हिस्से में माँ आयी तो फिर जायदाद विवाद कैसा?

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मुनव्वर राना

पहले “माँ” शब्द को बेचने वाले मुनव्वर राना अब नागरिकता संशोधन के दौरान लखनऊ में बेटियों द्वारा किये गए विरोध के पीछे खड़े हैं। वे कह रहे हैं कि पुलिस उन्हें इसलिए फँसा रही है, क्योंकि उनकी बेटियों ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन किया था। अभी तबरेज फरार है और मुनव्वर राना के भाई इस बात का शुक्र मना रहे हैं कि सच का पता चला, नहीं तो वे सब फंस जाते।

सेक्युलरों के प्रिय शायर मुनव्वर राना इन दिनों चर्चा में हैं। वैसे तो वे अक्सर चर्चा में ही रहते हैं। उन्हें शौक है कि उन पर चर्चा हो, लोग बातें करें! कुछ कोसें तो कुछ प्यार करें! यही कारण है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही वे सत्ता के विरोध में रहे हैं। उससे पहले तो सोनिया गांधी की आराधना में वे सत्ता से नजदीकी/चाटुकारिता की सारी सीमाएँ पार कर चुके हैं।
और फिर माँ पर नज्म गाकर वे भावुकता की नदियाँ बहा चुके हैं। हालाँकि उनकी इस भावुकता वाली नज्म पर भी चोरी का आरोप लगा है। शायर आलोक श्रीवास्तव ने अपनी गजल को चुराने का उन पर आरोप लगाया था।

आलोक श्रीवास्तव की मूल गजल इस प्रकार है :
बाबूजी गुजरे आपस में सब चीज़ें तकसीम हुईं, तब
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा!”

और मुनव्वर राना ने लिखा
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से माँ आई!

दूसरी पंक्ति एकदम हूबहू वही है!
मगर मुनव्वर राना चूँकि नरेंद्र मोदी का विरोध करते हैं, तो नरेंद्र मोदी के विरोधी प्रगतिशील लोग तो अबदादी को भी अपने सिर पर बैठा लें, ये तो फिर भी मुनव्वर राना हैं। नरेंद्र मोदी से बेइन्तहा नफरत करने वाले कथित प्रगतिशील लोगों का कहना यह है कि एक ही जमीन पर कई रचनाएँ लिखी जा सकती हैं, तो उसमें शोर कैसा? यह सच है कि एक ही जमीन पर कई कविताएँ या रचनाएँ लिखी जा सकती हैं, क्योंकि भाव तो सीमित ही हैं, शब्द भी सीमित हैं, और दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे लिखा न गया हो।
परंतु यह महत्वपूर्ण है कि जो पहले कहा जा चुका है, उसे शब्दश: उतारा न जाये! उससे प्रेरित होकर कुछ नया लिखा जाये। और ये पंक्तियाँ तो बेहद निजी हो सकती हैं। और चूँकि वे शायद घर में सबसे छोटे भी नहीं हैं, तो फिर उन्होंने “मैं” का दावा कैसे किया इस रचना में, यह भी एक प्रश्न है!
ये पंक्तियाँ इस लिए बार-बार प्रासंगिक होती जा रही हैं, क्योंकि किसी को घर मिला और किसी के हिस्से में दुकां आयी कहने वाले जब अपने हिस्से में माँ आने की बात कहते है, तो वे कतई झूठ ही कहते हैं। वे केवल शब्द कहते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि अब उनके परिवार के घर और दुकान, जमीन की लड़ाई, लोगों के सामने आ गयी है। और सारा नाटक भी! और लोग अब यह पूछ रहे हैं कि जो शायर केवल परिवार में माँ को लेकर संतुष्ट था, वह असली जीवन में संपत्ति की लड़ाई लड़ने वाला है और वह भी अपने भाइयों के साथ?
यह लोगों का मोहभंग होने का समय है, क्योंकि वे शायर की माँ वाली गजल पर रोये हैं। और जब उनके बेटे पर हमला हुआ, तो कुछ लोगों को लगा कि वाकई बहुत बुरा हो रहा है, उनके प्रिय शायर के साथ। और फिर पता चलता है कि उसने खुद ही हमला करवाया, जिससे उसके चाचा फँस जायें! और चाचा इसलिए फँस जायें, जिससे वह पुश्तैनी जायदाद में मनचाहे तरीके से कब्जा कर सकें। दरअसल पुलिस के अनुसार तबरेज राना ने यह सब इसलिए किया, क्योंकि पुश्तैनी जमीन के एक मामले में मुनव्वर राना के भाई और भतीजे तबरेज राना पर दबाव डाल रहे थे।
तबरेज पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा चोरी-छिपे 85 लाख रुपये में बेच चुका था, और अब उसके परिवार वाले उसमें से अपना हिस्सा माँग रहे थे। अब सोचिए, लोगों की भावनाओं के साथ “माँ” गजल लिख कर खेलने वाले महान शायर, अपने बेटे को नहीं रोक पाये कि वह उस जमीन को न बेचे, जिस पर उसका अधिकार ही नहीं।
बल्कि पहले “माँ” शब्द को बेचने वाले मुनव्वर राना अब नागरिकता संशोधन के दौरान लखनऊ में बेटियों द्वारा किये गए विरोध के पीछे खड़े हैं। वे कह रहे हैं कि पुलिस उन्हें इसलिए फँसा रही है, क्योंकि उनकी बेटियों ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन किया था। अभी तबरेज फरार है और मुनव्वर राना के भाई इस बात का शुक्र मना रहे हैं कि सच का पता चला, नहीं तो वे सब फंस जाते।
फिर भी एक बात विचारणीय है कि आखिर प्रगतिशील लेखकों द्वारा पसंद का पैमाना क्या केवल और केवल मोदी विरोध है? जो भी व्यक्ति मोदी का विरोध करेगा, फिर चाहे वह चुरा कर लिखे, उसका बेटा अपने परिवार वालों को फँसाने का षड़यंत्र रचे, या फिर वह खुद भारत के बहुसंख्यक धर्म को कोसे, आप उसे अपना मसीहा माने रहेंगे? फिलहाल तबरेज फरार है और लोगों के दिलों से मुनव्वर राना जैसे झूठे लोग उतरते जा रहे हैं, जिनके शब्द और जीवन दो अलग-अलग धुरी पर होते हैं।
मुनव्वर राना और हिंदी के कथित प्रगतिशील लेखक इसलिए एक-दूसरे का साथ देते हैं, क्योंकि दोनों ही दोगले होते हैं और दोनों की ही कथनी और करनी में अंतर होता है!
(देश मंथन, 03 जुलाई 2021)

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