बस औपचारिकता निभाने के लिए जारी कांग्रेसी घोषणा-पत्र

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राजीव रंजन झा :

कल कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए अपना घोषणा-पत्र पेश किया, जिसके बारे में ज्यादातर टिप्पणियाँ अनुत्साही ही मिलीं।

जहाँ तक मुझे लगता है, समस्या घोषणा-पत्र की बातों में और इसके वादों में नहीं है। समस्या यह है कि आप इसकी हर बात पर पलट कर पूछ सकते हैं – साहब, यह काम पिछले 10 सालों में क्यों नहीं किया? अर्थव्यवस्था के नजरिये से इसमें सबसे अहम बात यह कही गयी है कि कांग्रेस अगले तीन वर्षों के भीतर 8% से अधिक विकास दर हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसे अगले दो दशकों तक बनाये रखा जायेगा। यह बात सुन कर सबसे पहले तो यही ध्यान में आता है कि जिस दल के एक दशक के राज में विकास दर 5% से भी नीचे की तलहटी पर आ गयी हो, उसे यह वादा या दावा करने में जरा भी हिचक नहीं हुई!

कांग्रेस अपनी इस नाकामी को आँकड़ों की बाजीगरी से छिपाना चाहती है। इसने कहा है कि “पिछले 10 वर्षों में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए की सरकारों ने तेजी से आर्थिक विकास करने पर जोर दिया है और इससे हम काफी हद तक सफल भी रहे हैं। हम एनडीए सरकार की 5.9% वार्षिक आर्थिक विकास दर की तुलना में प्रतिवर्ष 7.5% की आर्थिक विकास दर हासिल करने में सफल हुए हैं। यह एक वास्तविकता है कि कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए की आर्थिक विकास दर तेजी से बढ़ी है, भारतीय इतिहास में पहले कभी भी ऐसा नहीं देखा गया है। यूपीए सरकार के दौरान जो विकास हुआ वह अतुलनीय है।”

लेकिन वास्तव में यह देखना चाहिए कि किस सरकार ने विकास दर को कहाँ से कहाँ पहुँचाया। साल 1997-98 में जीडीपी विकास दर 4.30% थी। वाजपेयी सरकार के छह वर्ष पूरे होने के बाद 2003-04 में विकास दर 7.97% पर थी। बीच के वर्षों में कुछ झटके भी लगे थे, क्योंकि साल 2000-01 के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था डाँवाडोल हुई थी। मगर वाजपेयी सरकार ने इन झटकों से अर्थव्यवस्था को सँभाल लिया। 

यूपीए सरकार बार-बार अपने 2004-09 के प्रथम कार्यकाल में शानदार विकास दर का हवाला देती है। इन पाँच वर्षों की औसत विकास दर 8.4% रही है। इन पाँच में से तीन वर्षों के दौरान 9% से भी ज्यादा विकास दर हासिल हुई। लेकिन इस त्वरित विकास के लिए एनडीए शासन से मिले मजबूत आधार को भी श्रेय देना चाहिए। अर्थव्यवस्था की विकास दर सामानों से लदी मालगाड़ी की तरह होती है। यह रफ्तार पकड़ने में भी समय लेती है और ब्रेक लगाने में भी। एनडीए ने यूपीए को तेज रफ्तार से चलती गाड़ी सौंपी और पाँच साल मजे में निकल गये। लेकिन इसी दौरान एक के बाद एक वे बड़े घोटाले हुए, जिन पर यूपीए-2 के शासन में हंगामा मचा। 

घोटाले के आरोपों से सन्न यूपीए-2 ने पूरे शासन को लकवा-ग्रस्त कर दिया, जिसका असर सामने है। भारत की विकास दर साल 2011-12 में 6.69% पर आ गयी, अगले साल 2012-13 में केवल 4.47% रही और इस साल यानी 2013-14 के लिए अग्रिम अनुमान 4.86% का है। क्या पता यह अग्रिम अनुमान भी बाद में उसी तरह घटाना पड़े, जिस तरह 2012-13 के लिए घटाया गया। 

इसलिए जब कांग्रेस का घोषणा-पत्र कहता है कि “कांग्रेस की अगुवाई में अगली सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य 8% आर्थिक विकास दर पुन: हासिल करना है”, तो इस पर रत्ती-भर भी भरोसा नहीं होता। 

