर रहे हैं कुलधरा की। आज इसकी गिनती देश के कुछ प्रमुख भुतहा स्थलों में होती है।

 

जैसलमेर आने वाले ज्यादातर सैलानी रेगिस्तान जरूर देखना चाहते हैं। अक्सर शाम को लोग जैसलमेर शहर से 40 किलोमीटर दूर सम सैंड ड्यून्स का रूख करते हैं। इस रास्ते में आता है कुलधरा गाँव। यह गाँव अब सैलानियों का प्रमुख आकर्षण है। देखने के नाम पर यहाँ अब सिर्फ खंडहर है। पर ये खंडहर चुपचाप एक दास्तां सुनाते हैं।

कुलधरा कभी पालीवाल ब्राह्मणों का आबाद गाँव हुआ करता था। यहाँ 600 परिवार रहते थे। पर यह एक ऐसा गाँव है जो रात ही रात में वीरान हो गया था। आखिर क्या थी कहानी। क्यों खाली हो गया गाँव। इसके पीछे गाँव की इजज्त का सवाल था। आप कल्पना कर सकते हैं कि एक लड़की की सुन्दरता न केवल उसके परिवार को बल्कि एक साथ 84 गाँवों को रातों रात सुनसान उजाड़ में बदलने पर मजबूर कर देगी। जैसलमेर के पास स्थित इस कुलधारा की कुछ ऐसी ही कहानी है।

दीवान सालम सिंह की बुरी नजर 

कुलधरा को जिस व्यक्ति की बुरी नजर लग गयी, वो शख्स था रियासत का दीवान सालम सिंह। गाँव के एक पुजारी की बेटी पर सालेम सिंह इस कदर मोहित हो गया कि वह उससे शादी करने की जिद पर आ गया। गाँव वाले इसके लिए तैयार नहीं थे। सालेम सिंह ने उस लड़की से शादी करने के लिए गाँव के लोगों को चंद दिनों की मोहलत दी। अब ये लड़ाई गाँव की एक कुंवारी लड़की के सम्मान की बन गयी थी और गाँव के आत्म सम्मान की भी।

और रातों रात खाली हो गया गाँव 

गाँव की चौपाल पर पालीवाल ब्राह्मणों की बैठक हुई और 5000 से ज्यादा परिवारों ने अपने सम्मान के लिये जैसलमेर की रियासत छोड़ने का फैसला ले लिया। अगली शाम कुलधरा गाँव को सारे लोग छोड़ कर चले गये। रह गई सिर्फ विरानगी। आज परिंदे भी उस गाँव की सरहदों में दाखिल नहीं होते। कुलधरा पहुँचने पर आपको अब तमाम घरों के खंडहर दिखाई देते हैं। बीच में चौड़ा रास्ता और दोनों तरफ व्यवस्थित तरीके से बने मकानों की ईंटे इस बात की गवाही दे रही हैं कि कभी यहाँ कितना गुलजार मौसम रहा होगा। लोग बताते हैं कि गाँव छोड़ते वक्त उन ब्राह्मणों ने इस जगह को श्राप दिया था कि यह जगह कभी फलेगा फूलेगा नहीं।

कहा जाता है कि पालीवाल ब्राह्मण काफी अमीर थे। उन्होने काफी सोना जमीन में गाड़कर रखा हुआ था। गाँव खाली होने के बाद काफी लोग यहाँ सोने की तलाश में आए और खुदाई करके सोना ले गये।

रुहानी ताकतों का बसेरा 

कहा जाता है कि उस समय से लेकर आज तक ये वीरान गाँव रूहानी ताकतों के कब्जे में है। अक्सर यहाँ आने वालों को इन रुहानी ताकतों का एहसास होता है। बदलते वक्त के साथ 82 गाँव तो दोबारा आबाद हो गए, लेकिन दो गाँव तमाम कोशिशों के बावजूद आबाद नहीं हो सके। इनमें से एक है कुलधरा और दूसरा खाभा।

अब ये दोनों गाँव भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं। इन गाँवों को दिन सैलानियों के लिए खोल दिया जाता है। यहाँ सैकड़ों पर्यटक आते हैं। पर रात में यहाँ आने की मनाही है। पर इस गाँव में एक मंदिर है जो आज भी श्राप से मुक्त है। एक बावड़ी भी है जहाँ से लोग तब पानी लिया करते थे। कहा जाता है कि शाम ढलने के बाद अक्सर यहां कुछ आवाजें सुनाई देती हैं। लोग मानते हैं कि वो आवाजें दो सौ साल पहले के पालीवाल ब्राह्मणों का रुदन है। यह भी कहा जाता है कि गाँव के कुछ मकान हैं, जहां रहस्यमय परछाई अक्सर नजरों के सामने आ जाती है।

कैसे पहुँचे 

जैसलमेर शहर से कुलधरा की दूरी 18 किलोमीटर है। अब कुलधरा को सैलानियों के लिए विकसित किया जा रहा है। सैलानियों से 10 रुपये प्रति व्यक्ति प्रवेश टिकट लिया जाता है। वहीं प्रति वाहन 50 रुपये प्रवेश टिकट है। 

कुलधरा में एक घर को दोबारा निर्मित किया गया है जिससे आप अतीत में गुलजार रहे इस गाँव को महसूस कर सकें। यहाँ पहुँचने वाले लोग इस घर के साथ खूब तस्वीरें खिंचवाते हैं। पर शाम ढलने से पहले यहाँ से निकल जाना पड़ता है। कुलधरा में रात में प्रवेश की बिल्कुल इजाजत नहीं है।

(देश मंथन,  01 अप्रैल 2017)

 

 

 

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