संघ का शाह के जरिये राजनीतिक शह-मात का खेल

0
159

इतना ही नहीं बीजेपी मुख्यालय के छोटे छोटे कमरो में कुर्सी पकड़े नेताओं की कुर्सी भी डिगेगी और समूचे संगठन को भी फेंटा जायेगा। इसीलिए नरेंद्र मोदी के असल सिपहसलाहर अमित शाह को अध्यक्ष बनाया गया है। असल में आरएसएस और मोदी के टारेगट बेहद साफ हैं। बीते दस बरस में बीजेपी भोथरी हुई और दिल्ली का राजनीति ने जब हिंदुत्व को आतंकवाद से जोड़ा तो भी दिल्ली के कद्दावर बीजेपी नेताओं की खुमारी नहीं टूटी। ऐसे में टारगेट साधने के लिए बीजेपी संगठन को पैना बनाना जरूरी है, क्योंकि विस्तार संघ का करना है। यह छोटे छोटे संवाद दिल्ली के झंडेवालान से लेकर नागपुर के महाल तक के हैं।

जहाँ स्वंयसेवकों को मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह लगने लगा है कि संघ का ढाँचा कही ज्यादा प्रभावी तरीके से राजनीति को साध सकता है। ऐसे में स्वयंसेवक अगर देश भर में बीजेपी की सत्ता बनाने के लिए राज्यवार भी निकले तो फिर बीजेपी अपने बूते हर जगह सरकार क्यों नहीं बना सकती है। इसलिए संघ के तीन मंत्र अब बीजेपी में नजर आने वाले हैं। पहला, हर राज्य में बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बदला जायेगा। इसमें गुजरात के प्रदेश अध्यक्ष आरसी फलदू भी होंगे। दूसरा, संघ की शाखाओं से जिसका वास्ता रहा है या फिर एवीबीपी के जरिये जिसने राजनीति का ककहरा पढ़ा है, उसे नंबर एक और नंबर दो के तहत महत्व दिया जायेगा। और इन्हें ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया जायेगा। तीसरा जो भी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी की कीमत लगाते रहे हैं या फिर गठबंधन की राजनीति के जरिये बीजेपी को सत्ता में लाने का सपना परोसते रहे हैं, उन्हें दरकिनार किया जायेगा।

संघ परिवार के भीतर बड़ा सवाल यह भी है कि स्वयंसेवक राजनीतिक प्रचार के जरिये बीजेपी के लिए तो राजनीतिक जमीन बना सकता है लेकिन गठबंधन के दलों को इससे लाभ क्यों मिलना चाहिए। इसलिए अमित शाह का टारगेट बीजेपी को अपने बूते खड़ा करने का है। यानी महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में बीजेपी अपने बूते जीत कैसे मिले। संयोग से तीनों ही राज्यों में बीजेपी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके पीछे समूची पार्टी चलने को तैयार हो। और दूसरा संकट है कि तीनों राज्य में बीजेपी के कार्यकर्ता अपने ही नेताओं को लेकर बंटे हुए हैं। और तीसरा संकट है कि बीजेपी विरासत की जिस राजनीति का विरोध करती है उसी विरासत की राजनीतिक डोर को बीजेपी के सहयोगी दल थामे हुए है। यानी संघ परिवार राजनीतिक तौर पर यह सोचने लगा है कि बीजेपी को मथा जाये तो एक आदर्श राजनीति खड़ी की जा सकती है। लेकिन इसके लिए मथने वाले को राजनीतिक तौर पर ईमानदारी बरतनी होगी।

किसी को राजनीतिक मुनाफा देने से बचना होगा। पद को बेचने खरीदने का सिलसिला खत्म करना होगा। यानी संघ जिस प्रयोग को नीतिन गडकरी के जरिये अंजाम तक पहुँचाना चाहता था अब उसे अमित शाह अंजाम देंगे। याद कीजिए तो गडकरी दिल्ली के नहीं थे, अमित शाह भी नहीं है। गडकरी संघ की शाखा से निकले। अमित शाह भी शाखा से ही निकले। गडकरी को-ओपरेटिव से लेकर कार्पोरेट तक को जानने समझने वाले बिजनेस मैन भी रहे। अमित शाह ने भी केशुभाई के दौर में गुजरात वित्त कारपोरेशन के जरिये जिस तरह राजनीति को साधा वह अपने आप में कमाल का हुनर था और इस हुनर को मोदी ने बतौर जोहरी गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद परखा भी। संघ ने भी इस सच को बारिकी से परखा। दरअसल इन परिस्थितियों तक पहुँचने के लिए नरेंद्र मोदी मोदी की राजनीतिक जीत ने आक्सीजन का काम किया है। मोदी की जीत से पहले संघ को सिर्फ यही लगता रहा कि दिल्ली की राजनीति से बीजेपी को मुक्त करने के लिए नरेंद्र मोदी मोदी को हथियार बनाया जा सकता है। और उसने बनाया भी।