कांग्रेस ने इस घोषणा-पत्र में 2014-19 के लिए आर्थिक कार्य-योजना भी पेश की है। इसमें लिखा गया है कि हम 2016-17 तक वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3% तक लाने तथा इसे हमेशा के लिए 3% से नीचे रखने का संकल्प करते हैं। यह वादा भी गरीबी हटाओ के नारे जैसा हो गया है। इसकी समय-सीमा अनंत ढंग से बढ़ती जा रही है। 

आगे इसमें कहा गया है कि हमारे चालू खाते के घाटे की पूर्ति केवल विदेशी निवेश से की जा सकती है, भले ही वह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) हो या संस्थागत विदेशी निवेशक (एफआईआई) हो या बाह्य वाणिज्यिक ऋण (ईसीबी) हो या किसी भी प्रकार का विदेशी निवेश हो। इसलिए, विदेशी निवेश को अवरूद्ध करने की न तो हमारी कोई सोच है और न ही इसमें कोई ऐसी गुंजाइश है। विदेशी निवेश को अवरुद्ध नहीं करने की सोच बाजार विश्लेषकों को पसंद आयेगी। लेकिन आश्चर्य यह है कि चालू खाते के घाटे की पूर्ति के लिए निर्यात बढ़ाने के विकल्प पर क्यों नहीं जोर दिया जा रहा?

महँगाई इस सरकार के विरुद्ध आम आदमी का सबसे बड़ा इल्जाम है। कीमतों में स्थिरता के मसले पर घोषणापत्र में सफाई देने वाले अंदाज में कहा गया है कि एक विकासशील अर्थव्यवस्था में हमें यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा कि जब हमारा लक्ष्य उच्च विकास कर पाना है तो यह स्वाभाविक है कि महँगाई में थोड़ा वृद्धि हो सकती है। लेकिन 2014 का घोषणा-पत्र यह नहीं बताता कि 2009 के घोषणा-पत्र में 100 दिनों में महँगाई घटाने के वादे का क्या हुआ!

आगे इसमें कहा गया है कि मौद्रिक नीति बनाते समय भारतीय रिजर्व बैंक को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह ऐसी नीतियाँ बनाये, जिससे कीमतों में स्थिरता और विकास के बीच संतुलन बना रहे। ऐसा कह कर कांग्रेस महँगाई पर नियंत्रण पाने की सरकार की जिम्मेदारी को पूरी तरह से आरबीआई पर ठेल रही है। आरबीआई ने विकास दर धीमी होने का जोखिम उठाते हुए भी लगातार ब्याज दरों को ऊँचा रखा। आरबीआई ने हाल के वर्षों में कई बार कहा है कि महँगाई पर नियंत्रण पाने के लिए उसे जो कुछ करना था, वह उसने किया है और इसके आगे सरकार को कदम उठाने हैं। आगे भी कांग्रेस महँगाई पर नियंत्रण के लिए किस तरह के कदम उठाने की बात सोचती है, इस पर घोषणा-पत्र मौन है। 

इसमें वादा किया गया है कि हम अपने ढाँचागत विकास का पुनर्निर्माण करेंगे और इसमें नये ढाँचागत आयामों को व्यापक रूप से शामिल करेंगे। कहा गया है कि हम इसमें ऐसे प्रतिमान एवं मॉडल को लागू करेंगे जो प्रामाणिक हों। तो क्या बीते 10 वर्षों में यूपीए ने अप्रामाणिक मॉडल पर काम किया? 

घोषणा-पत्र कहता है कि हम सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल को अधिक पारदर्शी एवं प्रतिस्पर्धी बनायेंगे, जिसे व्यापक रूप से उपयोग में लाया जा सकेगा। दीर्घकालिक निधियों तथा निवेशों की पूलिंग के लिए हम नयी वित्तीय संरचनाओं का सृजन करेंगे। फिर से प्रश्न यही उठता है कि इस काम के लिए 10 साल अपर्याप्त थे क्या?

अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ी विकास दर के बीच सबसे ज्यादा चोट विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र पर पड़ी है। कांग्रेस का घोषणा-पत्र कहता है कि हम विनिर्माण, विशेष रूप से निर्यात हेतु विनिर्माण पर ज्यादा ध्यान देंगे। इसके लिए निर्यात उत्पाद संबंधी केंद्र एवं राज्य के सभी करों को या तो समाप्त कर देंगे या उसमें संशोधन करेंगे। यह यह प्रस्ताव रखेंगे कि इस संबंध में एक न्यूनतम टैरिफ संरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि भारत में सामग्रियों व वस्तुओं के विनिर्माण को प्रोत्साहन दिया जा सके। एक बार फिर प्रश्न यही है कि अब तक ऐसा करने से आपको रोका किसने था?

