परोसिए नहीं, अब कलछुल दीजिए!

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क़मर वहीद नक़वी, पत्रकार :

इधर आम्बेडकर नाम की लूट मची है, उधर ‘मिलेनियम सिटी’ गुड़गाँव के लोग अब गुरुग्राम में दंडवत होना सीख रहे हैं! देश में ‘आम्बेडकर भक्ति’ का क्या रंगारंग नजारा दिख रहा है! रंग-रंग की पार्टियाँ और ढंग-ढंग की पार्टियाँ, सब बताने में लगी हैं कि बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर में तो उनके ‘प्राण’ बसते हैं। और ‘आम्बेडकर छाप’ की सबसे पुरानी, सबसे असली दुकान वही हैं! सब एक-दूसरे को कोसने में लगे हैं कि आम्बेडकर के लिए और दलितों के लिए पिछले 68 सालों में किसी ने कुछ नहीं किया। जो कुछ किया, बस उन्होंने ही किया!

‘आम्बेडकर भक्तों’ की ऐसी भीड़!

राजनीति के घाट पर ‘आम्बेडकर भक्तों’ की ऐसी भीड़, ऐसी भाव-विह्वलता, ऐसा भक्ति-भाव, ऐसी आस्था, ऐसा समर्पण, ऐसी प्रतिबद्धता देख कर आश्चर्य होता है कि इतने महान-महान भक्तों के बावजूद देश में आम्बेडकर को कभी उनकी जगह क्यों नहीं मिल सकी और दलित भी वहीं के वहीं क्यों रह गये, जहाँ वह आम्बेडकर के समय में थे। दोष काँग्रेस की सरकारों का है। हाँ है। काँग्रेस ने केन्द्र में और तमाम राज्यों में लम्बे समय तक राज किया है, तो जिम्मेदारी तो उसकी बनती ही है। लेकिन क्यों आज भी गुजरात के ज्यादातर गाँवों में दलित औरतें कुँओं से खुद पानी नहीं ले सकतीं? कोई दूसरा आ कर दया करे, अपने बर्तन से पानी भर कर उनके बर्तनों में डाल दे, तो दलितों की प्यास बुझे। क्यों इसी राज्य से आज भी सुनने को मिलता है कि चाय की दुकानों पर अलग ‘दलित गिलास’ रखे जाते हैं? काँग्रेस तो पन्द्रह साल से यहाँ सत्ता से बाहर है। इस भेदभाव को मिटाया जा सकता था, या कम से कम मिटाने के लिए या नहीं तो नाम भर के लिए भी कुछ कोशिश तो की ही जा सकती थी। हुई क्या?

क्यों नहीं दूर हुआ छुआछूत और भेदभाव?

गुजरात ही नहीं, यह हालत पूरे देश की है। राजस्थान में दलित दूल्हे आज भी घोड़ी नहीं चढ़ सकते, भले ही दूल्हा खुद पुलिसवाला हो। बिहार के स्कूलों में दलित बच्चे कक्षा में अलग बैठाये जाते हैं, मिड डे मील वह खुद छू नहीं सकते, यह आम बात है। देश भर में दलित बच्चियाँ लगातार यौन उत्पीड़न का शिकार होती रहती हैं, और उन्हें बिरले ही कभी न्याय मिल पाता है। इन घटनाओं से राज्यों के नाम बदल दीजिए, कमोबेश हर राज्य की हालत यही है। कहीं कुछ कम, कहीं ज़्यादा, दलितों से छुआछूत सारे देश में लगभग एक जैसा ही होता है। देश में या किसी राज्य में कब, किस पार्टी ने, किस सरकार ने ऐसे भेदभाव मिटाने के लिए कोई सामाजिक आन्दोलन चलाया? मायावती ने भी नहीं।

दलित पार्टियों का दोष भी कम नहीं!

