बहुत कुछ कहता है आशुतोष और आशीष का इस्तीफा

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संदीप त्रिपाठी

स्वतंत्रता दिवस पर आम आदमी पार्टी (आआपा) से दो स्तंभाकार नेता स्वतंत्र हुए। एक आशुतोष और दूसरे आशीष खेतान। इनमें आशुतोष ने तो उसी दिन खुलासा कर दिया और उनके खुलासा करने पर आआपा सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि इस जन्म में तो आपको छोड़ने की अनुमति नहीं दूँगा। हालाँकि इसका आशुतोष पर कोई असर नहीं पड़ा। आशीष खेतान ने भी 15 अगस्त को ही इस्तीफा ईमेल कर दिया था लेकिन इसका खुलासा उन्होंने बुधवार को किया। क्या इन्हें राजनीति रास नही आयी या कोई और बात है? क्या कहता है आआपा के संस्थापक सदस्यों का एक-एक कर पार्टी छोड़ना।

आशीष के इस्तीफे के सार्वजनिक होने पर आआपा के हाशिये पर पड़े बागी नेता डॉ. कुमार विश्वास ने ट्विटर पर लिखा, ‘हम तो चंद्रगुप्त बनाने निकले थे, हमें क्या पता था कि चंदा गुप्ता बन जायेगा।’ लोकपाल आंदोलन की आधार भूमि पर हिंदुस्तान में राजनीति बदलने के लिए बनी आम आदमी पार्टी  (आआपा) से एक-एक कर संस्थापक नेताओं के बाहर निकलने पर डॉ. विश्वास का यह ट्वीट अत्यंत समीचीन है। इस ट्वीट का अर्थ सीधा है कि आप के गठन के आधार पर लोगों द्वारा संजोया गया सपना खंडित हो चुका है। राजनीति बदलने के लिए राजनीति में आने का दावा करने वाली आआपा अब राजनीति के कीचड़ में पुरानी राजनीतिक पार्टियों से भी ज्यादा सन चुकी है। आशुतोष और आशीष, दोनों के इस्तीफों को राज्यसभा में आआपा की ओर से कारोबारी सुशील गुप्ता और चार्टर्ड एकाउंटेंट एनडी गुप्ता को भेजे जाने से जोड़ा जा रहा है।

लोकसभा चुनाव में क्रमश: चांदनी चौक और नयी दिल्ली से आआपा उम्मीदवार के तौर पर दूसरे नंबर पर रहे यह दोनों नेता राज्यसभा में जाना चाहते थे। वह नहीं हुआ और पार्टी से बिल्कुल बाहर के दो सेठों को अवसर दिया गया। इसके बाद यह दोनों आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी पुरानी सीटों से लड़ना चाह रहे थे। लेकिन पार्टी चांदनी चौक से पंकज गुप्ता और नयी दिल्ली से राहुल मेहरा या राघव चड्ढा को लड़ाने पर विचार करने लगी थी। इस विचार में कुल मिलाकर आशुतोष और आशीष ने पार्टी में अपने कद के हिसाब से अपनी तौहीन समझी। पार्टी के भीतर इतने कद्दावर नेता का रसूख रखने वाले अपनी ही पार्टी में अपनी ही सीट से उम्मीदवारी हासिल न कर सकें तो किस बात के कद्दावर नेता?

पार्टी की स्थापना के लिए एक करोड़ रुपये का पहला चंदा देने वाले शांतिभूषण, लोकपाल कानून का मजमून बनाने वाले प्रशांत भूषण, पार्टी की बातों को तार्किक ढंग से और बेहतरीन रूप में मीडिया में रखने वाले योगेंद्र यादव, पार्टी के बुद्धिजीवी चेहरे प्रो. आनंद कुमार, अजीत झा, मयंक गांधी, पार्टी को मोहल्ला सभा की अवधारणा देने वाले वाले विनोद कुमार बिन्नी जैसे नेताओं को बेइज्जत कर पार्टी से निकाले जाते वक्त यही दोनों नेता आशुतोष और आशीष पार्टी के कुकर्मों पर पर्दा डालने का काम बखूबी करते रहे। पार्टी नेतृत्व (यहाँ अरविंद केजरीवाल पढ़े) के तानाशाह होने का आरोप लगाये जाने पर यह दोनों नेता मीडिया में पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की बातें करते नहीं अघाते थे। यहाँ तक पार्टी के सबसे भीड़ खींचू नेता डॉ. कुमार विश्वास की जब पार्टी के भीतर छोटे प्यादों से बेइज्जती करायी जाने लगी, तब भी आदर्शों के ये मूरत खामोश रहे, क्यों?

छह साल में आआपा के भीतर हुई उठापटक के साफ है कि यह पार्टी एक व्यक्ति की पार्टी बन कर रह गयी है और इस पार्टी का लोकतंत्र जैसी अवधारणा में कोई यकीन नहीं है। सीमा पर जवानों के गुणगान से शुरू हुई पार्टी अब इन जवानों के खिलाफ ही राग अलापने वाली पार्टी में तब्दील हो चुकी है। क्रोनी पूँजी की मुखालफत करने वाली पार्टी सेठों को उपकृत करने वाली पार्टी में तब्दील हो चुकी है। छह सालों में यह भी स्पष्ट हो गया है कि इनके कोई आदर्श नहीं थे। आदर्शों का एक हवा महल खड़ा किया गया, एक छद्म रचा गया जिसके आकर्षण में तमाम युवा फँसते चले गये। इन युवाओं के बल पर कुछ आत्मकेंद्रित लोग नेता बन गये और जब पार्टी नेतृत्व के स्वार्थों से इनके निजी स्वार्थ टकराने लगे और अपने निहित स्वार्थ पूरे नहीं हुए और तो एक-एक कर सब अलग होते गये। रह गये हैं वे युवा, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए अपनी नौकरी, अपने करियर को तिलांजलि देकर मैदान में उतरे थे, अपने टूटे सपनों और अंधकारमय भविष्य के साथ।

(देश मंथन, 23 अगस्त 2018)