सीसैट पर सरकारी निर्णय से संतुष्ट नहीं गोविंदाचार्य

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साथ ही वर्ष 2011 की परीक्षा में शामिल छात्रों को 2015 में एक बार और अवसर देने का भी फैसला किया गया है। मगर इस छात्र आंदोलन का समर्थन कर रहे पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य का कहना है कि इन कदमों से समस्या खत्म नहीं होगी।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संरक्षक गोविंदाचार्य ने कहा है कि अनुवाद की समस्या फिर भी बाकी रहेगी। उन्होंने संसद के 1968 में पारित संकल्प को लागू कराने के लिए लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कार्मिक विभाग के सचिव और यूपीएससी के चेयरमैन पर संसद की अवमानना का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की माँग की है। इस पत्र का पूरा आलेख नीचे दिया गया है :

“सरकार द्वारा संविधान की अवहेलना तथा संसद की अवमानना से देश के युवाओं में घोर निराशा के बीच यह पत्र मैं लिख रहा हूँ। मैंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को 26 जुलाई 2014 को पत्र लिखा था (देखें https://www.deshmanthan.in/hi/news-views/govindacharya-letter-to-pm-narendra-modi-on-upsc-csat), जिसके बारे में अभी तक किसी भी प्रभावी निर्णय की सूचना मुझे नहीं है।

आजादी की लड़ाई में सिविल सेवाओं का भारतीयकरण महत्वपूर्ण मुद्दा था, जिसकी सफलता का प्रथम चरण भारत में सिविल सेवाओं का प्रारंभ और द्वितीय चरण सन् 1979 के पश्चात् कोठारी आयोग की सिफारिशों के अनुरूप हिंदी एवं भारतीय भाषाओं को सिविल सेवाओं की चयन प्रक्रिया में शामिल करना था। मैंने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में इस बात को विस्तार से बताया है कि वर्ष 2011 में यूपीएससी द्वारा सीसैट प्रणाली लागू करने से संसद के दोनों सदनों द्वारा वर्ष 1968 में पारित राजभाषा संकल्प का उल्लघंन किया गया है, जिसको माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 31 मई 2013 में विस्तार से बताया गया है।

नौजवान छात्रों द्वारा हिंदी भाषा के हक की लड़ाई को उनकी अयोग्यता और भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी की अनिवार्यता से जोड़ा जा रहा है, जो न सिर्फ तथ्यात्मक तौर पर गलत है बल्कि संविधान की मूल भावना के विरुद्ध भी। देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी न सिर्फ देश में वरन् विदेशों में भी हिंदी में अपना भाषण देते हैं, तो फिर भारत की सिविल सेवाओं में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की माँग करने वाले लोग गलत या अयोग्य कैसे हो सकते हैं? अंग्रेजी भाषा अभिव्यक्ति का एक वैकल्पिक माध्यम हो सकती है, परंतु भारत वर्ष में योग्यता के आकलन का आधार नहीं बन सकती।

संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी देश की राजभाषा है। कतिपय राजनीतिक कारणों से देश में अंग्रेजी का संपर्क भाषा के तौर इस्तेमाल हो रहा है, पर इससे अंग्रेजी को संवैधानिक वैधता नहीं मिल सकती। सर्वोच्च न्यायालय के अलावा अन्य सभी प्रतिष्ठानों और संसद में संविधान के अनुसार हिंदी को प्रथम भाषा के तौर पर दर्शाया गया है और अंग्रेजी को द्वितीय भाषा के रुप में। इस संवैधानिक स्थिति के अनुसार राजभाषा हिंदी में मूल लेखन होना चाहिए और उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया जाना चाहिए।

उपरोक्त संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षाओं में भी प्रश्न-पत्रों का लेखन मौलिक हिंदी में और उनका अनुवाद अंग्रेजी में होना चाहिए, जो इस बार 24 अगस्त को आयोजित परीक्षाओं में भी संभव है। यदि इस संवैधानिक प्रावधान को लागू कर दिया जाये तो यूपीएससी की स्वायत्तता में हस्तक्षेप के बगैर छात्रों को तात्कालिक राहत मिल सकती है। इस व्यवस्था के अनुसार बोधगम्यता के सवालों का चयन हिंदी साहित्य (रामचरितमानस, साकेत, भारत-भारती, गोदान आदि) से होकर अंग्रेजी में उसका अनुवाद होना चाहिए, क्योंकि मातृभाषा ही समाज एवं परिवेश को सही तरीके से व्यक्त कर सकती है। मैं आशा करता हूँ कि सिर्फ इस बदलाव से देश में राजभाषा के तौर पर हिंदी का प्रभावी क्रियान्यवन हो सकेगा और बड़े पैमाने पर राजभाषा हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में साहित्यिक लेखन और रोजगार का सृजन हो सकेगा।

अनेक आश्वासनों के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा इस विषय पर उचित एवं त्वरित निर्णय नहीं लिये जाने से न सिर्फ लाखों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है, वरन् देश में राजभाषा के समर्पित जनसमुदाय में हताशा की भावना है। इस विषय को हिंदी और अहिंदी मोड़ देना भी आप्रासंगिक है क्योंकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कोई विरोध है नहीं। अहिंदी भाषी क्षेत्र से होने के बावजूद हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग का मैं घोर समर्थक हूँ।

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि यूपीएससी एवं केंद्र सरकार द्वारा हिंदी के बारे में संवैधानिक प्रस्तावों एवं संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित राजभाषा संकल्प 1968 का उल्लघंन किया जा रहा है। लोकसभा अध्यक्षा होने के नाते संसदीय सर्वोच्चता को सुनिश्चित करने का आपके उपर संवैधानिक उत्तरदायित्व है। आपसे निवेदन है कि इस विषय पर संसदीय प्रस्तावों की अवमानना के लिए केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग के सचिव एवं संघ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन पर संसद द्वारा कठोर कार्यवाही की जाये।

आपने अपने दीर्घ सामाजिक-राजनीतिक जीवन में संसदीय परंपराओं के अनुपालन की कई मिसालें पेश की हैं और हिंदी साहित्य के प्रति आपकी अभिरुचि सर्वविदित है। मैं आशा करता हूँ कि संसदीय सर्वोच्चता के इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर आप निर्णायक भूमिका निभायेंगी, जिससे न सिर्फ राजभाषा हिंदी को उसका सम्मान हासिल होगा वरन् देश के युवाओं की राष्ट्रनिर्माण में भागीदारी भी सुनिश्चित की जा सकेगी और तभी हम सबके अच्छे दिन आयेंगे।”

(देश मंथन, 04 अगस्त 2014)