जनता के सारे भरम तोड़ डाले केजरीवाल ने

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बार-बार वे जो माफी माँगते हैं, वह इसी बीमारी का लक्षण है। उन्हें लगता है कि वे माफी माँग लेंगे और जनता फिर से उनके झाँसे में आ जायेगी। 

जब हम लोग कह रहे थे कि केजरी भाई आप गलत कर रहे हैं, तब तो वे हमें अपना दुश्मन समझते थे और उनके तमाम लोग इस तरह से हम पर हमले कर रहे थे, जैसे हम कोई देशद्रोही हों और केजरी भाई अकेले देशभक्त। सच्चाई यह है कि हमने केजरी भाई की जितनी भी आलोचनाएँ कीं, वे इस दर्द के साथ कीं कि एक आदमी जिस पर देश ने इतना भरोसा किया, वह अति-महत्वाकांक्षा, रातों-रात सब कुछ हासिल करने की चाह, फूहड़पन और सस्ते प्रचार की भूख के चलते सब कुछ मिटा लेने पर तुला हुआ है। 

मैंने पहले भी लिखा था कि केजरी भाई ने देश को किसी भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता से भी ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। उनकी वजह से अब यह पीढ़ी किसी आंदोलन और आंदोलनकारी पर भरोसा नहीं करेगी और आने वाले समय में निश्चित रूप से देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। हम लोग लगातार महसूस कर रहे हैं कि केजरीवाल की हल्की हरकतों के कारण समाज में हम सबकी विश्वसनीयता कम हो गयी है। हमारी जिन बातों को पहले समर्थन मिलता था, जनता अब उसे कपोल-कल्पना, अति-आदर्शवादिता या लोगों को बेवकूफ बनाने वाली बात कह कर खारिज करने लगी है। 

लोक सभा चुनाव के नतीजों के बाद भी केजरी भाई की गतिविधियाँ शर्मनाक रही हैं। वे किस मुँह से दिल्ली में दोबारा सरकार बनाने का इरादा पाल बैठे? जब उन्हें पता था कि भाजपा उन्हें समर्थन देगी नहीं, तो उनके लिए दोबारा कांग्रेस से समर्थन की आस रखना निकृष्ट कोटि की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्तालोलपुता नहीं तो और क्या है? राज्यपाल नजीब जंग को चिट्ठी लिख कर अभी विधानसभा भंग न करने का अनुरोध करना क्या यह नहीं जताता कि तथाकथित ईमानदार और साफ-सुथरी राजनीति के इस अगुवा को सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ करने तक से परहेज नहीं है? 

जब कांग्रेस के सारे नेताओं ने इस बार एक सुर में कह दिया कि आम आदमी पार्टी को दोबारा समर्थन नहीं देंगे, तो वे जनता से माफी माँग रहे हैं। ऐसी माफी पर कोई घनघोर बेवकूफ ही उन्हें माफ करेगा। उन्होंने दूसरी पार्टियों की तरह झूठ, पाखंड और शिगूफों की राजनीति की। जाति और संप्रदाय की राजनीति की। धनबल और बाहुबल की राजनीति की। आम आदमी के नाम पर पैसे वालों, अपराधियों-बाहुबलियों और फर्जी लोगों का जमघट तैयार करने से भी परहेज नहीं किया। लोकतंत्र और संविधान की गरिमा कम करने की कोशिश की। 

दिल्ली के विधान सभा चुनाव में जबरदस्त कामयाबी के बाद केजरीवाल ने लगातार जनता के विश्वास को कुचला। 

1. कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का उनका फैसला पहली बड़ी भूल थी। यह अवसरवादी राजनीति का वैसा ही नमूना था, जैसा दूसरे राजनीतिक दल दिखाते रहे हैं। अगर वे ऐसा नही करते तो दिल्ली में विधान सभा चुनाव लोक सभा चुनाव के साथ ही हो जाते, आज दिल्ली में उनकी पूर्ण बहुमत वाली सरकार होती, लोकसभा में भी उनकी ज्यादा सीटें होतीं, दिल्ली पर तिबारा चुनाव का बोझ नहीं पड़ता और उनका रुतबा आज बहुत बड़ा होता। मुमकिन है कि लोकसभा चुनाव के परिणामों की शक्ल भी कुछ अलग होती।

2. शपथग्रहण समारोह से लेकर अपनी सुरक्षा, सरकारी आवास और गाड़ी के मसले पर लगातार नौटंकियाँ करना उनकी दूसरी बड़ी भूल थी। उनकी नौटंकियों की वजह से उनकी तथाकथित ईमानदार सरकार दूसरी तथाकथित भ्रष्ट सरकारों से भी अधिक खर्चीली साबित हुई। सुरक्षा एजेंसियों को अधिक परेशानी उठानी पड़ी और लोगों को लगा कि सब कुछ प्रचार के स्टंट का हिस्सा है।

