महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार की अजब-गजब!

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उद्धव ठाकरे

महाराष्ट्र में न जाने कितने किसान आत्महत्या कर चुके हैं और वहाँ की कानून व्यवस्था पर बड़े प्रश्न उठ रहे हैं। परंतु फिर भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में घटित हिंसा में मारे गये किसानों की हत्या के विरोध में अपने ही प्रदेश में बंद करवाया, और वह भी ऐसा बंद जिसमें उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आम लोगों पर हिंसा की।

महाराष्ट्र में जब से भाजपा की सरकार गयी है, तभी से वहाँ पर कथित सेक्युलर लोगों का कोप कम हो गया है और उन सभी घटनाओं की ओर से आँखें मूँद ली गयी हैं, जिन घटनाओं पर बड़े-बड़े आंदोलन हो जाया करते थे। इसका आरंभ सबसे पहले उन पर्यावरणविदों के मौन से करते हैं, जिन्होंने आरे मेट्रो कार शेड के लिए पेड़ काटने को लेकर हंगामा किया था और जिसमें शिवसेना की भी भागीदारी थी।
मगर अभी बीएमसी ने 1,300 वृक्षों का भविष्य ऑनलाइन तय कर दिया। उस पर मीडिया सहित मौसमी एवं एजेंडा चलाने वाले पर्यावरणविदों का मौन देखने लायक है। 12 अक्टूबर 2021 को प्रकाशित एक समाचार के अनुसार बीएमसी की विविध विकास परियोजनाओं के लिए 1,300 पेड़ों को या तो काटा जाना है या फिर कहीं और लगाया जाना है। पर इन हजार पेड़ों की पीड़ा इन मौसमी पर्यावरणविदों के मुख से नहीं सुनायी देगी। इनका सारा ऐक्टिविज्म और सारी क्रांति केवल और केवल भाजपा सरकार के विरोध में ही होती है। भाजपा सरकार के जाते ही यह लोग एकदम शांत हो जाते हैं।
फिर वे उस हिंसा पर भी नहीं बोलते हैं, जो एक सत्ताधारी दल अपने ही प्रदेश के लोगों के साथ करता है, और वह भी उस प्रदेश में हुए कथित अन्याय के विरोध में, जिसके निवासियों को वह अपने प्रदेश से भगाता रहता है और जिसकी राजनीति ही उस प्रदेश के विरोध पर टिकी हुई है।
बात हो रही है, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की! अपने प्रदेश में किसानों की आत्महत्या पर ध्यान न देने वाले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री इन दिनों भाजपा सरकार के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन पर आंसू बहा रहे हैं। उनके आंसुओं में इतना प्रवाह है कि उसमें सब कुछ बहा जा रहा है। सारा उनका कल बहा जा रहा है।
महाराष्ट्र में न जाने कितने किसान आत्महत्या कर चुके हैं और वहाँ की कानून व्यवस्था पर बड़े प्रश्न उठ रहे हैं। परंतु फिर भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में घटित हिंसा में मारे गये किसानों की हत्या के विरोध में अपने ही प्रदेश में बंद करवाया, और वह भी ऐसा बंद जिसमें उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आम लोगों पर हिंसा की।
यह देखना अत्यंत हास्यास्पद था कि उद्धव ठाकरे के सत्ता संभालने के बाद पालघर में हुई साधुओं की हिंसा में उनकी पार्टी मौन रही थी। निरीह साधुओं को उन लोगों ने घेर कर मार डाला, जिनका उन्होंने कुछ बिगाड़ा नहीं था। पुलिस ने भी साधुओं को उन भूखे लोगों की भीड़ के सामने धकेल दिया था।
मगर मजाकतंत्र बनी हुई महाराष्ट्र सरकार इस पूरे जघन्य हत्याकांड पर मौन रही और यहाँ तक कि धीरे-धीरे आरोपियों को जमानत मिलती जा रही है। पूरे देश ने देखा कि ऐसी महाराष्ट्र सरकार ने अपनी आलोचना करने पर अर्नब गोस्वामी और कंगना रनावत पर कैसी कार्यवाही की थी।
कैसे एक शब्द के आधार पर सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों को महाराष्ट्र सरकार द्वारा निशाना बनाया जाने लगा था। यह देखना बहुत दुखद था कि कैसे जन-प्रतिनिधि जनता से विमुख हो गये थे।
और अब जिस घटना से महाराष्ट्र से कोई लेना देना ही नहीं था, किसी अन्य प्रदेश में हुई एक घटना पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए अपने ही प्रदेश की जनता का आर्थिक और मानसिक नुकसान करा दिया?
महाराष्ट्र के नागरिकों ने उस मामले को लेकर पूरे दिन की आधिकारिक प्रताड़ना झेली, जिसका उनसे कोई लेना-देना नहीं था और आधिकारिक रूप से अपने ही प्रदेश को राजनीतिक प्रताड़ना देने वाला महाराष्ट्र संभवतया प्रथम प्रदेश बना होगा और एमवीए सरकार ऐसी प्रथम सरकार!
(देश मंथन, 21 अक्टूबर 2021)

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