फेमिनिज्म के नाम पर हिंदू द्वेष

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जैसे ही हमारे सामने फेमिनिज्म शब्द आता है, हम ठहर कर सोचने लगते हैं कि आखिर इस शब्द का अर्थ क्या है? और यह किसके लिए है और आखिर इसका लाभ क्या है? क्या यह समाज को जोड़ने के काम आता है? भारत में हाल के दिनों में फेमिनिज्म की कविताएँ, कहानियाँ और वेबसाइटें देख कर ऐसा अनुभव होता है, जैसे यह किसी प्रोपेगैंडा को फैलाने का ही काम कर रहा है।
प्रोपेगैंडा का अर्थ होता है किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अफवाहों, विचारों, सूचनाओं आदि का सहारा लेना या किसी व्यक्ति, संस्थान, किसी उद्देश्य की सहायता करने या उसे बदनाम करने के लिए विचार, सूचना या अफवाह फैलाना, जिससे एक को फायदा हो और दूसरे पक्ष को हानि हो।
यदि इन दिनों हम फेमिनिज्म के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरह उगी हुई वेबसाइटों को देखेंगे तो पायेंगे कि ये सभी वेबसाइटें हिंदू समाज को हानि पहुँचाने के अपने प्रोपेगैंडा पर लगी हुई हैं। उनका उद्देश्य स्त्रियों के लिए कुछ सकारात्मक नहीं करना है, बल्कि उन्हें केवल और केवल हिंदू धर्म के विरोध में स्त्रियों के एक बड़े वर्ग को खड़ा करना है। उनमें ऐसे लेख होते हैं, जिनमें कथित स्वतंत्रता के बहाने समाज के एक बड़े वर्ग को भड़काना सम्मिलित होता है।
ऐसा लगता है जैसे सारे लेख स्त्रीकेंद्रवाद (gynocentrism) से ही संबंधित हैं, जिनमें केवल और केवल औरतें ही केंद्र में हों। जिसका अंतिम परिणाम औरतों का वर्चस्व होता है।
स्त्रियों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर उन्हें पुरुषों की छवि बना देना ही जैसे इन फेमिनिस्ट वेबसाइटों का उद्देश्य होता है। जैसे “पुरुषों ने शॉर्ट्स पहने तो लड़कियों ने क्यों नहीं?”
क्या स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर की संरचना एक समान है? नहीं। और हिंदू संस्कृति में तो वस्त्र की सीमा नहीं थी। यह कमी तो कबीलाई तहजीब के साथ आयी। और पश्चिम में ही औरतों को परदे में रखने की एवं चुड़ैल मानने की परंपरा थी। भारत और विशेष कर हिंदू समाज तो वैसे ही स्त्री केंद्रित समाज था। माताओं के नाम पर ही पुत्रों के नाम होते थे।
फिर भी shethepeople जैसी वेबसाइटों का उद्देश्य है लड़कियों को पुरुषों के साथ चलने वाली न बना कर केवल समानता के ऐसे सिद्धांत को गाकर बिगाड़ना, जो सिद्धांत कहीं से भी व्यवहारिक नहीं है।
भारत का स्त्री केंद्रित समाज कभी भी पुरुष विरोधी नहीं रहा, बल्कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के संपूरक रहे। वहीं gynocentrism अर्थात स्त्रीकेंद्रवाद अंतत: पुरुषों के प्रति नफरत में बदलता है और एक बड़ा वर्ग इस घृणा का शिकार होता चला जाता है।
जान-बूझकर ऐसे विषय उठाये जाते हैं, जिनसे लड़कियों में विरोध हो, जैसे लड़कों और लड़कियों के लिए खिलौने अलग-अलग क्यों? जैसे लडकियाँ ही अपना घर छोड़ कर क्यों जायें? जैसे लडकियाँ शादी से पहले सेक्स क्यों नहीं कर सकतीं? आदि आदि!
ऐसे फालतू प्रश्न उठा कर वे पहले लड़कियों को परिवार के विरोध में खड़ा करती हैं और फिर अंतत: वे समाज और पुरुष दोनों के विरोध में चली जाती हैं। और सबसे मजे की बात यही होती है कि ये वेबसाइटें स्त्रियों को उन्मुक्तता और विरोध के लिए तो भड़काती हैं, मगर कभी भी वे स्त्रियों के कर्तव्यों की बात नहीं करती हैं।
इन वेबसाइटों का उद्देश्य दरअसल स्त्रियों को भड़का कर परिवार तोड़ना है, हिंदू समाज जो सेक्युलरिज्म के चलते अपने धार्मिक ग्रंथों एवं धार्मिक शिक्षा से दूर हो गया है, वह इनका सबसे बड़ा शिकार है, या इनके बहाने भारत इनका शिकार है!
(देश मंथन, 7 जून 2021)

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