मनसुख मांडविया की अंग्रेजी का उपहास करती गुलाम मानसिकता

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मनसुख मांडविया

औपनिवेशिक मानसिकता उन लोगों की है, जो केवल अंग्रेजी भाषा की जानकारी को ही ज्ञान का पर्याय मानते हैं। वे दरअसल ईसाई मानसिकता से बाहर नहीं आ पाये हैं, स्वतंत्र नहीं हो पाये हैं। वे इस बात को स्वीकार कर ही नहीं पाये हैं कि देशज भाषा भी शासन का पर्याय हो सकती है।

दिनांक 7 जुलाई को दो घटनाओं ने मीडिया और सोशल मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। एक घटना थी मंत्रिमंडल विस्तार और दूसरी अभिनेता दिलीप कुमार का इंतकाल। अगले दिन जब दोनों घटनाओं का विश्लेषण होने लगा, तो स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया अपने कुछ पुराने ट्वीट के कारण ट्रोल हो गए। उन्होंने गलत अंग्रेजी में ट्वीट किये थे। यह उनकी गलती थी। जब उनका हाथ अंग्रेजी में तंग था तो उन्हें अपनी भाषा में ही लिखना चाहिए था।
परंतु गलत अंग्रेजी का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को ज्ञान नहीं है। ज्ञान और अंग्रेजी दो अलग-अलग पैमाने हैं। अंग्रेजी मात्र एक भाषा है, जिसके माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। परंतु ज्ञान तो स्थानीय भाषाओं में भी प्राप्त किया जा सकता है, जैसे हिंदी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम आदि। वह कोई भी भाषा हो सकती है। यह मानसिकता कब जायेगी कि अंग्रेजी का ज्ञान ही आपकी विद्वता की पहचान है। यह जो अंग्रेजी प्रेम की बाध्यता है, वही कई सामाजिक जटिलताओं को जन्म देती है।
तभी गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर भी अंग्रेजी माध्यम से चलने वाली शिक्षा को अव्यावहारिक मानते थे। वे यही कहते थे कि शिक्षा हमेशा ही अपनी मातृभाषा में ग्रहण करनी चाहिए। उनका यह मानना भी था कि शिक्षा का कार्य बालकों को क्लर्क, निपुण किसान या शिल्पी या वैज्ञानिक बना देना नहीं है, बल्कि उन्हें अनुभव की पूर्णता द्वारा पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित करना भी है।
उनका मानना था कि अनंत मूल्यों की प्राप्ति विदेशी भाषा में नहीं है। इसी प्रकार महात्मा गांधी भी अपनी भाषा में ही शिक्षा के पक्षधर थे। हालाँकि वे अंग्रेजी के विरोधी नहीं थे, परंतु सर्वांगीण विकास के लिए वे मातृभाषा को महत्वपूर्ण मानते थे।
अंग्रेजी भाषा में शिक्षा का अर्थ था अंग्रेजों के अनुसार अपने देश के युवाओं को तैयार करना। यह बात स्वयं मैकाले ने स्वीकार की थी, और यह निर्णय लिया था कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होनी चाहिए। सी. एफ. एंड्रूज़ अपनी पुस्तक ‘द रेनेसां इन इंडिया ऐंड इट्स मिशनरी आस्पेक्ट’ में इस बात को स्पष्ट करते हैं कि जब भारत में सन 1813 के बाद ईसाई मिशनरी को पंथ (रिलिजन) प्रचार की अनुमति मिली तो उन्होंने भारत में ईसाई मतांतरण के लिए दो ही उद्देश्य चुने, जो थे अनुवाद और शिक्षा। और इसीलिए शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखा गया। अंग्रेजी को श्रेष्ठ स्थापित किया गया और अनुवाद के माध्यम से संस्कृत ग्रंथों को नीचा दिखाया गया।
वही औपनिवेशिक मानसिकता उन लोगों की है, जो केवल अंग्रेजी भाषा की जानकारी को ही ज्ञान का पर्याय मानते हैं। वे दरअसल ईसाई मानसिकता से बाहर नहीं आ पाये हैं, स्वतंत्र नहीं हो पाये हैं। वे इस बात को स्वीकार कर ही नहीं पाये हैं कि देशज भाषा भी शासन का पर्याय हो सकती है। ये लोग दरअसल या तो इस्लाम या फिर पश्चिम से मान्यता लेने की कोशिश में रहते हैं।
वर्तमान पाकिस्तान में जन्मे दो महान व्यक्तित्वों का निधन 7 जुलाई को हुआ। युसूफ खान उर्फ दिलीप कुमार का नाम सभी को याद रहा, मगर ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक दिलवाने वाले महान हॉकी खिलाड़ी केशव दत्त का निधन न तो सोशल मीडिया में स्थान बना पाया और न उन कथित हिंदू वीरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, जो युसूफ खान उर्फ दिलीप कुमार को देशद्रोही सिद्ध कर रहे थे।
कितना अच्छा होता कि अपनी भाषा और अपने नायकों पर गर्व करने की प्राथमिकता हम निर्धारित करते! परंतु यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि हम अभी तक इस्लामी गुलामी या ईसाइयों के अंधानुकरण को ही प्रगतिशीलता मान रहे हैं!
(देश मंथन, 09 जुलाई 2021)

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