सिंघु बॉर्डर : लखबीर सिंह हत्याकांड, एक चुप्पी के बीच कई प्रश्न?

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सिंघू बॉर्डर पर दलित सिख लखबीर सिंह की हत्या

एक दलित को निहंगों द्वारा मारे जाने पर सभी मौन बैठे हैं। वे विरोध नहीं कर रहे, सड़कों पर नहीं निकल रहे और न ही लखीमपुर खीरी जैसी बहसें कर रहे हैं। सिंघु बॉर्डर पर हत्या भी है और उसमें दलित भी है। और इतना ही नहीं, उसमें निर्ममता की पराकाष्ठा है।

दिल्ली में शुक्रवार 15 अक्टूबर को सुबह-सुबह दलित सिख लखबीर सिंह की हत्या की जो घटना हुई, उसने कुछ एजेंडावादी लोगों को छोड़ कर शेष सभी को दहला दिया। मगर एजेंडा चलाने वाले समस्त मीडिया और लेखन जगत के लोगों के लिए इसने तमाम प्रश्न छोड़ दिये! भारत में हर छोटी घटना को बड़ी बना कर बातें करने वाले एक विशेष मीडिया वर्ग ने इस जघन्य हत्याकांड को एक बेहद छोटी घटना बना कर प्रस्तुत किया, जैसे कि यह आम बात हो।
किसी भी किताबी देश में यह आम बात हो सकती होगी, क्योंकि वहाँ पर शासन आसमानी किताबों से चलता है। पर भारत में यह आम घटना नहीं थी और न ही हो सकती थी। इसलिए एक दलित सिख के हाथ-पैर काट कर लटकाने और तड़पा कर मारने की जघन्य घटना ने उन्हें विचलित नहीं किया। वे शांत रहे, या फिर ऐसे ही खबर चला दी।
एक दलित को निहंगों द्वारा मारे जाने पर सभी मौन बैठे हैं। वे विरोध नहीं कर रहे, सड़कों पर नहीं निकल रहे और न ही लखीमपुर खीरी जैसी बहसें कर रहे हैं। सिंघु बॉर्डर पर हत्या भी है और उसमें दलित भी है। और इतना ही नहीं, उसमें निर्ममता की पराकाष्ठा है।

किसान आंदोलन के नाम पर दलित हत्या पर चुप्पी

इतना ही नहीं, पुलिस के मन में भी इन निहंगों ने इतना आतंक भर दिया है, कि वह भी उधर जाने से डरती रही। मीडिया की तो सारी बहादुरी तब निकल जाती है, जब उन्हीं के द्वारा पोषित किसान आंदोलन में कोई ऐसी घटना हो जाये और उन्हें उसे कवर करना पड़े। इससे पहले भी हमने देखा था कि कैसे कई महिला पत्रकारों को इस किसान आंदोलन में शिकार बनाया गया, और उसे गोदी मीडिया के नाम पर लोगों ने, यहाँ तक कि मीडिया के भी एक तबके ने सही ठहरा दिया।
उसी मीडिया ने लखबीर सिंह की हत्या को भी जैसे उचित ठहराने का प्रयास किया, कि निहंगों के अनुसार लखबीर सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान कर दिया था। अपमान किसका हुआ था? अपमान किसने किया था? और कैसे किया था? इसका कोई प्रमाण नहीं है। पर अपमान के आधार पर उसकी हत्या को उचित ठहराने का प्रयास किया गया।
वह उन्हीं का सेवादार था, पर उन्होंने अपने सेवादार पर भी कोई दया नहीं दिखायी। वह वीडियो क्रूरता की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है। परंतु सेक्युलर लेखकों में इसे लेकर हलचल नहीं हुई। हलचल यदि हुई भी तो केवल इसी बात को लेकर कि दलित को किताब छूने के कारण मार डाला गया!
किसकी किताब? किसने मारा? क्यों मारा? इन सब प्रश्नों पर मौन रहा और कुछ आंबेडकरवादियों ने तो उस हिंदू धर्म और उन ब्राह्मणों पर ही सारा दोषारोपण करने का कुकृत्य किया, जिनका उस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। मगर चूँकि उन्हें अपना गुस्सा तो दिखाना ही था, सो उन्होंने लखबीर सिंह के लिए न्याय माँगते हुए गुस्सा दिखाया केवल ब्राहमणों पर!
खैर! इस मामले में मीडिया की संवेदनहीनता तब सबसे अधिक दिखी, जब लखबीर सिंह के शव का अंतिम संस्कार सरकार ने आनन-फानन में ही नहीं किया बल्कि गाँव में तनाव न बढ़े इसके लिए घर वालों को ठीक से शव देखने भी नहीं दिया। शव को जल्दी जलाने के लिए डीजल का प्रयोग किया।
हाथरस कांड में अपनी सारी शक्ति प्रयोग करने वाला वर्ग निहंगों, सरकार और किसान आंदोलन के नेताओं की इस आपसी सांठ-गांठ पर चुप है। चुप ही नहीं है बल्कि इस बेशर्म चुप्पी में उनका साथी बना है!
(देश मंथन, 24 अक्टूबर 2021)

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