3. अपने नालायक, बदजुबान और फूहड़ मंत्री सोमनाथ भारती का बचाव करना उनकी तीसरी बड़ी भूल थी। यह एक ही आधार पर दूसरों को गलत और अपने को सही ठहराने का वैसा ही दोहरापन था, जैसा दूसरे राजनीतिक दल दिखाते रहे हैं।

4. मुख्यमंत्री होते हुए कुछ सिपाहियों और दारोगाओं को निलंबित कराने के लिए धरने पर बैठना उनकी चौथी बड़ी भूल थी। ऐसा करके उन्होंने मुख्यमंत्री पद की गरिमा को गिरा दिया। क्या सिपाही को निलंबित कराने के लिए मुख्यमंत्री धरने पर बैठ जायेगा? 

5. गणतंत्र दिवस परेड को बाधित करने का उनका ऐलान पाँचवीं बड़ी भूल थी। ऐसा करके उन्होंने देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत किया। गणतंत्र दिवस के बारे में उन जैसी राय उनसे पहले हमने सिर्फ नक्सलियों और आतंकियों के हवाले से सुनी थी।

6. अगर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना भी ली थी, तो गलत भूमिका बना कर खुद ही इस्तीफा दे देना उनकी छठी बड़ी भूल थी। उनकी सरकार को कोई गिराना नहीं चाहता था, लेकिन अपने राजनीतिक लाभ के लिए वे गैरकानूनी तरीके से जनलोकपाल विधेयक पास कराना चाहते थे। उन्होंने जबरदस्ती इस्तीफा दिया और बड़ा झूठ बोलते हुए बीजेपी और कांग्रेस पर इसकी जिम्मेदारी डाली।

7. क्षमता से ज़्यादा (435) सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ना उनकी सातवीं बड़ी भूल थी। इसकी वजह से न उन्हें अच्छे उम्मीदवार मिले, न वे ढंग से चुनाव लड़ पाये, न प्रचार कर पाये। अगर दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते हुए वे सिर्फ 50 या 100 सीटों पर चुनाव लड़ते, तो आज उनकी 25 से ज़्यादा लोकसभा सीटें हो सकती थीं।

8. मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ना उनकी आठवीं सबसे बड़ी भूल थी। मोदी के सिवा वे किसी के भी खिलाफ खड़े हो जाते तो जीत भी सकते थे और पार्टी को फायदा भी पहुँचा सकते थे। अगर वे नयी दिल्ली सीट से लड़े होते तो दिल्ली में भी कुछ सीटें आ जातीं। लेकिन वे कांग्रेस को छोड़ अचानक मोदी के पीछे पड़ गये। मोदी को निशाने पर लेकर उन्होंने युवाओं को चिढ़ा दिया। 

9. मीडिया से हर वक्त अपने पक्ष में खबरें दिखाने की चाह रखना और ऐसा न होने पर उन पर हमले करना उनकी नौवीं बड़ी भूल थी। नतीजा यह हुआ कि जिस मीडिया ने उन्हें सिर पर बिठा रखा था और एक वक़्त में मोदी से भी ज्यादा कवरेज दिया, उसी मीडिया ने बीच चुनाव में उन्हें पटक दिया। 

10. बार-बार थप्पड़ खा कर उन्होंने अपनी बची-खुची गंभीरता खो दी। यह उनकी दसवीं बड़ी भूल थी। ज़्यादातर लोगों ने तो यह समझा कि वे प्रचार और सहानुभूति के लिए खुद ही अपने ऊपर हमले करवा रहे हैं। अपने ऊपर हमला करने वालों के घर जा कर उन्हें माफ करने का नाटक करके उन्होंने एक तरह से इस विश्वास की पुष्टि कर दी। 

अब आखिरी बात यह कह रहा हूँ कि केजरी भाई, पंजाब की जनता ने आपको बचा लिया है। अब भी आपकी राजनीति खत्म नहीं हुई है। अगर आपमें थोड़ी भी सूझ-बूझ बाकी है तो धैर्य और संयम से काम लीजिए और गलतियों से सबक लेकर ख़ुद को दुरुस्त कीजिए। पंजाब में आपके चार सांसद हैं। दोबारा चुनाव होने पर दिल्ली विधानसभा में आप मुख्य विपक्षी दल बन ही जायेंगे। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी कुछ सीटें ला सके, तो छोटे-छोटे ही सही, तीन राज्यों में आपकी मौजूदगी हो जायेगी और यहाँ से आपका सिलसिला अब भी आगे बढ़ सकता है। 

पर क्या अपने शुभचिंतकों को अपना दुश्मन समझना और अपने आपको सर्वाधिक होशियार और ईमानदार समझना आप कभी बंद कर पायेंगे? अगर नहीं, तो जनता में आपके लिए बची-खुची सहानुभूति भी जल्द ही समाप्त हो जायेगी।

(देश मंथन, 22 मई 2014)