बच्चा बाबू का जहाज और एलसीटी सेवा

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विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

रेलवे स्टीमर के अलावा पटना और पहलेजा घाट के बीच लोगों के लिए दो और स्टीमर सेवा चलती थी। बाँस घाट से बच्चा बाबू की स्टीमर सेवा भी काफी लोकप्रिय थी। बच्चा बाबू सोनपुर के रईस थे, जिनकी निजी कंपनी बाँस घाट से पहलेजा घाट के बीच स्टीमर सेवा का संचालन करती थी।

बड़ी संख्या में लोग इस सेवा से भी आते जाते थे। जब लोग राजधानी पटना से सफर करके अपने गाँव पहुँचते लोग हालचाल के साथ ये भी पूछते कौन से जहाज से आये तो लोग जवाब देते बच्चा बाबू के जहाज से।

जहाज के इस सफर में इंतजार और सफर में काफी वक्त जाया हो जाता था। इसलिए पढ़ाकू विद्यार्थी अपनी किताबें खोल कर जहाज में पढ़ने बैठ जाते थे। समय का सदुपयोग करने के लिए। वहीं पटना के कुर्जी के पास मैनपुरा से चलती थी गंगा एलसीटी सर्विस की सेवा। 

सब कुछ लाद दो 

एलसीटी मतलब लैंडिग क्राफ्ट टैंक। ऐसी फेरी का इस्तेमाल माल ढुलाई के लिए किया जाता था। तो गंगा एलसीटी सर्विस पटना और पहलेजा के बीच माल ढुलाई का महत्वपूर्ण साधन थी। इसके आधार तल पर माल लोड किया जाता था वहीं ऊपरी तल पर लोग सफर करते थे। आधार तल पर दो ट्रक, कुछ जीप, ढेर सारा खाने-पीने का सामान, मोटरसाइकिलें आदि बुक करके लादी जाती थीं। वहीं एलसीटी सेवा से सोनपुर मेले के समय बड़ी संख्या में हाथी घोड़े और दूसरे जानवर भी लाद कर इस पार से उस पार लाये जाते थे।

अपनी मोटरसाइकिल भी लाद दी 

मुझे याद है एलसीटी सेवा से कई बार हमलोग अपनी प्यारी राजदूत मोटरसाइकिल को लाद कर पटना आते थे। इसका फायदा ये था कि बाइक से पहलेजा घाटतक पहुँचो। बाइक को जहाज में लाद दो खुद भी उसी जहाज में सवार हो जाओ। जब पटना पहुँचो तो अपनी बाइक उतारो और पटना में जहाँ जाना है निकल पड़ो। पर गंगा एलसीटी सर्विस लोगों में इतनी लोकप्रिय थी कि इसपर वाहन लादने के लिए नंबर लगता था। कई बार क्षमता के बराबर भर जाने पर आपको अगली सेवा के लिए 4 से 6 घंटे इंतजार भी करना पड़ता था।

हम यूँ मान सकते हैं कि गंगा एलसीटी सेवा एक समय में पटना में गंगा नदी पर एक बंदरगाह की तरह हुआ करता था। अब ये सेवा बंद हो चुकी है। पर पटना के मैनपुरा में एलसीटी घाट नाम से इलाके का नाम अब भी मशहूर है। जहाज नहीं है बंदरगाह नहीं पर नाम में उसकी स्मृतियाँ कायम है।  

एलसीटी के लिए पटना में इस्तेमाल में लाये जाने वाले जहाज मूल ब्रिटिश रॉयल नेवी की ओर विकसित किये गये थे। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इनका कई जगह इस्तेमाल हुआ। पहले इनका नाम टैंक लैंडिग क्राफ्ट हुआ करता था। बाद में अमेरिका नामकरण प्रणाली के मुताबिक इनका नाम एलसीटी (लैंडिंग क्राफ्ट वेसल) हो गया।

कुलियों की मारामारी

कोई भी जहाज जब अपने मंजिल तक पहुँचने वाला होता था। चाहे पहलेजा की तरफ हो या फिर पटना तरफ। जहाज किनारे लगने से पहले ही बड़ी संख्या में कुली पानी में कूद-कूद कर तेजी से चारों तरफ से जहाज में घुस आते थे। मानो वे जहाज पर हमला करने आये हों। उसके बाद वे अपने ग्राहकों की तलाश में जुट जाते किसे कुली चाहिए। जो हाँ कहता उसके सामान पर कब्जा कर लेते। दूसरी कक्षा के छात्र के तौर पर अक्तूबर 1978 में जब हमारा रेलवे स्टीमर अंधेरी सुबह में पहलेजा घाट पर किनारे लगा तो कुलियों की मारामारी देखकर मेरा बाल मन भयाक्रांत हो गया। पर यह तो उनकी रोज की दिनचर्या थी। पापी पेट का सवाल जो था।

(देश मंथन, 30 दिसंबर 2015)

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