जोर से बोलो तो जमाना सुनेगा

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रवीश कुमार, वरिष्ठ टेलीविजन एंकर :

नफासत का ओढ़ा हुआ पुलिंदा लग रहा था। शख्स की ज़ुबान से नाम ऐसे छलक रहे थे जैसे महल की सीढ़ियों से शख्सियतें उतर रही हों।

ऐसा लगा कि कोई मुझे उन नामों के बीच बाँध कर ले जाने आया है। उसने कदर में भी कोई कमी नहीं की। फिर क्यों जाते जाते कह गया कि आपका शो देखा जाता है। आपको समझना चाहिए। जो तटस्थ हैं समय लिक्खेगा उनका भी अपराध। मेरा क्या अपराध हो सकता है और यह कोई कवि कह रहा है या किसी का कोतवाल। मैं कहाँ गया और किससे मिला इसमें उसकी दिलचस्पी कमाल की थी। धीरे से कही गयी वो बात कविता तो नहीं ही थी। धमकी? 

कहीं जाता हूँ ऐसा लगता है कि कोई निगाह रख रहा है। यार दोस्तों को बताता हूँ तो सब सतर्क रहने को कहते हैं। फोन पर बात नहीं करने को कहते हैं। मैं फोन पर उतना ही आयं बायं सायं करने लगता हूँ। वो मेरा प्राइवेट स्पेस है। आजकल कई लोग ऐसी धमकियाँ देते हैं। उन्हें लगता है कि मैं कुछ फेमस हो गया हूँ और वे मुझे मेरे ‘नाम’ का डर दिखा देंगे। उन्हें नहीं मालूम कि मै ऐसी लोकप्रियता पर रोज गोबर लीप कर सो जाता हूँ। ‘वायरल’ कर देंगे। हँसी आती है ऐसी बातों पर। घंटा। ऐसे लोग और ऐसी डरों को सटहां (डंडा) से रगेद देता हूँ। चिन्ता मत कीजिये यह तथाकथित लोकप्रियता मेरे लिए कबाड़ के बराबर है। कुछ और कीजिये डराने के लिए।

जहाँ जहाँ लोगों से घिरा रहता हूँ तो ऐसा क्यों लगता है कि कुछ कैमरे मुझसे चाहत के नतीजे में रिकार्ड कर रहे हैं। ऊपर वाले ने इतनी तो निगाह बख्शी है। हम बाघ बकरी नहीं हैं, कबूतर हैं। अंदेशों की आहट समझ लेते हैं। पहले बहस के लिए छेड़ते हैं फिर रिकार्ड करते हैं। यह प्रवृत्ति दिल्ली और सोशल मीडिया से शुरू हुई थी जो गाँवों तक पसर गयी है। वैसे पहले भी देखा है ऐसा माहौल।

ऐसा क्या अपने आप हो रहा होगा। किसी गाँव में भीड़ अपनी बात कह रही होती है। सब तरह की बातें। अचानक एक दो लोग उसमें शामिल होते हैं और नारे लगाने लगते हैं। भीड़ या तो संकुचित हो जाती है या नारे लगाने लगती है। उन एक दो लोगों के आने के पहले भी लोग बोलते हुए एक दूसरे को देखते रहते हैं कि उसकी बात सुनकर ये या वो बता तो नहीं देगा। फिर एक या दो लोग जोर जोर से बोलने लगते हैं। यही होगा। जाइये। यहाँ सब वही है। सारे लोग चुप हो जाते हैं। मेरा कैमरा ऐसी मुखर आवाजों से भर जाता है। वहाँ खड़ी भीड़ के बाकी लोग दबी जुबान में बात करने लगते हैं। धीरे से कहते हैं नहीं ऐसा नहीं होगा। ये बोल रहे हैं ठीक है सबको बोलना है। आप एकतरफा सुनकर लौटते हैं।

इसीलिए मतदान से पहले जनमत जानना बेकार है। विज्ञापन ऐसा ताकतवर माहौल रच देता है कि कमजोर मजबूत को देख कर बोलने लगता है। सब वही बोल रहे हैं जो सब सुनना चाहते हैं। इतने शोर शराबे के बीच एक भयानक खामोशी सिकुड़ी हुई है। या तो वो मुखर आवाज के साथ है या नहीं है लेकिन कौन जान सकता है। क्यों लोग अकेले में ज़्यादा बात करते हैं। चलते चलते कान में कुछ कहते हैं। धीरे धीरे यह नफासत दूसरे लोग भी सीखने लगे हैं। अब मतदान केंद्र पर बूथ लूटना नहीं होता। वो उसके मोहल्ले में ही लूट लिया जाता है। टीवी को भी एक लठैत ही समझिये।  

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बातचीत चल रही थी। हर तरह की बात। दिल्ली से आये पत्रकार से जानने बहस करने की उत्सुकता में। छात्रों की प्रखरता और मुखरता पर भावुक हुआ जा रहा था। सोच रहा था कि अलग अलग तरीके से सोचने वाले ये छात्र हिन्दुस्तान का शानदार भविष्य हैं। अचानक एक दो लोग मुखर हो जाते हैं। सारे लोग फिर से चुप या सतर्क। एक ही तरह की आवाज किसी भीड़ की विविधता को क्यों खत्म कर देती है। एक ही तरह की आवाज़ हूट करती है। भीड़ में घुसकर नारे बोलने लगती है। एक शख्स किनारे खड़े मेरे सहयोगी से कहता है कि रवीश जी इनकी बाइट चलायेंगे तो ‘वायरल’ कर दूँगा। यह शख़्स नक्सल समर्थक है। यू ट्यूब से निकाल कर वायरल कर दूँगा। फिर उस शख़्स जैसे कुछ और लोग भीड़ में शामिल हो जाते हैं। कर दो भाई ‘वायरल’। दलाल और हत्यारा कहाकर लोग मंत्री बन जाते हैं। लोग उनके नारे लगाते हैं। माला पहनाते हैं। यह भी कोई शर्मिंदा होने की बात है। धमकियाँ ऐसी दीजिये कि उसे आप अकेले किसी चौराहे पर मेरे सामने दोहरा सके। प्यारे भीड़ पर इतना मत उछलो। भीड़ में उछलने की तुम्हारी इस कमजोरी को अपनी बाँहों में भर कर दूर कर दूँगा। आके गले मिलो और महसूस कर जाओ मैं कौन हूँ। 

अक्सर बोलने वाला ताक़तवर की तरह क्यों प्रदर्शित करता है। कौन लोग हैं जो इनबाक्स या ब्लाग के कमेंट में डराने की भाषा में बात कर जाते हैं। यह जाना पहचान दौर इतिहास में पहले भी गुजरा है और गायब हो गया है। आता रहता है और जाता रहता है। इसीलिए मैं सतर्क नहीं हूँ पर बेखबर भी नहीं।

(देश मंथन, 18 अप्रैल 2014)

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