चुनावी नतीजों पर याद आती कुछ पुरानी बातें

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राजीव रंजन झा :

लोक सभा चुनाव में भाजपा को अकेले अपने दम पर बहुमत पाने के बाद मुझे बीते साल दो तीन साल में लिखी अपनी बहुत-सी पुरानी बातें याद आ रही हैं। क्या भूलूँ क्या याद करूँ? …क्या-क्या गिनाऊँ?

शक था, लेकिन आकांक्षा थी कि जनता एक स्पष्ट बहुमत वाला जनादेश दे। जनता ने दिल खोल कर स्पष्ट बहुमत दे दिया है। एनडीए को नहीं, अकेले भाजपा को दे दिया है।

जब लोग कांग्रेस के लिए 120-140 का आँकड़ा बता रहे थे तो मैं कह रहा था कि कहीं वह 60-70 पर न सिमट जाये। मैंने हाल में 6 मार्च को फेसबुक पर लिखा था, “पिछले साल पुरजोर अटकलें थीं कि मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस ने सोचा कि एक साल और राज कर ही लिया जाये। कांग्रेस ने अगर पिछले साल अप्रैल में चुनाव करा लिये होते तो 120-140 सीटें तो मिल सकती थीं। अब 60-70 की नौबत आ रही है। जब सितारे गर्दिश में हों तो हर कदम उल्टा ही पड़ता है!”

लेकिन यह तो मानना होगा कि भाजपा की ऐसी जीत की कल्पना मैंने नहीं की थी। शायद भाजपा के नेताओं ने भी वास्तव में इसकी कल्पना नहीं की होगी, चुनावी अभियान में किये जाने वाले दावों की बात अलग है। एक तरह से कहा जा सकता है कि अधिकांश जनमत सर्वेक्षण फिर से नाकाम हो गये। उन्होंने भाजपा की बढ़त का रुझान तो देख लिया, लेकिन बढ़त की मात्रा का आकलन करने में चूक कर गये। भाजपा की बढ़त उनके अनुमानों से काफी ज्यादा निकली।

मैंने निवेश मंथन पत्रिका के मई 2014 के ताजा अंक में अपने लेख में कहा था, “सरकार जनमत सर्वेक्षणों से नहीं, जनता के मतदान से आये चुनावी परिणामों के अनुसार बनती है। भारतीय जनता अपने फैसलों से अक्सर ही चौंकाती रही है। इसने 2004 में भी चौंकाया था और 2009 में भी। इस बार भी कौन दावे से कह सकता है कि राजनीतिक पंडितों को चुनाव परिणाम देखने के बाद दाँतों तले अंगुली दबाने की नौबत नहीं आयेगी!”

अब बताइये। क्या आज सारे पंडित दाँतों तले अंगुली दबा कर नहीं बैठे हैं? मैं इसीलिए संख्या के पचड़े से दूर रहा। मैंने इस लेख में कहा था, “क्या पता कि जनता जनमत सर्वेक्षणों और टेलीविजन कैमरों में दिखती लहर को शांत करके एनडीए को केवल 200 सीटों के आसपास ही समेट दे? क्या पता कि जनता इस लहर को तूफान में बदल दे और अकेले भाजपा ही 250 सीटों के पार, यानी बहुमत के करीब चली जाये? भाजपा की पारंपरिक भौगोलिक सीमाएँ हमें उकसाती हैं कि हम उसे 250 के आसपास सीटें मिलने की संभावना को एकदम खारिज कर दें। लेकिन यह भी पहली बार हो रहा है कि गैर-हिंदी भाषी प्रदेशों में भी किसी भाजपा नेता को सुनने के लिए लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ रही हो। इसलिए जनता के फैसले का पूर्वानुमान लगाना कतई आसान नहीं है। इस समय केवल एक ही बात भरोसे के साथ कही जा सकती है कि यूपीए की विदाई पक्की लग रही है और एनडीए ने साफ बढ़त बना ली है। लेकिन एनडीए की सीटें 200 होंगी या 300, इस बारे में दावा करना सट्टा लगाने के बराबर ही है।”

