Monday, January 24, 2022
होम चुनाव लोक सभा चुनाव 2014

लोक सभा चुनाव 2014

मतदान के अंदाजी घोड़े

डॉ वेद प्रताप वैदिक, राजनीतिक विश्लेषक :

मतदान के अंदाजी घोड़े अभी से दौड़ने शुरू हो गये हैँ। नरेंद्र मोदी को अपना दुश्मन मानने वाले टीवी चैनल भी यह कहने को मजबूर हो गये हैं कि भाजपा को कम से कम 250 सीटें तो मिलेंगी ही।

मोदी विरोध का विकल्प मोदी

रवीश कुमार, वरिष्ठ टेलीविजन एंकर :

सोलह मई को मतगणना होने वाली है। अभी से सरकार को लेकर क़यास लगा रहे होंगे। यह एक सामान्य और स्वाभाविक लोकतांत्रिक उत्सुकता है।

हम सब एक हैं बस टीवी में नहीं हैं

रवीश कुमार, वरिष्ठ टेलीविजन एंकर :

मीडिया में जो चुनाव दिखता है वो चुनाव की हक़ीकत के बहुत करीब नहीं होता। हम तक जो पहुँचता है या परोसा जाता है वो मीडिया के पीछे होने वाली गतिविधियों का दशांश भी नहीं होता। जो सवाल होते हैं वो हवाई होते हैं और जो जवाब होते हैं वो करिश्माई।

मुलायम की बिसात पर क्या राहुल क्या मोदी

पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :

नेताजी से ज्यादा यूपी की राजनीति कोई नहीं समझता। और सियासत की जो बिसात खुद को पूर्वांचल में खड़ा कर नेताजी ने बनायी है, उसे गुजरात से आये अमित शाह क्या समझे और पुराने खिलाड़ी राजनाथ क्या जाने।

शरद यादव का मोहभंग

डॉ वेद प्रताप वैदिक, राजनीतिक विश्लेषक :

जनता दल (यू) के अध्यक्ष शरद यादव के मोह-भंग से कई सबक मिलते हैं। शरद यादव ने एक बार नहीं, दो बार सार्वजनिक-तौर पर कहा है कि जातिवादी राजनीति ने बिहार का नाश कर दिया है।

अमेठी का बदला बनारस में?

अखिलेश शर्मा, वरिष्ठ संपादक (राजनीतिक), एनडीटीवी : 

इसे अघोषित समझौता कहें। या एक राजनीतिक परिपाटी। पर कुछ अपवादों को छोड़ ऐसा होता आया है। बड़े नेता चाहे देश भर में घूम-घूम कर एक-दूसरे पर तीखे और करारे हमले करें, मगर एक-दूसरे के चुनाव क्षेत्रों में प्रचार करने नहीं जाते।

दादा, दीदी या मोदी?

अखिलेश शर्मा, वरिष्ठ संपादक (राजनीतिक), एनडीटीवी :

भर दोपहर, सिर पर चढ़े सूरज का कहर। कोई छाता लिए, तो कोई सिर पर कपड़ा डाले हुए। उमस भरी गर्मी से निजात पाने के लिए हर कोई अपने हिसाब से तैयारी कर आया है।

मोदी पर एफआईआर के मायने

अखिलेश शर्मा, वरिष्ठ संपादक (राजनीतिक), एनडीटीवी :

एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव आयोग के आदेश के बाद गुजरात सरकार ने दो एफआईआर दर्ज कर ली हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि मोदी ने जनप्रतिनिधित्व कानून की दो धाराओं 126 (1)(a) और 126 (1)(b) के उल्लंघन किया है।

मोदी, सेल्फी और सोशल मीडिया

अखिलेश शर्मा, वरिष्ठ संपादक (राजनीतिक), एनडीटीवी : 

अहमदाबाद में वोट देने के बाद नरेंद्र मोदी ने लाखों युवाओं की ही तर्ज पर सेल्फी ली। सेल्फी यानी मोबाइल से अपनी ही फोटो खींचना और फिर इसे सोशल मीडिया जैसे ट्विटर या फेसबुक पर डालना। इस चुनाव में ये सबसे अधिक प्रचलन में आया है।

मनोरंजन या मनोभंजन?

डॉ वेद प्रताप वैदिक, राजनीतिक विश्लेषक :

चुनाव के दौरान सभी दलों और सभी प्रमुख नेताओं के बयानों को पढ़-सुनकर आम आदमी मुँह में उंगली दबा रहा है।

बन जाने दीजिए ना मोदी को प्रधानमंत्री !

नदीम एस. अख्तर, शिक्षक, आईआईएमसी :

नरेंद्र मोदी के पीएम बनने पर इतनी हाय-तौबा क्यों??!! बन जाने दीजिए ना प्रधानमंत्री। ये जरूरी है।

बीजेपी-मुलायम ही सही मायने में मिले हुए

विकास मिश्रा, आजतक :

बात 1990 की है। इलाहाबाद के सलोरी मुहल्ले में सालाना उर्स था मजार पर। बहुत मजा आ रहा था। कव्वाल झूम झूमकर गा रहे थे।

- Advertisment -

Most Read

आरएसएस पर नेहरू का वह अभियान, जिसे मोदी ने पलट दिया

देश में आरएसएस पर 18 महीने तक प्रतिबंध रहा और इस दौरान नेहरू की सरकार में नियोजित तरीके से समाज में आरएसएस का दानवीकरण करने का अभियान चला। उस समय महज दो शब्द कहने से लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा चली जाती थी, सरकारी दफ्तरों में काम कर रहे अधिकारी-कर्मचारियों की नौकरी चली जाती थी, व्यापारियों पर मुकदमे हो जाते थे। वे दो शब्द थे - आरएसएस एजेंट।

सिंघु बॉर्डर : लखबीर सिंह हत्याकांड, एक चुप्पी के बीच कई प्रश्न?

एक दलित को निहंगों द्वारा मारे जाने पर सभी मौन बैठे हैं। वे विरोध नहीं कर रहे, सड़कों पर नहीं निकल रहे और न ही लखीमपुर खीरी जैसी बहसें कर रहे हैं। सिंघु बॉर्डर पर हत्या भी है और उसमें दलित भी है। और इतना ही नहीं, उसमें निर्ममता की पराकाष्ठा है।

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार की अजब-गजब!

महाराष्ट्र में न जाने कितने किसान आत्महत्या कर चुके हैं और वहाँ की कानून व्यवस्था पर बड़े प्रश्न उठ रहे हैं। परंतु फिर भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में घटित हिंसा में मारे गये किसानों की हत्या के विरोध में अपने ही प्रदेश में बंद करवाया, और वह भी ऐसा बंद जिसमें उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आम लोगों पर हिंसा की।

एडीजे उत्तम आनंद की हत्या : ढाई माह में ढाई कदम पर अटकी जाँच

जाँच में सीबीआई की टीम वहीं अटकी हुई है, जहाँ पुलिस ने जाँच शुरू की थी। इस बीच सीबीआई ने वैज्ञानिक जाँच का सहारा लिया। रहस्य की जानकारी देने वाले को पहले पाँच लाख तथा बाद में दस लाख रुपये का ईनाम देने के इश्तेहार चिपकाये गये। झारखंड उच्च न्यायालय भी अब तक की जाँच से संतुष्ट नहीं है। अब सीबीआई की ताक-झाँक कोयलांचल के चर्चित घरानों में शुरू हुई है।
Cart
  • No products in the cart.