बन जाने दीजिए ना मोदी को प्रधानमंत्री !

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नदीम एस. अख्तर, शिक्षक, आईआईएमसी :

नरेंद्र मोदी के पीएम बनने पर इतनी हाय-तौबा क्यों??!! बन जाने दीजिए ना प्रधानमंत्री। ये जरूरी है।

जैसे अटल बिहारी वाजपेयी के पीएम बनने के बाद अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा हमेशा के लिए कब्र में दफन हो गया, ठीक उसी तरह मोदी के पीएम बनने के बाद हिंदुत्व और विकास मॉडल जैसे मुद्दे हमेशा के लिए पाताल लोक में समा जायेंगे।

रही समान नागिरक संहिता और धारा 370 की बात, तो अटल जी के पीएम बनने के बाद भाजपा के लिए ये मुद्दे फूटे हुए पटाखे की तरह हो गये हैं।

सबको पता है कि नरेंद्र मोदी कोई कमाल नहीं कर पायेंगे। वो क्या, उनकी जगह किसी भी पार्टी से कोई भी नेता आ जाये, भारत जैसे चल रहा था, जैसे चल रहा है, वैसे ही चलता रहेगा। कुछ नहीं बदलने वाला। हाँ, बस नरेंद्र भाई मोदी और बीजेपी का जो खुमार कुछ लोगों के दिलो-दिमाग पर चढ़ा हुआ है, उसका उतरना जरूरी है। उनके सपनों का टूट कर बिखरना जरूरी है।

और मोदी जी की यह सरकार भी (दूसरे दलों के सहयोग से बनने वाली, बहुमत वाली नहीं) ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगी। अापसी खींचतान और अपने अंतर्विरोधों के चलते जल्द ही केंद्र सरकार रुखसत हो जायेगी, क्योंकि मोदी जी के काम करने की गुजरात वाली शैली, दिल्ली में उनके किसी काम नहीं आने वाली।

मोदी के जाने के बाद हो सकता है देश में दोबारा जल्द चुनाव की नौबत आ जाये या फिर कांग्रेस के समर्थन से एक मिली-जुली कामचलाऊ सरकार बने जो गिरते-पड़ते पाँच साल पूरे करे।

लेकिन अगर नरेंद्र मोदी इस दफा पीएम नहीं बन पाये तो जानिए-समझिए क्या होगा!!! वैसी स्थिति में बनने वाली मिली-जुली सरकार (कांग्रेस के समर्थन से) भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगी और दोबारा चुनाव होंगे। तब नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से दिल्ली की सत्ता में आयेंगे, उन्हें सहानुभूति वोट खूब मिलेंगे और आप समझ सकते हैं कि जिस दिन भाजपा पूर्ण बहुमत से दिल्ली की सत्ता में आयी, उस दिन क्या होगा!!???

भाजपा के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है और आगे देश का संविधान। ऐसी स्थिति में भाजपा क्या कर सकती है, सबको पता है। सो देश का भला इसी में है कि आदरणीय श्री नरेंद्र भाई मोदी जी का फुलाया हुआ गुब्बारा कुछ देर के लिए ही सही, देश के आसमान पर तैरे और हिचकोले खाये। पिन मारने की भी जरूरत नहीं है। ये गुब्बारा इतना कमजोर है कि अपने-आप फूट जायेगा। भारत में लोकतंत्र जिंदा रहे-बचा रहे, इसके लिए यह बेहद जरूरी है।

(देश मंथन, 29 अप्रैल 2014)

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