दलों में लोकतंत्र खत्म होने का नतीजा है वंशवाद

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राजीव रंजन झा : 

बिहार के चुनावी नतीजों और उसके बाद खास कर तेजस्वी यादव को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाये जाने के बाद एक बार फिर से वंशवाद पर बहस छिड़ गयी है। बिहार सरकार में तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री और तेज प्रताप यादव को कैबिनेट बनाये जाने पर लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती ने जवाब दिया है कि जनता ने उन्हें चुन कर भेजा है। यह वही तर्क है, जो कभी सारे कांग्रेसी राहुल गांधी के लिए और उससे पहले राजीव गांधी और उससे भी पहले इंदिरा गांधी के लिए देते रहे हैं। 

लेकिन जनता ने लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों को विधायक चुना। राजनीति की पहली सीढ़ी पर पहुँचे दोनों नौनिहालों को सीधे अपनी पार्टी के शीर्षक्रम पर पहुँचा देने का फैसला जनता ने नहीं किया। यह फैसला लालू प्रसाद यादव की किचन कैबिनेट में हुआ। अब यह दस्तावेजी तौर पर स्पष्ट है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में लालू प्रसाद यादव के बाद तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव ही आते हैं, जबकि अब्दुल बारी सिद्दिकी जैसे अनुभवी वरिष्ठ नेता का नाम इन दोनों के बाद ही गिना जायेगा। बिहार मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री के नाम के बाद तेजस्वी और तेज प्रताप का ही नाम आया, उसके बाद ही सिद्दिकी साहब का नंबर आया। 

लालू प्रसाद यादव ने चुनाव अभियान शुरू होने से भी पहले बता दिया था कि विरासत बेटे को ही मिलती है। तो जाहिर है कि राजद ने अपने नेतृत्व का मसला मतदाताओं के सामने साफ कर दिया था, और मतदाताओं ने उनको राज्य में सबसे ज्यादा सीटें दीं। इसलिए मान लीजिए कि उनके मतदाताओं के लिए लालू यादव का परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं है। तेजस्वी या तेज प्रताप की शिक्षा और काबिलियत भी उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। इसलिए आप इन सवालों को चाहे जितना भी उठा लें, लालू प्रसाद यादव के मतदाताओं को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टे वे लालू प्रसाद यादव के साथ और मजबूती से खड़े होते हैं। इसलिए राजद के विरोधी इन मतदाताओं को समझाने में विफल रहे हैं कि लालू प्रसाद यादव ने पिछले 25 सालों में उनका कोई भला नहीं किया है।

बिहार सरकार में तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव के इस पैराशूट प्रवेश पर सबसे ज्यादा दो तरह की प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं। कुछ लोग इससे यूँ बिदक रहे हैं, मानो भारत के इतिहास में उन्होंने पहली बार ऐसा होते देखा। तेजस्वी यादव के नौवीं फेल होने और तेज प्रताप यादव के गलत उच्चारण की वजह से दोबारा शपथ लेने का जिस अंदाज में मजाक उड़ाया जा रहा है, वह इस आरोप को बल देता है कि इसमें भद्रजन और सवर्ण चिढ़ शामिल है। 

दूसरी ओर इस पैराशूट प्रवेश को उचित ठहराने वाले मुख्य रूप से यही कह रहे हैं कि सब तो यही कर रहे हैं, आपने फलाने जी पर सवाल क्यों नहीं उठाया और ठिकाने जी के बारे में मजाक क्यों नहीं उड़ाया! एक लंबी फेहरिश्त है कि किस-किस दल में किस-किस नेता की संतति किस-किस तरह से आगे बढ़ी है। 

जो भाजपा लंबे समय तक वंशवाद से काफी हद तक अछूती रही और शीर्ष स्तर पर अब भी उससे दूर है, वह अपने शीर्ष नेतृत्व के ठीक बाद वाले पायदान तक पसर चुके वंशवाद के बारे में रक्षात्मक हो जाती है। तब उसके तर्क भी काफी कुछ वही हो जाते हैं जो दूसरे दलों के रहते हैं, जैसे कि जनता ने चुना है, ऊपर से थोपा नहीं गया है, राजनेताओं की संतानों को राजनीति में आने का अधिकार नहीं है क्या, लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहने के बाद अवसर दिया गया है, वगैरह वगैरह। लेकिन जब ऐसे हर तर्क के विपरीत कोई चुनिंदा उदाहरण पेश कर दिया जाये तो उनके पास जवाब नहीं होता। 

मगर यह वंशवाद सभी दलों में पसर जाने का मूल कारण क्या है, वह भी इस हद तक कि कुछ क्षेत्रीय दल तो एक परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी सरीखे बन गये हैं? इसकी जड़ में दो मुख्य वजहें हैं, जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। पहली वजह है सारे दलों में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो जाना, और दूसरी मगर सबसे बुनियादी वजह है हमारी पूरी राजनीतिक प्रणाली में विचारधारा के बदले सत्ता के खेल का हावी हो जाना। 

आंतरिक लोकतंत्र खत्म होने के चलते अब राजनीतिक दलों में सत्ता की शक्ति नीचे से ऊपर नहीं, ऊपर से नीचे प्रवाहित होती है। अब किसी भी दल में किसी भी स्तर के नेता नीचे से चुन कर ऊपर नहीं जाते, बल्कि ऊपर की सत्ता उन्हें मनोनीत करती है। राजनीति आज एक व्यवसाय है, एक करियर है और लोग किसी कंपनी में नौकरी करने की तरह राजनीति करने लगे हैं। 

फिर भला कौन-सा मुलाजिम अपनी कंपनी के सीईओ का विरोध करने जायेगा? वह सीईओ अगर जेल चला जाये, तो भी कर्मचारी को यह हक थोड़े ही होता है कि वह सीईओ को हटा दे। जब तक कंपनी ठीक चलती रहे, और कंपनी में अपनी नौकरी छूट न जाये, या किसी दूसरी कंपनी में अच्छी नौकरी न मिल जाये, तब तक कर्मचारी मौजूदा कंपनी में काम करता रहता है। इसलिए कंपनी के मौजूदा चेयरमैन का बेटा सीधे सीईओ और एमडी की कुर्सी पर बैठ जाये तो कहीं कोई चूँ-चपड़ नहीं होती। 

लेकिन देश के तमाम राजनीतिक दलों की असली शेयरधारक तो जनता है। मुश्किल यह है कि जनता इन कंपनियों के एजीएम में जाती ही नहीं। आप चाहें तो पूछ सकते हैं कि इन दलों का एजीएम होता भी है क्या!

(देश मंथन, 23 नवंबर  2015)

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