इसीलिए पिछले अड़सठ सालों में हजारों दलितों के सांसद और विधायक चुने जाने, राष्ट्रपति, मंत्री और मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद दलितों को लेकर समाज का नजरिया आज भी वही क्यों है, यह सोचने की बात है। क्यों कुछ नहीं बदला? वजह एक ही है। दलितों के लिए जो कुछ किया गया, महज सांविधानिक और राजनीतिक मजबूरियों के कारण किया गया। दिल से कुछ नहीं किया गया। दलित नेताओं और दलित पार्टियों का दोष भी कम नहीं है। दलित हितों के नाम पर राजनीतिक सौदेबाजियाँ कर वे सब फले-फूले, लेकिन आम दलित वहीं के वहीं रहे, जहाँ आजादी के समय थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप इन दलित पार्टियों, नेताओं और दलित राजनीति को सिरे से खारिज कर दें। जैसा भी है, कम से कम दलित समाज के पास सबल राजनीतिक नेतृत्व तो है, और उसकी कम से कम इतनी उपलब्धि तो है कि दलित चेतना अपने आप को आज हर जगह व्यक्त कर रही है और हर राजनीतिक दल को मजबूर कर रही है कि वह आम्बेडकर नाम जपे।

नये दलित उभार का मतलब क्या है?

लेकिन दलित समाज भी और खास कर दलित युवा इस बात को अब महसूस करने लगा है कि कलछुल से परोस कर दलितों को जो दिया जा रहा है, वह काफी नहीं है और इससे अब तक जो हासिल हो चुका, उससे ज्यादा कुछ और हासिल नहीं होगा और अगर होगा भी तो उसमें सदियों का समय लगेगा। कलछुल अब खुद के हाथ में आना चाहिए। रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले पर हुआ दलित उभार अब इस सवाल को बार-बार रख रहा है कि स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक दलित छात्र-छात्राओं को कक्षा में या कक्षा के बाहर अलग तरीके से क्यों रखा और देखा जाता है? सफाई कर्मचारी दलित क्यों हों, दूसरों का मैला दलित ही क्यों ढोयें, सीवरों में घुस कर जहरीली गैस से दलित ही क्यों मरें और आपके चप्पल-जूतों की मरम्मत का काम दलित ही क्यों करें?

नये मोड़ पर दलित सवाल इसलिए दलित सवाल अब इतिहास और राजनीति के नये मोड़ पर है। अचरज की बात है कि हमारे राजनीतिक दल इसे अब तक पढ़ नहीं पाये हैं। पाखंडी दिखावों के झाँसों की उम्र अब ज्यादा बची नहीं है, यह बात राजनेताओं को समझ लेनी चाहिए। लेकिन दिक्कत है कि समझ में कैसे आये? काँग्रेस के पास कोई चिन्तन धारा बची ही नहीं है, जो सामाजिक टकरावों से निकल रहे मंतव्यों पर अपना कोई वैचारिक कार्यक्रम तैयार कर सके। बाकी तमाम क्षेत्रीय दल अपनी-अपनी अठखेलियाँ छोड़ इसमें क्यों उलझें भला? रही मायावती तो वह राजनीति से जो हासिल कर सकती थीं, कर चुकीं। तो मायावती का लक्ष्य क्या है? उत्तर प्रदेश की सत्ता फिर मिल जाये और जुगत लगे तो पहली दलित प्रधानमंत्री होने का सपना भी पूरा कर लें। अब उनके पास कांशीराम जैसा कोई ‘मास्टर प्लानर’ भी नहीं है। वाम तो पहले ही काम से जा चुका है।

संकेत साफ हैं

और बीजेपी? गुरुग्राम जैसे प्राच्ययुगीन मोह उसकी जन्मनाल हैं। वह बार-बार उधर ही लौटती है। तो गुरुग्राम के युग से उपजी वर्ण-व्यवस्था से बँधी मन की डोर कैसे टूटे? तभी वह अक्सर बीजेपी नेताओं के श्रीमुख से प्रकट होती रहती है। हालाँकि संघ वाकई अब रणनीति के तहत चाहता है कि दलित समुदाय व्यापक हिन्दू पहचान में समाहित हो जाये, फिर भी रोहित वेमुला की माँ और भाई अन्ततः उसी दिन बौद्ध बन जाते हैं, जिस दिन आप आम्बेडकर स्तुति में जमीन-आसमान के कुलाबे मिला रहे हो! उन्होंने बता दिया कि आम्बेडकर का रास्ता किधर जाता है। यह संकेत काफी नहीं है क्या? 

http://raagdesh.com

(देश मंथन, 18 अप्रैल 2016)

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