प्रचंड जनादेश का ईवीएम की ओट में अपमान मत कीजिए

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पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :

ईवीएम मशीन पर छेड़छाड़ का आरोप यूपी, उत्तराखंड के जनादेश का क्या अपमान नहीं ? विरोध करने वाले वही हैं जो देश में वर्षों से लूटखसोट में लिप्त रहे हैं। अपना भाड़ सा मुँह खोल कर हर दिन कांग्रेस की टीआरपी गिराने वाले दिग्गी

राजा हों या यूपी चुनाव के बाद टूट के दहाने पहुँच चुकी बसपा की महारानी मायावती और घोषित चारा चोर का दल अथवा समाजवाद के नाम पर कुनबे के 36 लोगों को जनप्रतिनिधि बनाने वाली सपा की कथित ‘ईमानदारी’ के बारे में बताने की जरूरत है क्या ?

ये वही राजनीतिक दल हैं जिनकी बैलेट पेपर लूट के चलते ईवीएम से मतदान प्रक्रिया आरंभ की गयी थी 17 बरस पहले। संसद में हंगामा कर रहे हैं। चुनाव आयोग सभी को न सिर्फ धता बता चुका है बल्कि वह नौटंकीलाल की ‘आप’ को खुद में झाँकने की सलाह भी दे चुका है।

मतदान की जिसको जरा सी भी समझ है, उसे पता है कि मतदान से पहले मशीन तीन चरणों में टेस्ट की जाती है। अतिम परीक्षण ऐन मतदान से पूर्व सभी दलों के पोलिंग एजेंटों के समक्ष मतदान अधिकारी बतौर माक वोट करता है और सभी की संतुष्टि के बाद वह मशीन को सील करता है।

केजरीवाल की पंजाब और गोवा चुनाव में फूंक सरक गयी। यूपी में सपा राज कानून व्यवस्था के साथ क्रूर मजाक था। फिर, मोदी सरकार के जनहित कार्यों और नोटबंदी को जनता ने सिर माथे लिया। हमारे कितने ही युवा पत्रकार साथी जो एक्जिट पोल में जुटे थे, बराबर फेसबुक पर मैसेज में भाजपा की प्रचंड जीत की भविष्यवाणियाँ करते रहे थे। एक का तो यहाँ तक मानना था कि यूपी में मोदी लहर 2014 का इतिहास दोहराएगी।

साथियों आपको याद होगा कि यूपी में प्रथम चरण की 73 सीटों का एक्जिट पोल एक प्रमुख अखबार के डाट काम ने सार्वजनिक कर दिया था और जिसके चलते सम्पादक को जमानत करानी पड़ी थी। उसमें भाजपा को 45 से 52 सीट दी गयी थी और चाणक्य ने 288 सीट का अनुमान क्या मशीन में घुस कर लगाया था ?

लुटेरी पार्टियाँ भूल गयी थीं कि जाति और मजहब की राजनीति ज्यादा जिन नहीं चलने वाली। जनता कुशासन और पापाचार से मुक्ति चाहती थी। उसने भाजपा के पक्ष में जनादेश दिया है। इसको खेल भावना के साथ स्वीकार करने की बजाय वे छाती पीट रहे हैं और जनमानस उनके मजे ले रहा है।

(देश मंथन,  07 अप्रैल 2017)

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