Monday, January 24, 2022
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समाचार विचार

फिर से चर्च में यौन स्कैंडल और फिर से चुप्पी!

हालाँकि अब निथिराविलाई पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज हो गया है और आरोपी जेल में है। यह ठीक है कि मामला दर्ज हो गया है, पर प्रगतिशीलों की वाल पर शांति है। मंदिर के भक्त की किसी गलत हरकत पर मंदिर को कोसने वाली प्रगतिशील जमात पादरी के ही सेक्स स्कैंडल में पकडे जाने पर चुप है, कोई हल्ला नहीं है।

भारत का कानून न मानने की औपनिवेशिक जिद

कार्ल रॉक एक विदेशी है, जो टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था। उसने हरियाणा में शायद एक राजनीतिक परिवार में शादी की है। वह यहाँ वीडियो बना कर यूट्यूब पर डाल करके पैसे भी कमा रहा है। पर वह एक और काम कर रहा था। वह भारत की चुनी हुई सरकार का विरोध कर रहा था।

मनसुख मांडविया की अंग्रेजी का उपहास करती गुलाम मानसिकता

औपनिवेशिक मानसिकता उन लोगों की है, जो केवल अंग्रेजी भाषा की जानकारी को ही ज्ञान का पर्याय मानते हैं। वे दरअसल ईसाई मानसिकता से बाहर नहीं आ पाये हैं, स्वतंत्र नहीं हो पाये हैं। वे इस बात को स्वीकार कर ही नहीं पाये हैं कि देशज भाषा भी शासन का पर्याय हो सकती है।

हिस्से में माँ आयी तो फिर जायदाद विवाद कैसा?

पहले “माँ” शब्द को बेचने वाले मुनव्वर राना अब नागरिकता संशोधन के दौरान लखनऊ में बेटियों द्वारा किये गए विरोध के पीछे खड़े हैं। वे कह रहे हैं कि पुलिस उन्हें इसलिए फँसा रही है, क्योंकि उनकी बेटियों ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन किया था। अभी तबरेज फरार है और मुनव्वर राना के भाई इस बात का शुक्र मना रहे हैं कि सच का पता चला, नहीं तो वे सब फंस जाते।

झूठ के सहारे हिंदुओं को असहिष्णु दिखाने की कोशिश

देश के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह की घटनाओं की खबर आती है और उसमें जोड़ दिया जाता है बाद में कि इस कारण से घटना हुई। उस घटना का जय श्रीराम के नारे से कोई संबंध नहीं होता, लेकिन जोड़ा जाता है। कांग्रेस से लेकर तमाम विपक्षी दल इस तरह की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं, इस तरह के मुद्दे या विचार को खड़ा करना चाहते हैं। तो षड़यंत्र क्या है? षड़यंत्र दो तरह के हैं।

वैश्विक बहनापा उन औरतों तक क्यों नहीं जाता?

जिस फेमिनिज्म का राग ये फेमिनिस्ट अलापती हैं, वह मात्र समानता के सिद्धांत पर आधारित है। हाल ही में कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जब प्रगतिशील फेमिनिस्ट का साझा सिस्टरहुड भुरभुराकर ढह गया है।

नुसरत जहां : कहीं राजनीतिक दाँव-पेंच ही तो नहीं था?

बंगाल चुनावों के मध्य ही यह बात बार-बार उभर कर आ रही थी कि तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां और उनके पति निखिल...

फेमिनिज्म के नाम पर हिंदू द्वेष

जैसे ही हमारे सामने फेमिनिज्म शब्द आता है, हम ठहर कर सोचने लगते हैं कि आखिर इस शब्द का अर्थ क्या है? और यह...

तरुण तेजपाल के केस के बहाने मोरल पुलिसिंग

फिर से एक बार खोजी पत्रकार तरुण तेजपाल के मामले के बहाने एक बार बलात्कार पीड़ितों के लिए नियम निर्देशों की चर्चा है। जी...

रोहित सरदाना की मृत्यु पर कबीलाई अट्टाहास

कल से लेकर आज तक सोशल मीडिया पर रोहित सरदाना ही छाए हुए हैं। बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई पत्रकार मृत्यु के बाद भी लोगों के दिमाग में छाया रहे। और न केवल पक्ष में बल्कि विपक्ष में भी लोग आकर बातें करें। आम जनता इस बात से हैरान है कि आखिर रोहित सरदाना से एक वर्ग विशेष को इतनी घृणा क्यों है?

क्या बाबा रामदेव को पता नहीं था कि कोरोनिल पर बखेड़ा होगा?

राजीव रंजन झा : 

यदि बाबा रामदेव अपनी दवा का नाम कोरोना के आधार पर कोरोनिल रखने के बदले कुछ अलग रखते, इसे कोरोना की दवा कहने के बदले रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा (इम्युनिटी बूस्टर) कहते, तो इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ होता। दवा तो उनकी तब भी बिक जाती। आज के माहौल में सुपरहिट ही रहती।

कोरोना की दवा का बाबा रामदेव का दावा और फेसबुकीय योद्धाओं के प्रमाण-पत्र

राजीव रंजन झा : 

एक दवा है एचसीक्यूएस। मलेरिया के इलाज में काम आती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बोल दिया कि इससे कोरोना के मरीज ठीक हो रहे हैं। भाई लोगों ने पक्ष-विपक्ष दोनों में मोर्चा खोल दिया। 

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आरएसएस पर नेहरू का वह अभियान, जिसे मोदी ने पलट दिया

देश में आरएसएस पर 18 महीने तक प्रतिबंध रहा और इस दौरान नेहरू की सरकार में नियोजित तरीके से समाज में आरएसएस का दानवीकरण करने का अभियान चला। उस समय महज दो शब्द कहने से लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा चली जाती थी, सरकारी दफ्तरों में काम कर रहे अधिकारी-कर्मचारियों की नौकरी चली जाती थी, व्यापारियों पर मुकदमे हो जाते थे। वे दो शब्द थे - आरएसएस एजेंट।

सिंघु बॉर्डर : लखबीर सिंह हत्याकांड, एक चुप्पी के बीच कई प्रश्न?

एक दलित को निहंगों द्वारा मारे जाने पर सभी मौन बैठे हैं। वे विरोध नहीं कर रहे, सड़कों पर नहीं निकल रहे और न ही लखीमपुर खीरी जैसी बहसें कर रहे हैं। सिंघु बॉर्डर पर हत्या भी है और उसमें दलित भी है। और इतना ही नहीं, उसमें निर्ममता की पराकाष्ठा है।

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार की अजब-गजब!

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एडीजे उत्तम आनंद की हत्या : ढाई माह में ढाई कदम पर अटकी जाँच

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