हिंदुत्व में अनुभव व तप का अनादर!

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डॉ वेद प्रताप वैदिक, राजनीतिक विश्लेषक :

भाजपा के असली निर्णायक मंडल से अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी का निष्कासन किस बात का सूचक है? भाजपा के कार्यकर्ता और आम जनता दोनों ही असमंजस में हैं।

कहा जा रहा है कि उन्हें मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बना दिया गया है। यह मार्गदर्शक मंडल क्या बला है? भाजपा एक राजनीतिक पार्टी है या कोई सत्संग मंडली है? मार्गदर्शक मंडल तो सत्संग मंडलियों, गुरुकुलों, अनाथालयों, विधवा आश्रमों आदि में नियुक्त किए जाते हैं। जिन नेताओं को इस मंडल में खदेड़ा गया है, क्या उन्होंने अपनी इस अधोगति पर हामी भरी है? क्या पार्टी नेतृत्व ने उनसे पूछकर यह मंडल बनाया है?

अटलजी तो कुछ जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसी स्थिति पिछले पाँच-छह साल से चल रही है लेकिन फिर भी मोदी-पूर्व भाजपा में उन्हें शीर्षस्थ स्थान पर सुशोभित किया गया था। आज क्या हाल हुआ है? आडवाणी और जोशी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन जनसंघ और भाजपा के लिए झोंक दिया और अब भी पूर्ण सक्रिय और सक्षम हैं, अब दरकिनार कर दिए गये हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या यही हिंदुत्व है? अपने बुजुर्गों का सम्मान करना हिंदू होने, भारतीय होने, आर्य होने और सभ्य होने की पहली शर्त है। क्या मोदी-शाह की जुगल जोड़ी हिंदुत्व के इस सर्वमान्य सिद्धांत का उल्लंघन नहीं कर रही है?

इसका उल्लंघन तो तभी से शुरू हो गया था, जब आडवाणी को गुजरात और डा जोशी को वाराणसी से लड़ने के लिए मना किया जा रहा था। अब इस मार्गदर्शक मंडल में मोदी और राजनाथ को किस लिए रखा गया है? क्या ये दोनों 75 के हो गये हैं? ये दोनों मार्गदर्शक मंडल में भी हैं और संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति में भी हैं। यह कैसा मजाक है?

आपने एक नख-दंतहीन मार्गदर्शक मंडल बनाया। लेकिन आप इन दो वयोवृद्धों से इतने डरे हुए हैं कि उसमें भी अपने दो लोग धंसा दिए। धीरे-धीरे यह रहस्य खुलता जा रहा है कि भाजपा का भी कांग्रेसीकरण हो रहा है। पार्टी की सारी सत्ता सिर्फ दो लोगों के हाथों में केंद्रित होती जा रही है। यदि संघ इस तरह की भय-प्रधान राजनीति की पीठ ठोक रहा है, तो मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि इसका सबसे पहला शिकार संघ ही होगा, क्योंकि संघ निस्वार्थ और तपस्वी राष्ट्रभक्तों का संगठन है। वह कब तक अपने मुंह पर ताला जड़े रहेगा? 1977 के आपात्काल का मुख्य कारण यह भयप्रधान राजनीति ही थी।

यह 75 साल का अड़ंगा भी गजब का है। 75 साल का व्यक्ति मंत्री क्यों नहीं बन सकता, इसका कारण कोई बताये? यदि उस व्यक्ति की कोई शारीरिक या मानसिक अक्षमता हो तो यह तर्क इस पर लागू हो सकता है। उस पर ही नहीं, 45 साल के नेता पर भी लागू हो सकता है। लेकिन 75 साल के तो वे नेता भी होंगे (हम तो चाहेंगे, वे 100 के हो जायें) जो अभी 55 और 65 के हैं। तब क्या वे सहर्ष संन्यास ले लेंगे? तब वे फिर कोई मनमाना नियम घड़ लेंगे। पता नहीं यह कैसा पीढ़ी-परिवर्तन है, जो अनुभव और तप का अनादर करता है।

(देश मंथन, 28 अगस्त 2014)

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