रोहित सरदाना की मृत्यु पर कबीलाई अट्टाहास

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कल से लेकर आज तक सोशल मीडिया पर रोहित सरदाना ही छाए हुए हैं। बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई पत्रकार मृत्यु के बाद भी लोगों के दिमाग में छाया रहे। और न केवल पक्ष में बल्कि विपक्ष में भी लोग आकर बातें करें। आम जनता इस बात से हैरान है कि आखिर रोहित सरदाना से एक वर्ग विशेष को इतनी घृणा क्यों है?

कल से लेकर आज तक सोशल मीडिया पर रोहित सरदाना ही छाए हुए हैं। बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई पत्रकार मृत्यु के बाद भी लोगों के दिमाग में छाया रहे। और न केवल पक्ष में बल्कि विपक्ष में भी लोग आकर बातें करें। आम जनता इस बात से हैरान है कि आखिर रोहित सरदाना से एक वर्ग विशेष को इतनी घृणा क्यों है? क्या यह घृणा मात्र धर्म आधारित है, या विचार आधारित? यह भी देखना होगा! कल से लेकर आज तक मीडिया में लोग इस बात का जश्न मनाते दिखे कि गया साला! पर वह साला क्यों था?
या वामपंथियों के प्रिय रहे लेखकों की बात की जाए? प्रश्न कई हैं! प्रश्न इस बात पर भी हैं कि कैसे कोई इतनी नफरत लेकर जी सकता है जितनी नफरत यह वामपंथी लिए होते हैं। शर्जिल उस्मानी, सफूरा जरगर, गीता यथार्थ, प्रभात रंजन सहित कई नामों के साथ कई ऐसे भी नाम इस विषवमन में सम्मिलित थे, जो रोहित की विचारधारा से सहमत नहीं थे। रोहित अपनी बात खुलकर कहते थे। रोहित सरदाना ने उनमें से किसी का भी कोई व्यक्तिगत नुकसान नहीं किया था, रोहित सरदाना ने किसी के साथ अभद्रता नहीं की थी, रोहित सरदाना ने कुछ भी ऐसा नहीं किया था जिससे उनकी प्रतिष्ठा का क्षरण हो या फिर उनकी जेब से कुछ छीना हो। पर फिर भी रोहित सरदाना के खिलाफ हिंदी लेखन जगत जैसे तलवार लेकर कूद पड़ा।
ऐसा क्यों हुआ? यह समझने में पूरा एक दिन लग गया! मानसिकता समझने में पूरा एक दिन लग गया, फिर भी दिमाग उलझा है! दिमाग हांगकांग में बैठे एक मानवाधिकार वादी के शब्दों में उलझा है जो कह रहा है कि रोहित सरदाना की बेटियों को भी मर जाना चाहिए। एक कोई गीता यथार्थ जो स्वयं को एकल माँ बताती हैं और माँ और बेटे के बीच के भावनात्मक सम्बन्धों को बार बार बताती हैं, वह भी कहीं न कहीं रोहित की बच्चियों के प्रति संवेदनहीन नज़र आईं। ऐसे ही एक और महिला हैं जो कविताएँ लिखती हैं, उनका नाम है कविता कृष्णपल्लवी! उन्होंने रोहित सरदाना की बच्चियों के लिए लिखा है “कुछ “मानवतावादियों” को सरदाना के बच्चों के लिए बहुत शोक है । यह तो इतिहास की निर्मम गति है । जर्मनी और इटली में फ़ासिस्टों के कुकर्मों की क़ीमत उनके मासूम बच्चों को भी चुकानी पड़ी थी । और आप उन हज़ारों बच्चों के बारे में तो सोचिए जो ग़रीबों के बच्चे थे और साम्प्रदायिक उन्माद के विस्फोट ने जिन्हें अनाथ कर दिया । हमें सभी बच्चों के लिए दुःख है, लेकिन बच्चों पर भी यह कहर उसी फ़ासिज़्म ने बरपा किया है जिसके भाड़े के प्रचारकों में सरदाना भी शामिल था ।“
यह हम किस दौर में हैं? क्या यह लोग इंसान भी कहलाने योग्य हैं? एक कथित कवि ने लिखा कि “रावण मरने के बाद राम नहीं हो जाता है भक्तों! (या हो जाता है?)
अब यह कौन निर्धारित करेगा कि राम कौन है और रावण कौन है? और वैसे भी यह लोग राम को तो मानते भी नहीं हैं, तो राम अचानक से याद कैसे आ गए? यही लोग हैं जो राम मंदिर के नाम पर रोते हैं और राम जी को मिथक मानते हैं। जब आपके लिए राम मिथक हैं तो भक्तों को क्या ताना देना?
दरअसल रोहित सरदाना ने जो किया था, वह था इनके बनाए गए विचारों के ढाँचे को तोड़ना! जहाँ पत्रकारों का एक वर्ग खुलकर हिन्दू धर्म को गाली देता है और हिन्दुओं को ही इतिहास से लेकर अब तक भारत की हर समस्या का उत्तरदायी ठहराता है, एवं जो बार बार यह साबित करने का प्रयास करता है कि हिन्दू धर्म का तो कोई अस्तित्व ही नहीं है, ऐसे में रोहित सरदाना कन्याओं को भोज कराते हुए चित्र लगाते थे। वह स्वयं के हिन्दू होने पर शर्म नहीं करते थे, वह विवशता में हिन्दू धर्म का चोला ओढने वाले नहीं थे और न ही वह स्वयं को पोलिटिकली करेक्ट करने के लिए मुद्दों पर उस दृष्टिकोण से बात करते थे, जो इन लेखकों का वर्ग अब तक निर्धारित करता था।
वह देश की बात करते थे। नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थक थे एवं घुसपैठियों तथा शरणार्थियों में अंतर समझते थे। दिल्ली दंगों में भी वह उस झूठ पर नहीं चले, जिस पर वाम द्वारा प्रेम किए गए पत्रकार चले, बल्कि उन्होंने असहज करने वाले प्रश्न पूछे! उन्होंने वह प्रश्न उठाए जो देश के लिए आवश्यक थे। जिनमें इन लेखकों और कथित मानवतावादियों द्वारा गढ़ा गया एजेंडा नहीं था।
वह शर्जिल उस्मानी या सफूरा जरगर जैसों के प्रति प्रश्न करते थे, यही कारण है कि इंसानियत की बात करने वाले यह लोग आज किसी की मृत्यु पर जश्न मना रहे हैं, और वह उनकी बच्चियों को भी अपनी घृणा का केंद्र बना रहे हैं।
वह यह भूल जाते हैं कि जब आप किसी को फासिस्ट कहते हैं उस समय आप खुद पर भी उंगली उठा रहे होते हैं और कौन असहिष्णु है, यह कल से लेकर आज तक की प्रतिक्रिया ने सिद्ध कर दिया है। यह वही कबीलाई अट्टाहास है जो आज से चौदह साल पहले इस भूमि पर आया और अब तक यहाँ पर गूँज रहा है।

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