उत्तर प्रदेश में दाँव पर प्रशांत किशोर की साख

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संदीप त्रिपाठी :

उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव किसके लिए वाटरलू साबित होगा?, यह सवाल बड़ा मौजू है। सामान्य तौर पर देखा जाये तो सबसे बड़ा दाँव मायावती की बहुजन समाज पार्टी और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी का है। समाजवादी पार्टी सरकार में होने के कारण बचाव की मुद्रा में है तो कांग्रेस अभी तक कहीं लड़ाई में नहीं आयी है। लेकिन इस विधानसभा में इन चारों दलों से बड़ा दाँव चुनाव रणनीतिकार और प्रबंधक के रूप में ख्यात प्रशांत किशोर का लगा है।

समाजवादी पार्टी का दाँव क्यों नहीं है, इसका कारण स्पष्ट है। समाजवादी पार्टी सत्ता में है, यह चुनाव सपा सरकार के पाँच साल के किये-धरे पर जनादेश होगा, अवश्यंभावी तौर पर इसमें प्रतिष्ठान विरोधी रुझान का खामियाजा सपा को भुगतना होगा। सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव बार-बार अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं को इस बारे में चेताते रहे हैं, लेकिन इस का असर पार्टी कार्यकर्ताओं पर शासनकाल के दौरान सार्वजनिक रूप से दिख नहीं पाया। इसलिए आम तौर पर धारणा बन रही है कि उत्तर प्रदेश में सपा की वापसी होती नहीं दिख रही है।

ऐसे में उत्तर प्रदेश में लोगों को बसपा के अवसर ज्यादा दिख रहे हैं। मायावती का शासनकाल कानून-व्यवस्था के मामले में कल्याण सिंह के बाद दूसरा सबसे अच्छा कार्यकाल माना जाता है। भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं लेकिन यह भी कहा जाता है कि मायावती के राज में विकास कार्य होते हैं। ऐसे में सपा के राज में सपा कार्यकर्ताओं की बेलगामी से त्रस्त लोगों को बसपा सरकार में आती दिखे तो कोई इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में यह चुनाव सरकार बनाने के लिए बसपा के सबसे बड़े दाँव के रूप में दिखता है।

भाजपा का दाँव बड़ा इसलिए है कि भले पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में भाजपा की हालत दयनीय रही हो लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 80 में से 73 (भाजपा-71 और अपना दल-2) सीटें अपनी झोली में डाली थीं। तब अमित शाह भाजपा की ओर से उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। बड़े-बड़े भाजपा समर्थक भी मतगणना से पहले भाजपा को इतनी सीटें मिलने का अनुमान लगाने में असमर्थ रहे। लेकिन नतीजों ने सबको हैरान कर दिया और अमित शाह की तूती बोलने लगी। वह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिये गये।

लोकसभा चुनाव में स्वप्न से परे कामयाबी मिलने से भाजपा विरोधी बौखला गये। इसके बाद हुए महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा जैसे राज्यों में भी भाजपा को बड़ी सफलताएँ मिलने से मोदी-शाह की जोड़ी अजेय मानी जाने लगी। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव ने जायका बिगाड़ दिया। भाजपा 70 में से 3 तीन सीटों पर सिमट गयी, हाँ, उसका वोट प्रतिशत भले करीब 33% तक रहा हो। लेकिन तब यह कह कर इस पराजय को नजरअंदाज करने की कोशिश हुई कि दिल्ली एक छोटा और अर्धराज्य है। इसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव में भी जब भाजपा को पराजय झेलनी पड़ी तो मामला गंभीर हो गया कि क्या सचमुच मोदी-शाह का तिलिस्म टूटने लगा है। ऐसे में इस जोड़ी को असम चुनाव ने थोड़ी राहत दी। लेकिन अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव सामने हैं, जहाँ 80 में से 73 सीटों का जादू अमित शाह ने किया था। ऐसे में यह चुनाव भाजपा के लिए एक बड़ा दाँव बनते हैं।

लेकिन इस विधानसभा चुनाव में इन सबसे बड़ा दाँव प्रशांत किशोर का है। प्रशांत किशोर की झोली में वर्ष 2014 में मोदी की बड़ी जीत की कामयाबी है। जीत के साल भर बाद प्रशांत किशोर ने मोदी का साथ छोड़ दिया और बिहार में मोदी के सबसे बड़े विरोधी नीतीश कुमार के पाले में चले गये। माहौल बना कि बिहार विधानसभा में प्रशांत किशोर पटकनी खायेंगे और चुनाव जिता पाने की उनकी क्षमता संदेहास्पद हो जायेगी। लेकिन नतीजा आया तो फिर कामयाबी प्रशांत किशोर की झोली में ही आयी।

लेकिन अब उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रशांत किशोर की असल परीक्षा है। यहाँ उन्होंने कांग्रेस का दामन पकड़ा है जिसके पक्ष में न सामाजिक समीकरण हैं, न मजबूत संगठन है और न ही कोई करिश्माई नेतृत्व है। बीते 30 सालों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत भी दयनीय बनी हुई है। इसके साथ ही प्रशांत किशोर को लोकसभा चुनाव में मोदी और भाजपा और बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश और जदयू का जिस तरह साथ मिला, उसके मुकाबले इस बार कांग्रेस के नेता ही प्रशांत किशोर से अनमने दिख रहे हैं। ऐसे में आशंका यह है कि कांग्रेस की नैया पार लगाने के चक्कर में कहीं खुद प्रशांत किशोर की नैया न डूब जाये।

(देश मंथन 13 जुलाई 2016)

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