लेकिन जिस तरह मोदी के पक्ष में जनादेश आया उसने संघ परिवार के भीतर नये सवाल को जन्म दिया कि अगर दिल्ली की सत्ता साधी जा सकती है, तो फिर हर राज्य में बीजेपी अपने बूते सरकार क्यों नहीं बना सकती। और तो और पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर तक को साधने की सोच इसी दौर में संघ के भीतर जागी है। इसलिए पहली बार संघ भी यह मान रहा है कि धारा 370 और कश्मीरी पंडितों का मुद्दा सामाजिक तौर पर उठाने से पहले राजनीतिक तौर पर उठाना जरूरी है। इसी तरह वाम धारा के खत्म होने के बाद ममता बनर्जी की राजनीति को मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ कर साधने की जरूरत है। ध्यान दें तो मोदी सरकार ने राज्यों की राजनीति में सेंध लगाने के लिए अपने नजरिये को मुद्दों को उठाना शुरू कर भी दिया है। लेकिन इन मुद्दों पर संघ के स्वयंसेवकों से पहले बीजेपी के कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ना होगा।

फिर बीजेपी का कार्यकर्ता तभी आगे बढ़ेगा जब उसे अपने नेता पर भरोसा हो। जो बीते दिनो में डगमडाया है, इसे संघ ने अपने मंथन शिविर में बार बार माना है। यानी जिस तरह मोदी और बीजेपी चुनाव प्रचार में ही नहीं बल्कि सत्ता संभालने के बाद भी दो धाराओं की तरह दिखायी दे रहे है उसी तर्ज पर अमित शाह भी बीजेपी के पारंपरिक तौर तरीकों से अलग दिखायी देंगे, यह माना जा रहा है। असर इसी का है कि दिल्ली में बीजेपी हेडक्वार्टर में अमित शाह की दस्तक बेहद खामोशी से हुई। जबकि डेढ़ बरस पहले 23 जनवरी 2103 को याद कीजिए तो जश्न के बीच राजनाथ की ताजपोश हुई थी। और अभी तक बीजेपी में परंपरा रही है कि अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद कार्यकर्ताओं को मीडिया के जरीए हर अध्यक्ष संबोधित करते भी रहा है।

लेकिन पहली बार नये अध्यक्ष अमित शाह कुछ नहीं बोले। पूरा दिन खामोश रहे। छिट-पुट, या कहे बिखरे, अलग थलग रहने वाले कार्यकर्ताओं ने हेडक्वार्टर के भीतर बाहर पटाखे छोड़े। लेकिन बीजेपी हेडक्वार्टर के 35 कमरों में से किसी कमरे के कोई पदाघिकारी उत्साह में झूमते नजर नहीं आये। झटके में बीजेपी मुख्यलय के भीतर संघ और बीजेपी के साहित्य या कहे प्रचार प्रसार की सामग्री बेचने वाली दुकान से अमित शाह की तस्वीर कार्यकर्ता खरीदने लगे और शाम ढलते-ढलते अमित शाह की तस्वीरे भी खत्म हो गयी। नये तस्वीरों के आर्डर दे दिए गये। लेकिन पहली बार बीजेपी हेडक्वाटर में यह आवाज भी सुनायी दी कि हिन्दी पट्टी में अब कार्यकर्ताओं के दिन लौटेंगे।

क्योंकि यूपी में अमित शाह ने जब कद्दावरों को दरकिनार कर हर समीकरण को उलट दिया तो फिर आने वाले दिनों में कद्दवर होने का तमगा लगाकर सेटिंग करने वाले नेता अब गायब हो जायेंगे। यानी पहली बार जो नेता अदालत के दायरे में दागदार है। जिस पर गंभीर आरोप उसके अपने प्रदेश में लगे। और मामलों की जाँच भी चल रही है उसी के जरीये बीजेपी की सफाई संघ परिवार ने देखी है। वैसे सच यह भी है कि संघ बीजेपी में जमी भ्रष्टाचार और कामचोरी की काई को घोना चाहता है और इसके लिए वह हर राजनीतिक प्रयोग करने को तैयार है। क्योंकि पहली बार संघ ने मनमोहन सरकार के दौर में अपने आस्तितव को खतरे में देखा। जब सरसंघचालक से लेकर इंद्रेश कुमार समेत दर्जनों स्वयंसेवकों को आंतक के कटघरे में खड़ा किया गया। तो लोहा लोहे को काटता है। कुछ इसी अंदाज में संघ का यह राजनीतिक शुद्धिकरण मिशन है। जिसकी एक बिसात पर मोदी सबकुछ है तो दूसरी  बिसात पर मोदी के वजीर अमित शाह सबकुछ है।

(देश मंथन, 10 जुलाई 2014)