बिहार चुनाव में क्या फिर पलटी मारेंगे उपेंद्र कुशवाहा?

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इन दोनों दलों ने रालोसपा के नेता उपेंद्र कुशवाहा को ज्यादा बड़ा, योग्य और अनुभवी नेता बताते हुए महागठबंधन से उन्हें मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश करने की माँग की है। रालोसपा इस मुद्दे पर इतनी आगे बढ़ गयी है कि उसने गुरुवार को पार्टी की आपातकालीन बैठक बुलायी है। वीआईपी ने इस मामले में कुशवाहा का समर्थन कर एवज में अपने लिए उपमुख्यमंत्री पद पर निगाहें गड़ायी हैं। वीआईपी चाहती है कि चुनाव से पूर्व महागठबंधन उपमुख्यमंत्री पद के लिए उसकी पार्टी के मुकेश कुमार सहनी का चेहरा आगे करे।

लेकिन क्या रालोसपा यह नहीं जानती कि महागठबंधन में राजद सबसे बड़ी पार्टी है और अन्य सहयोगी दलों को भी बुनियादी तौर पर राजद के वोटबैंक का ही लाभ मिलने वाला है? क्या रालोसपा को यह पता नहीं कि महज तकरीबन ढाई फीसदी वोट पाने पर उसके नेता को महागठबंधन कभी मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर आगे नहीं करेगा? रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा इतने मूढ़ नहीं हैं कि यह न जानते हों।

रालोसपा की माँग के पीछे की मंशा

तो फिर रालोसपा ऐसी माँग भला क्यों कर रही है? इस प्रश्न के दो जवाब हैं। एक तो यह कि रालोसपा चुनाव में महागठबंधन से 49 सीटों की हिस्सेदारी चाहती है। लेकिन रालोसपा का पिछला रिकॉर्ड इसके अनुरूप नहीं है। रालोसपा ने पिछला विधानसभा चुनाव 23 सीटों पर लड़ा था और महज दो सीटों पर उसे जीत मिली थी। तब वह एनडीए का हिस्सा थी। लोकसभा चुनाव से पूर्व वह महागठबंधन में शामिल हो गयी और 5 सीटों पर लड़ी। उसने 3.7 फीसदी वोट हासिल किये, लेकिन एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। यहाँ तक कि खुद कुशवाहा दो सीटों पर लड़े और दोनों सीटों पर हार का सामना किया।

ऐसी स्थिति में इस बार 49 सीटों की रालोसपा की माँग को महागठबंधन की प्रमुख पार्टी राजग ने तवज्जो नहीं दिया। राजद का यह भी मानना है कि रालोसपा अपने वोट महागठबंधन के अन्य उम्मीदवारों को ट्रांसफर कराने में सक्षम नहीं है। सीधा अर्थ है कि रालोसपा महागठबंधन पर बोझ है और जितनी सीटें उसे दी जायें, उतने पर वह चुपचाप मान जाये। तो अब मुख्यमंत्री पद पर तेजस्वी के मुकाबले कुशवाहा का नाम आगे करना विधानसभा चुनाव में ज्यादा हिस्सेदारी के लिए मोल-भाव करने की रालोसपा की रणनीति हो सकती है।

एनडीए में वापसी की संभावना

दूसरा जवाब यह है कि रालोसपा महागठबंधन में अपनी स्थिति को समझ चुकी है। उसे शायद यह भी समझ में आ गया है कि फिलहाल बिहार की राजनीति तीन दलों भाजपा, जदयू और राजद में बँटी हुई है। इन तीनों दलों में जो दो दल साथ होंगे, उनके आगे रहने की गुंजाइश ज्यादा होगी। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी का हश्र देखने के बाद उपेंद्र कुशवाहा शायद इसी गणित में उलझे हैं कि इस विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति ठीक करने के लिए वे एनडीए और महागठबंधन में से किसे चुनें। सियासी गलियारों में यह खबर आम है कि कुशवाहा एनडीए में वापसी कर रहे हैं और इसकी घोषणा बस दो-चार दिनों की बात है। तो संभव है कि इसी वापसी की जमीन बनाने के लिए रालोसपा ने सीधे तेजस्वी की दावेदारी पर सवाल उठाने का कदम उठाया है।

यहाँ एक बात और है। महागठबंधन में राजद और कांग्रेस के अलावा फिलहाल छह छोटी पार्टियाँ हैं। ये हैं – रालोसपा, वीआईपी, भाकपा माले, भाकपा, माकपा और सपा। इससे पूर्व एक और पार्टी जीतन राम माँझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा भी महागठबंधन में शामिल थी। लेकिन कुछ समय पहले माँझी ने महागठबंधन का साथ छोड़ अपने पुराने नेता नीतीश कुमार का दामन थाम लिया। जब माँझी महागठबंधन में सीटों पर रार कर रहे थे तो वीआईपी के मुकेश सहनी उनका साथ दे रहे थे। अब मुकेश सहनी रालोसपा का साथ दे रहे हैं। महागठबंधन छोटी पार्टियों की नाजायज माँगों को तवज्जो देने के बिल्कुल मूड में नहीं दिख रहा। वीआईपी भी केक में अपने कद से बड़ा हिस्सा चाहती है। अगर कुशवाहा की एनडीए में वापसी हो जाती है तो उसके बाद एनडीए की निगाह वीआईपी पर ही होगी। माँझी और कुशवाहा इसमें औजार बन सकते हैं।

राजनीतिक विश्वसनीयता में कमी

हालाँकि कुशवाहा चाहे किसी भी गठबंधन में जायें, उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता का ग्राफ काफी नीचे आता दिख रहा है। एनडीए छोड़ने का उनका कारण भी नीतीश कुमार से बराबरी करना था। वे नीतीश से अपना मुकाबला मानते थे, इसलिए एनडीए में अपने लिए नीतीश कुमार के स्तर पर बराबरी पाने की अपेक्षा रखते थे। एनडीए छोड़ कर जाते वक्त कुशवाहा ने कहा कि जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। यह पंक्ति उन्होंने उनकी बात न माने जाने पर नीतीश कुमार के लिए कही थी। तब वे नीतीश कुमार के खिलाफ बहुत आक्रामक थे और विशेष रूप से उन्होंने नीतीश कुमार की शिक्षा नीति को निशाना बनाया था। उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ एक मानव श्रृंखला भी बनायी थी, जिसमें तमाम विपक्षी नेता भी शामिल थे।

हालाँकि तब भी असली वजह उपेंद्र कुशवाहा की महत्त्वाकांक्षा थी। कभी उपेंद्र कुशवाहा नीतीश कुमार से बड़े नेता हुआ करते थे। लेकिन वक्त ने पलटा खाया और नीतीश कुमार काफी आगे बढ़ गये और कुशवाहा फर्श पर आ गये। उपेंद्र कुशवाहा उस अतीत से बाहर नहीं निकलना चाहते। समस्या की जड़ यही है।

महागठबंधन में भी कुशवाहा की समस्या यही है कि वे इसके सबसे बड़े मौजूदा नेता तेजस्वी से बराबरी करना चाहते हैं। शायद कुशवाहा दीवार पर लिखी इबारत पढ़ना नहीं चाहते।

(देश मंथन, 23 सितंबर 2020)