बिहार बीजेपी वाया गिरिराज सिंह@ फेयर-इन-लवली

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सुशांत झा, पत्रकार :

गिरिराज ने जो टीवी फुटेज खाया है उसमें उनकी पार्टी और उनका दोनों का हित सधता है। पहचान(!) का संकट बिहार में उन्हें पहले भी नहीं था, अब तो वो पहचान घनीभूत हो गयी है।

मेरे गाँव का पानवाला भी उनको पहचानने लगा है। काश वे भूमिहार न होते ! तब तो इस टीवी मीडिया को निचोड़कर वो मुख्यमंत्री के तगड़े दावेदार हो जाते ! 

गोरेपन के बहाने गिरिराज ने जो सोनिया गांधी पर कटाक्ष किया है उसके बारे में मेरे कुछ कयास हैं। चर्चाओं से फिसल रही कांग्रेस जनमानस से ज्यों-ज्यों गायब हो रही है, बीजेपी के लिए बहुत अच्छी बात नहीं है। बीजेपी के लिए कांग्रेस का पतन इतना जल्दी नहीं होना चाहिए, नहीं तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे हर राज्य में दुहराये जा सकते हैं। आनेवाले सालों में बिहार, यूपी और बंगाल के चुनाव हैं, सबसे पहले बिहार में। कांग्रेस वहाँ शून्य के करीब है। अगर वो बिल्कुल शून्य हो गयी और लालू-नीतीश ने मन मारकर गठजोड़ कर लिया तो बीजेपी के लिए दिक्कत हो सकती है। ऐसे में कांग्रेस का जिंदा रहना जरूरी है, पूरे देश में भी।

गिरिराज कायस्थ भी होते तो बिहार में खप जाते, लेकिन वो भूमिहार हैं, उनकी असली अयोग्यता यहीं है। हालाँकि फिर भी उन्होंने अब तक खासी तरक्की की है, लेकिन मीडिया में हावी होकर वो कभी-कभार सुशील मोदी को तो डरा ही सकते हैं। गिरिराज को बड़े मोदी का आर्शीवाद प्राप्त है और छोटे मोदी को नमनशील बनाने के लिए गिरिराज की भूमिका कुछ हद तक रेखांकित जरूर की जायेगी। गिरिराज, सुशील मोदी का स्थान नहीं ले सकते, लेकिन गिरिराज टीवी फुटेज और अखबारी सुर्खी तो चुरा ही सकते हैं।

गिरिराज ने उस जमाने में नरेंद्र मोदी को एयरपोर्ट पर जाकर माला पहना दिया था जब नीतीश अपने अहं में उन्हें क्या-क्या नहीं कह रहे थे। सुशील मोदी ने उस समय चुप्पी साध ली थी, नरेंद्र मोदी का जो लोग इतिहास जानते हैं उस हिसाब से सुशील मोदी दंड के पात्र हैं। प्रश्न है कि उन्हें वो दंड किस रूप में मिलेगा? साथ ही सचाई ये भी है कि सुशील मोदी के कद का बिहार बीजेपी में कोई नेता नहीं है। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी शायद ही किसी किरण बेदी पर दाँव लगायेगी, हाँ चुनाव के बाद कोई मनोहर लाल खट्टर पैदा हो जाये तो कुछ नहीं कहा जा सकता।

पिछले पच्चीस साल में जमाना कुछ-कुछ बदला है, कई जगह बदलाव पहले शुरू हो गये थे, तो वहाँ कुछ ज्यादा बदल गया। ब्राह्मणों के लिए राजनीतिक तौर पर कथित प्रतिकूल सूबे महाराष्ट्र में एक ब्राह्मण मुख्यमंत्री है तो पंजाबियों के लिए राजनीतिक रूप से प्रतिकूल सूबे हरियाणा में एक पंजाबी। तो क्या बिहार में एक भूमिहार मुख्यमंत्री नहीं बन सकता? शायद अभी यह एक खुशफहमी है, ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक बिहार के पिछड़ों में एक हद तक आर्थिक आत्मविश्वास और मुख्यधारा में आर्थिक एकीकरण न हो जाये। शायद मौजूदा बिहार में किसी भूमिहार को CM के तौर पर पेश करना बीजेपी के लिए आत्मघाती होगा। पिछड़े-दलित बहुमत की बात तो दूर सबसे पहले बिहार में राजपूत समुदाय ही बिदक जायेगा।

ऐसे में गिरिराज सिंह का हासिल क्या है? क्या सिर्फ बीजेपी के विराट उद्येश्य के लिए उन्होंने बयान दिया या इससे उनकी अपनी भी कुछ ताकत बढ़ी? हाल में जिस तरह से वैकैया नायडू ने पटना जाकर सुशील मोदी की पीठ थपथपायी है, उसे बड़े मोदी की मौन सहमति माना जा सकता है, लेकिन गिरिराज सिंह का उग्र-बयान बड़े मोदी की कार्ययोजना के अनुकूल ही है। आनेवाले दिनों में जरूर वे ऐसा मीडिया खींचू बयान फिर से देंगे। ऐसा कहा जा सकता है कि बीजेपी आलाकमान दो एजेंडे पर काम कर रहा है, अगर उसे अपने दम पर बिहार में बहुमत मिल गया तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि सुशील मोदी ही CM बनेंगे और अगर बीजेपी बिहार में बहुमत से पीछे रहती है तो एक कमजोर, नमनशील और मजबूर सुशील मोदी बिहार में CM बनेंगे, जिनकी सरकार में गिरिराज सिंह और उन जैसे विरोधी खेमे के कई लोग बराबर के भागीदार होंगे।

(देश मंथन, 03 अप्रैल 2015)

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