शमशेरा : हिंदू घृणा और वामपंथी एजेंडा से भरी फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया

0
184
Shamshera Sanjay Dutt Ranvir Kapur

शमशेरा हिंदू घृणा से सनी ऐसी फिल्म है, जिसका साहित्य में परीक्षण हुआ, जैसा कि फर्स्ट पोस्ट आदि पर आयी समीक्षाओं से पता चलता है, और फिर बाद में परदे पर उतारा गया। परंतु जैसे साहित्य में फर्जी विमर्श को रद्दी में फेंक कर जनता ने नरेंद्र कोहली को सिरमौर चुना था, वैसे ही अब उसने आरआरआर एवं कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों को चुन लिया है और शमशेरा को गड्ढे में फेंक दिया है!

बॉलीवुड अर्थात् हिंदी फिल्म उद्योग ने एक बार फिर से मुँह की खायी है। इस बार अवसर था यशराज फिल्म्स की फिल्म शमशेरा का। शमशेरा में मुख्य भूमिका निभायी है रणवीर कपूर ने और खलनायक बने हैं संजय दत्त। कहानी का आधार वही घिसा-पिटा बॉलीवुड का फॉर्मूला है कि उच्च जाति के लोगों को शोषण करने वाला दिखाना है, कहानी में कोई ब्राह्मण या ठाकुर ही खलनायक होना चाहिए।

यूपीए के दौर में फिल्म में हिंदू देवी-देवताओं के अपमान

कहानी में एक खलनायक ऐसा हो जिसने शिखा रखी हुई हो, जिसने तिलक या त्रिपुंड लगाया हुआ हो, जनेऊधारी हो, हिंदू भगवान या देवी देवताओं का नाम लेता हो, मंत्रोच्चारण करता हो, आदि आदि! ऐसे ही खलनायक को अभी तक हिंदुओं को बेचा जा रहा था और उनमें अपनी ही जाति एवं धर्म के प्रति एक आत्महीनता एवं घृणा की भावना का विस्तार किया जा रहा था। यूपीए की सरकार में लीला सैमसन जब सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष थीं, तो उस समय हिंदू विरोधी एवं अश्लील फिल्मों की भरमार हो गयी थी और हिंदू प्रतीकों एवं देवी-देवताओं का अपमान करती हुई फिल्म पीके भी उन्हीं के कार्यकाल में रिलीज हुई थी।

इस फिल्म में न केवल हिंदू देवी-देवताओं का अपमान था, बल्कि साथ ही उस समय भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने यह भी आरोप लगाया था कि आमिर खान ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से इस फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए हाथ मिलाया है।

उनके कार्यकाल में एडल्ट कंटेंट एवं हिंदू आराध्यों के प्रति अपमानजनक सामग्रियों (कंटेंट) की बाढ़ आ गयी थी। हालाँकि मोदी सरकार के आने के बाद वर्ष 2015 में उन्होंने मैसेंजर ऑफ गॉड फिल्म की रिलीज के बहाने से अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था, परंतु तब तक यह धारणा स्थापित हो चुकी थी कि हिंदू आराध्यों को गाली देकर, उनका उपहास उड़ा कर आप अपनी फिल्म सुपरहिट करा सकते हैं, क्योंकि पीके कथित रूप से सुपरहिट रही थी। इसके बाद एक बार फिर से इसे ही सुपरहिट फॉर्मूला माना गया।

अब नहीं चल रहीं हिंदू घृणा वाली फिल्में

परंतु समय बदला और लोगों ने ऐसे एकतरफा एजेंडे वाली फिल्मों का प्रतिकार करना आरंभ किया। उसके बाद ऐसी फिल्मों के व्यापार पर असर पड़ना आरंभ हुआ, जो कोई एजेंडा रख कर बनायी गयी थीं और जिनमें हिंदू एवं भारत विरोधी एजेंडा मूल में था। लोगों ने सोशल मीडिया पर खुल कर इन सभी एजेंडा और अभी तक फिल्मों में परोसे गये झूठ एवं हिंदुओं के प्रति घृणा के विषय में लिखना आरंभ किया।

उसके उपरांत सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मृत्यु, फिर कंगना रनावत के साथ किये गये दुर्व्यवहार तथा बाद में कश्मीर फाइल्स फिल्म के उपहास एवं उपेक्षा ने जैसे बॉलीवुड के उस खेमे के प्रति आम जनता में वितृष्णा उत्पन्न कर दी, जो फिल्मों के नाम पर हिंदुओं को तोड़ने वाला अपना एजेंडा परोस रहे थे। ऐसे माहौल में, जहाँ हिंदी में कश्मीर फाइल्स सुपरहिट होती है और दक्षिण की फ़िल्में जैसे आरआरआर, मेजर, रॉकेट्री आदि दर्शकों के दिलों में स्थान बनाती हैं, तब हिंदू विरोधी और ऐसे एजेंडा की फिल्म लाना मानो जले पर नमक छिड़कने जैसा था, जिसमें झूठ के अतिरिक्त कुछ नहीं था!

शमशेरा में ईसाई, वामपंथी झूठ का एजेंडा

शमशेरा में उस झूठ को दोहराया गया है, जो पहले ईसाई मिशनरियों ने गढ़ा, फिर वामपंथियों ने बहुत ही जतन से विमर्श का हिस्सा बनाया और स्वतंत्रता के उपरांत अकादमिक विमर्श एवं वामपंथी साहित्य में उसे और जमा-जमा कर, रिसर्च आदि करके और गाढ़ा किया और अंतत: उसकी रबड़ी बनायी गयी।

साहित्य का यह सौभाग्य है कि किताबों के बिकने और न बिकने का एजेंडाधारी लेखकों और प्रकाशकों पर प्रभाव नहीं पड़ता। परंतु फिल्मों के साथ ऐसा नहीं है। फिल्मों में पैसा लगा होता है और खाली थिएटर सारा किस्सा सुना देते हैं। वे एजेंडा लेखकों की लाइब्रेरी में पड़ी मुर्दा किताबों की तरह नहीं होते।

यही कारण है कि जब साहित्य और अकादमिक क्षेत्र से निकला यह एजेंडा फिल्म में दिखा – कि अंग्रेजों के समय में अत्याचारी दरअसल ब्राहमण हुआ करते थे और उन्होंने ही आदिवासियों का शोषण किया, उन्होंने अल्पसंख्यकों का शोषण किया, उनके दिल में अपने ही समाज के उन लोगों के लिए घृणा के अतिरिक्त कुछ नहीं था और ब्राह्मणों की तुलना में अंग्रेज सभ्य थे, उदार थे – तो वह एजेंडा ढह गया। लोगों ने उसे नकार दिया।

कुल मिला कर शमशेरा हिंदू घृणा से सनी ऐसी फिल्म है, जिसका साहित्य में परीक्षण हुआ, जैसा कि फर्स्ट पोस्ट आदि पर आयी समीक्षाओं से पता चलता है, और फिर बाद में परदे पर उतारा गया। परंतु जैसे साहित्य में फर्जी विमर्श को रद्दी में फेंक कर जनता ने नरेंद्र कोहली को सिरमौर चुना था, वैसे ही अब उसने आरआरआर एवं कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों को चुन लिया है और शमशेरा को गड्ढे में फेंक दिया है!

(देश मंथन, 29 जुलाई 2022)

देखें देश मंथन पर सोनाली मिश्र के अन्य आलेख।

आर्थिक और शेयर बाजार की खबरों के लिए देखें शेयर मंथन

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें