हर हाल में खुश रहना सीखों

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लंबी कविता थी और मास्टर साहब इसे गा कर पढ़ाते थे। कहते थे कि हम सब जीवन में किसी से कुछ न कुछ सीख सकते हैं। हमें अपनी सोच सकारात्मक रखनी चाहिए और जिसमें जो अच्छी बातें हैं, उन्हें जीवन में अपनाना चाहिए। मास्टर साहब की बातें सुन कर मैं स्कूल से घर आता और माँ की गोद में दुबक कर पूछता “माँ, क्या सबसे कुछ न कुछ सीखा जा सकता है?” 

माँ मुस्कुराती और कहती, “हाँ, सभी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। जिससे मिलो, उसकी अच्छाई देखो। एक बार अच्छाई देखने की आदत पड़ जाएगी, फिर सभी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है।”

“माँ, मास्टर साहब कहते हैं कि आदमी चाहे तो फूलों से हंसना सीख सकता है और भौरों से गाना। क्या भौरें गाना गाते हैं?” 

“हाँ, बेटा। भौंरे गुनगुन करते हैं, ये उनका गाना ही तो है। उनकी भाषा अलग है, पर उसमें संगीत तो है ही।”

मैं माँ के दुलार में डूबा हुआ पूछता कि माँ और किससे क्या-क्या सीखा जा सकता है? 

माँ मास्टर साहब की कविता को आगे बढ़ाती और कहती, “सीख हवा के झोकों से लो, हिलना और हिलाना। दूध और पानी से सीखो, मिलना और मिलाना।”

“पर माँ, दूधवाला जब दूध में पानी मिलाता है, तो तब आप उसे डांटती हैं।”

“दूध में पानी मिलाना दूधवाले की बेइमानी है, लेकिन सीखने वाला तो इससे भी सीख ही सकता है कि दूध और पानी कितनी आसानी से मिल जाते हैं। यही है सकारात्मक सोच।”

माँ इस कविता को थोड़ा और आगे बढ़ाती और जब वो कहती, “मछली से सीखो स्वदेश के लिए तड़प कर मर जाना। पतझड़ के पेड़ों से सीखो, दुख में धीरज धरना” तो मैं एकदम चुप हो जाता। 

सचमुच मछली पानी से अलग हो कर नहीं जी सकती। अपने वतन से अलग हो कर कोई नहीं जी सकता। 

सीखने और सिखाने का ये पाठ मनुष्य जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। आदमी हर किसी से कुछ न कुछ सीखता ही है। ऐसे में संजय सिन्हा को जब मास्टर साहब स्कूल में पढ़ाते, “सूरज की किरणों से सीखो जगना और जगाना, लता और पेड़ों से सीखो सबको गले लगाना” तो उनके लिए जिंदगी के मायने एकदम बदल जाते। 

और जब मास्टर साहब सभी बच्चों को समझा रहे थे, “पृथ्वी से सीखो प्राणी की सच्ची सेवा करना। दीपक से सीखो, जितना हो सके अँधेरा हरना” तब संजय सिन्हा जिंदगी में इसे आत्मसात कर रहे थे। संजय सिन्हा ये समझने लगे थे कि सीखने वाले सचमुच धरती, दीपक , फूल और भौंरे से भी जिंदगी जीने का तरीका सीख सकते हैं। 

अब आप ये सोच रहे होंगे कि संजय सिन्हा आज ये सीखने और सिखाने की कहानी लेकर क्यों आ गये हैं, तो मैं ये सफाई देता चलूं कि बात इतनी सी है कि कोई भी जब मेरे घर आता है और लॉबी से होता हुआ ड्राइंग रूम तक पहुंचता है तो कमरे में बाईं ओर एक टेबल पर पड़ी ढेर सारी तस्वीरों को देख कर सोच में पड़ जाता है। ये तस्वीरें हैं अमिताभ बच्चन की, प्रियंका चोपड़ा की, करीना कपूर की, शाहरुख खान की, विद्या बालन की, ऋतिक रोशन की… और भी ढेरों फिल्मी हीरो-हीरोइन के साथ संजय सिन्हा की। 

कई लोग हैरान निगाहों से मेरी ओर देखते हैं। कुछ पूछ लेते हैं कि मुझे सिनेमा वालों से इतना प्यार क्यों है, कुछ नहीं पूछते पर मन ही मन सोच में पड़ जाते हैं। आखिर ये सिनेमा वाले कोई नेता नहीं हैं, कोई महान लेखक नहीं हैं, कोई वैज्ञानिक नहीं हैं, इन्हें आदमी चाहे छिप-छिप कर जितना देखे, पर इन्हें कोई गंभीर आदमी यूं सार्वजनिक रूप से गले नहीं लगाता, फिर संजय सिन्हा इनकी तस्वीरों को इतना सजा कर क्यो रखे हुए हैं? 

बात तो सही है। मैं चाहे तो दुनिया भर के तमाम बड़े लोगों के साथ तस्वीर खिंचवा कर घर में टाँग सकता हूँ। फिर इन नाचने-गाने वालों से इतना प्यार क्यों? किसी गंभीर आदमी को ये शोभा नहीं देता कि वो घर में सिनेमा वालों की तस्वीर लटाकाए फिरे। 

पर मैं क्या करूं? मैं इन सिनेमा वालों से जिंदगी को जीना सीखता हूँ। 

सिनेमा के कलाकारों को जब आप जानेंगे, इनसे बात करेंगे तो आप पाएंगे कि ये हमेशा खुश रहते हैं। ये अपना दुख किसी से ज़ाहिर नहीं करते। ये कभी रोते नहीं। ये हर परिस्थिति में, हर हाल में तैयार, खुशबुओं में लिपटे रहते हैं। ज़्यादातर सिनेमा वाले अपने साथियों की न शिकायत करते हैं न बुराई। ये अपने मन के भाव को छिपा कर हमेशा जिंदगी की खुशियों को जीते हुए नजर आते हैं। 

मैंने इनसे यही सीखा है। 

ये सिनेमा में क्या करते हैं, उससे अधिक मैंने इनसे निजी जिंदगी में जीना सीखा है। मास्टर साहब ने तो कविता में पढ़ाया था, “जलधारा से सीखो आगे जीवन पथ पर बढ़ना, धुएं से सीखो हरदम ऊंचे ही पर चढ़ना”। 

मैंने इन सिनेमा वालो से सीखा है हर हाल में खुश रहना। मैंने सिनेमा वालों से सीखा है सब पर अपना रंग चढ़ाना। 

“वर्षा की बूंदों से सीखो सबसे प्रेम बढ़ाना। मेहंदी से सीखो सब ही पर अपना रंग चढ़ाना।”

(देश मंथन, 02 मई 2017)