भाजपा और एनडीए की सीटों की संख्या का आकलन इसलिए भी मुश्किल था कि इसने लगातार अपनी स्थिति को पहले से मजबूत किया। जो लोग साल भर पहले कह रहे थे कि एनडीए के लिए 200 सीटों के ऊपर जाना मुश्किल है, वे उस समय की स्थिति के हिसाब से गलत नहीं कह रहे थे। उस समय तो खुद भाजपा के लोग भी यही दावा कर रहे थे कि हम 200 पर पहुँच जायेंगे!

मैंने निवेश मंथन पत्रिका के दिसंबर 2013 के अंक में अपने लेख में कहा था, “चुनावी समर जैसे-जैसे करीब आयेगा, वैसे-वैसे तस्वीर ज्यादा साफ होगी। मुमकिन है कि मोदी निरंतर मजबूत होते जायें। वैसी हालत में भाजपा की चुनावी संभावनाओं का आँकड़ा भी 200 से कहीं ज्यादा ऊपर उठ सकता है। कई बार सर्वेक्षक और समीक्षक हवा और लहर को तो महसूस कर लेते हैं, लेकिन संख्या का ठीक अंदाजा नहीं लगा पाते। उत्तर प्रदेश में मायावती के स्पष्ट बहुमत और उसके पाँच साल बाद अखिलेश को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावनाएँ भी लोग नहीं देख पाये थे। संभव है कि चुनावी नतीजे मोदी और भाजपा के पक्ष में इतने स्पष्ट ढंग से आयें कि किसी अगर-मगर की कोई गुंजाइश ही बाकी न रहे। लेकिन कम-से-कम आज वैसी स्थिति नजर नहीं आ रही।”

उस समय स्पष्ट नतीजों की स्थिति नजर नहीं आ रही थी, क्योंकि तब तमाम जनमत सर्वेक्षण भाजपा को 160-200 के बीच ही सीटें मिलने की संभावनाएँ जता रहे थे। विधान सभा चुनावों के परिणाम आ जाने के बाद निवेश मंथन के जनवरी 2014 के अंक में अपने लेख में कहा था, “दिल्ली और अन्य राज्यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों को देखें तो तस्वीर यही उभरती है कि कांग्रेस के विरुद्ध इस समय देशव्यापी नाराजगी है। इसलिए आगामी लोक सभा चुनावों में उसे भारी नुकसान होने की भविष्यवाणी करने के लिए ज्योतिषी होने की जरूरत नहीं है। साथ ही यह भी दिख रहा है कि पिछले लोक सभा चुनाव की तुलना में भाजपा को बढ़त मिलने वाली है।”

लेकिन उस समय भी मन में यह सवाल बाकी था कि क्या यह बढ़त भाजपा को सत्ता तक पहुँचा सकेगी? दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित सफलता ने ऐसा राजनीतिक माहौल बना दिया था, जो सारे ही राजनीतिक पंडितों के लिए पहेली की तरह था। लोग अटकलें लगा रहे थे कि आम आदमी पार्टी का उदय किस को ज्यादा नुकसान पहुँचाने वाला है।

इस प्रश्न पर मैंने लिखा था, “संभव है कि जो मोदी लहर बनती हुई दिख रही थी, वह ‘आप’ के करिश्मे से टकरा कर थम जाये। संभव है कि कांग्रेस से नाराजगी के चलते जो मतदाता पहले इकतरफा ढंग से भाजपा के साथ जा सकते थे, उनमें से एक बड़ा हिस्सा अब ‘आप’ की ओर आकर्षित हो जाये। लेकिन हमें दिल्ली में हुए उन चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को भी नहीं भूलना चाहिए, जिनमें मुख्यमंत्री पद के लिए अरविंद केजरीवाल को और प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को सबसे लोकप्रिय बताया गया था। वही युवा जो दिल्ली विधान सभा में केजरीवाल को कमान सौंपना चाहता था, पूरे देश की बात सामने आने पर नरेंद्र मोदी के साथ था।”

