मकान ले लो, मकान

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मैं मित्र के पिताजी के मकान में गया हूँ। ठीक ठाक है। तीन कमरे हैं। एक कमरे में माँ और पिताजी रहते हैं। एक कमरा मेरे मित्र का है और एक कमरा मेहमानों के लिए है। मैंने मित्र से पूछा कि तुम्हें इससे अधिक और क्या चाहिए? तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों नौकरी में हैं। दोनों दिन भर बाहर रहते है। रात में जब तुम घर आते हो तो माँ-बाप प्यार से तुम दोनों से मिलते हैं। और तुम्हें पूरा घर क्यों चाहिए? एक कमरा तुम्हारे लिए पर्याप्त है। वैसे पूरा घर ही तुम्हारा है। 

पर मेरा मित्र मेरी बात से सहमत नहीं हुआ। उसने कहा कि उसे अपना घर चाहिए। अलग घर। 

मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की। ये तक समझाया कि माँ-पिताजी अकेले रह जाएंगे, उन्हें बुरा लगेगा। इतने प्यार से उन्होंने तुम्हें पाला है, तुम्हें पढ़ाया-लिखाया है। तुम अब उन्हें अकेला छोड़ दोगे तो उन्हें दुख होगा। और फिर तुम्हारा दफ्तर भी वहाँ से दूर नहीं। तुम पति-पत्नी काम पर जाते हो, घर लौट कर आते हो तो कोई तुम्हारा इंतजार करता मिलता है। माँ तो खाना भी बना कर रखती है। तुम अलग मकान मत लो। तुम साथ ही रहो। दोनों के लिए एक दूसरे का साथ अच्छा है। 

मेरा मित्र संजय सिन्हा का ज्ञान चुपचाप सुनता रहा। सारी बातें सुनने के बाद उसने धीरे से कहा कि उसकी पत्नी की माँ से नहीं बन रही। वो रोज मुझ पर दबाव डाल रही है कि अलग घर ले लो। उसका कहना है कि सबके अपने-अपने मकान होने चाहिए। उसकी दलील है कि यही उम्र जीने की होती है। ऐसे में हम वो सब पिताजी के मकान में रह कर नहीं कर सकते जो हम करना चाहते हैं।

मेरी एक बुरी आदत है। मैं माँ से अलग होने की बात सुनते ही किसी को बीच में टोक देता हूँ। मैंने अपने मित्र को भी टोक दिया। 

“तुम्हारी पत्नी ऐसा क्या करना चाहती है जिसके लिए तुम अपनी माँ को छोड़ने पर राजी हो गये हो?”

“संजय जी, मैं क्या-क्या बताऊं। उसे अपनी सहेलियों को पार्टी देने का मन है। वो कहती है कि उसे देर रात डाँस करने का मन करता है। वो पता नहीं क्या-क्या करना चाहती है, बस मैं रोज-रोज की किचकिच से तंग आ चुका हूँ। मुझे अब अलग मकान चाहिए।”

मैं अपने मित्र के चेहरे पर तनाव की लकीरें साफ-साफ पढ़ सकता था। 

मैं समझ रहा था कि मेरा मित्र दरकते रिश्तों की उहापोह में उलझ गया है। वो माँ को छोड़ना नहीं चाहता, पर पत्नी माँ के साथ रहना नहीं चाहती। उसने यकीनन बहुत कोशिश की होगी, पर बात नहीं बनी। अब उसे अलग मकान चाहिए और इसके लिए मेरी मदद।

मैं उसे अपने साथ लेकर कल एक ब्रोकर के पास गया। 

ब्रोकर ने हमें कई मकान दिखलाये। पर मकान बहुत महंगे हो गये हैं। मेरा मित्र कह रहा था कि पिछले दिनों जो नोटबंदी हुई थी, उसके बाद उसने सुना था कि मकान सस्ते हो गये हैं, पर कहाँ सस्ते हुए हैं? 

मैंने कहा कि मकान कभी सस्ते नहीं होने वाले। हाँ, कैश की कमी से थोड़ी सुस्ती जरूर आई होगी, पर मकान के दाम कभी कम नहीं होंगे।

मेरा मित्र मेरी ओर हैरान निगाहों से देख रहा था। वो यही सोच रहा होगा कि संजय सिन्हा तो ऐसे बातें कर रहे हैं जैसे प्रॉपर्टी के अर्थशास्त्र के वही ज्ञाता हैं। वही अर्थ जगत के भविष्यवक्ता हैं। दुनिया कह रही है कि मकान के दाम कम हुए हैं, संजय सिन्हा कह रहे हैं कि मकान के दाम कभी कम नहीं होने वाले। 

मेरे मित्र ने कुछ रुक कर कहा, “यार, सच में सुना था कि मकान सस्ते हुए हैं, पर मकान सस्ते मिल नहीं रहे। तुम ठीक ही कह रहे हो, मकान के दाम कम नही होंगे। पर ऐसा क्यों? मैंने तो ये भी सुना था कि मकान ज़्यादा बन गये हैं, कोई खरीदार नहीं है। फिर ये ब्रोकर मकान इतने महँगे क्यों बता रहा है?”

मैंने बहुत धीरे से कहा कि मकान की कीमत तुम जैसे लोगों की वजह से नहीं कम हो रही। मकान की कीमत तुम जैसे लोग कभी कम नहीं होने देंगे। आदमी के दरकते रिश्तों का लाभ ये बिल्डर ही तो उठा रहे हैं। 

बहुत पहले एक घर होता था। सब उसमें साथ रहते थे। फिर रिश्तों में आजादी की नयी परिभाषा का जन्म हुआ कि हमारा नहीं, मेरा मकान होना चाहिए। बिल्डर ने इस नयी सोच का फायदा उठाया। वो सीमेंट, कंक्रीट के सपने बेचने लगे। वो आदमी के टूटते रिश्तों में मुनाफा कमाने लगे। और तुम कोई आखिरी बेटा थोड़े न हो, जो अपने पिता का घर छोड़ कर अलग मकान खरीदने निकले हो? कुछ साल बाद तुम्हारा बेटा भी तुम्हारा घर छोड़ कर अपने लिए मकान ढूंढने निकलेगा। जब सबको अपना मकान चाहिए होगा, तो फिर मकान के दाम कम कैसे होंगे? वैसे तुम इन बातों की चिंता छोड़ो। ये चिंता संजय सिन्हा के हिस्से में है। रिश्तों की बातों का तुम्हारे लिए कोई अर्थ नहीं। तुम तो अपना बजट बताओ, अपना मकान खरीदो।

(देश मंथन, 01 मई 2017)