उस समय ही दिल्ली के आँकड़ों के आधार पर मेरा आकलन था कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस और तीसरी शक्तियों को ज्यादा नुकसान पहुँचा सकती है, जबकि भाजपा का मतदाता उसका साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। मेरा मानना था कि ‘आप’ की ओर वे ही लोग ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं, जो कांग्रेस से नाराज हैं, मगर भाजपा के साथ नहीं जाना चाहते हैं। मैंने लिखा था, “लोक सभा चुनाव में तो भाजपा के मतदाता को उससे दूर खींच पाना और भी मुश्किल होगा, क्योंकि वह केंद्र में सरकार बनाने की प्रबल दावेदार होगी। ऐसे में संभव है कि लोक सभा के चुनाव भाजपा बनाम अन्य की सूरत ले लें, जिसमें ‘आप’ तीसरी शक्तियों के बीच ही कई चेहरों में से एक चेहरा बन कर रह जाये।”

लोक सभा चुनाव के नतीजे सामने आने पर बिल्कुल यही स्थिति दिख रही है कि ‘आप’ को अन्य के बीच भी अपनी गिनती कराने के लिए जूझना पड़ रहा है। एक समय भारतीय राजनीति की दशा-दिशा बदलने की संभावना रखने वाली आम आदमी पार्टी ने निरंतर अपनी ही गलतियों से खुद को इस हालत में पहुँचा लिया।

वापस अगर भाजपा की आशातीत सफलता के विषय पर लौटूँ, तो यह सच साफ स्वीकार करूँगा कि मैं जनता के फैसले का संख्यात्मक पूर्वानुमान लगाने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। मैं एक मोटी बात लिखता रहा कि भाजपा की बढ़त दिख रही है और कांग्रेस अपने ऐतिहासिक न्यूनतम की ओर बढ़ रही है। मोदी को सहयोगी मिलेंगे या नहीं, इस बारे में भी मैंने फेसबुक पर 25 जनवरी को लिख दिया था कि अभी आपको अन्य के खाते में जो सीटें दिख रही हैं, वे चुनाव के बाद एनडीए के खाते में दिखेंगीं। चुनाव के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले ही रामविलास पासवान एनडीए के खाते में दिख गये!

मेरी इस टिप्पणी पर सम्मानित समाजवादी मित्र अफलातून अफलू ने पूछ डाला कि ‘बनिहारी स्टेटस लगाने में संकोच नहीं होता?’ बनिहारी लिखने से शायद उनका आशय था बिका हुआ। लेकिन वे गलतफहमी में सच लिख गये। बनिहारी का असली मतलब मजदूर होता है। मैं कलम का मजदूर हूँ, वही बना रहूँगा।

कुछ ऐसी ही टिप्पणियों के बीच मैंने फेसबुक पर लिखा था, “मैंने भाजपा के बढ़ते कांग्रेसीकरण की बात कही, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैंने कहा कि भाजपा विपक्ष के तौर पर असफल रही, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैंने भाजपा की दिल्ली चौकड़ी को नाकारा बताया, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैंने येदियुरप्पा की आलोचना की, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैंने बाबू भाई बोखारिया को लेकर मोदी की आलोचना की, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैंने एक नोट एक वोट पर भाजपा की खिंचाई की, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैंने तोगड़िया और गिरिराज को लताड़ा, उन्होंने नजरअंदाज किया। मैं उनके लिए भाजपाई ही रहा, क्योंकि मैंने उनके सुर में सुर मिला कर उस व्यक्ति को हत्यारा नहीं कहा। क्योंकि मैंने उस व्यक्ति की बढ़ती लोकप्रियता को फासिस्ट शक्तियों का उभार नहीं कहा। मैं नासमझ ही रहा, क्योंकि मैंने उनके मुहावरे नहीं चुने। मैं उनका विरोधी ही रहा, क्योंकि मैं उनके पाले में नहीं गया…

(देश मंथन, 19 मई 2014)

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