कांग्रेस ने पिछली बार की तरह एक बार फिर 100 दिनों का एजेंडा पेश किया है। स्वाभाविक है कि इससे एक बार फिर पाँच साल पहले के उस वादे की याद आ जायेगी कि 100 दिनों में महँगाई कम करेंगे। 

इस ताजा एजेंडा में कहा गया है कि 100 दिनों के भीतर संसद में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक को पेश किया जायेगा और एक वर्ष के भीतर पारित कराया जायेगा। जीएसटी लागू करने की कवायद कई सालों से चल रही है। कांग्रेस विपक्ष के असहयोग को इसे लागू नहीं करा पाने के लिए कसूरवार बताती रही है। लेकिन अगर कांग्रेस दोबारा सत्ता में आयी तो इस बार विपक्ष का सहयोग लेने के लिए वह पहले से अलग क्या करेगी? विपक्ष, खास कर भाजपा की आपत्तियों को दूर करने के लिए इसने बीते सालों में क्या किया?

कांग्रेस के 100 दिनों के एजेंडा के मुताबिक वह सुनिश्चित करेगी कि नयी लोकसभा के गठन के पहले वर्ष में ही नयी प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) लागू हो। लेकिन कांग्रेस ने यह क्यों नहीं बताया कि साल भर पहले ही लगभग सारी तैयारी हो जाने के बावजूद वह इसे लागू क्यों नहीं करा सकी? कांग्रेस अगर चाहती तो साल 2013 के बजट के साथ ही इसे पारित करा सकती थी। डीटीसी की तैयारी तो 2009 के आम चुनाव से भी पहले से ही चल रही थी। लेकिन प्रत्यक्ष कर के कानून में आमूलचूल बदलाव लाने का यह प्रयास प्रणव मुखर्जी और पी. चिदंबरम का वॉलीबॉल बन गया। 

एक दिलचस्प वादा यह है कि युवाओं के लिए 10 करोड़ नयी नौकरियों और उद्यमशीलता के सृजन हेतु कांग्रेस एक विस्तृत जॉब एजेंडे को लागू करेगी। अच्छा होता कि कांग्रेस इस वादे के साथ यह भी बताती कि बीते 10 वर्षों में रोजगार सृजन का उसका रिकॉर्ड कैसा रहा है। मगर जो आँकड़े हैं, उन्हें कांग्रेस शर्म के मारे सामने रख ही नहीं सकती। 

घोषणा-पत्र में कहा गया है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक स्थायी निकाय राष्ट्रीय निवेश सुविधा प्राधिकरण स्थापित किया जायेगा। इसमें एक पूर्णकालिक सचिव होंगे और इसका मुख्य उद्देश्य लंबित परियोजनाओं को चिन्हित करने तथा अंतर-मंत्रालयी मुद्दों का निवारण करना होगा, ताकि बड़ी परियोजनाओं, विशेष रूप से ढाँचागत क्षेत्र में अतिशीघ्र एवं पारदर्शी अनुमोदन किये जा सकें। यह प्रस्ताव सराहनीय लगता है। हाल में निवेश संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीआई) ने काफी परियोजनाओं के अनुमोदन की गति को बढ़ाया है। हालाँकि ऐसी भी खबरें आती रही हैं कि सीसीआई से अनुमोदित परियोजनाएँ जमीनी स्तर पर फिर से अटक जा रही हैं। ऐसे में इन जमीनी बाधाओं को दूर करने के उपाय भी सामने रखे जाने चाहिए थे। 

राष्ट्रीय पर्यावरणीय मूल्यांकन एवं निगरानी प्राधिकरण के गठन के लिए विधेयक पारित करने का भी वादा किया गया है, ताकि एक निश्चित समय-सीमा में पर्यावरणीय मूल्यांकन हो और निश्चित समय-सीमा में एवं पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये पर्यावरणीय मंजूरियों के लिए सिफारिशें की जायें। यह भी एक अच्छा प्रस्ताव लगता है। लेकिन प्रश्न उठता है कि खुद पर्यावरण मंत्रालय इसी तरह से काम क्यों नहीं कर सकता? अगर मंत्रालय ऐसा नहीं कर पा रहा तो कोई नया प्राधिकरण कैसे इन उद्देश्यों को पूरा कर लेगा?

वोडाफोन विवाद का असर भी इस घोषणा-पत्र पर दिख रहा है। इसमें कहा गया है कि हम विदेशी कंपनियों के विलय एवं अधिग्रहण के लिए एक स्पष्ट नीति लायेंगे और साथ ही यह सुनिश्चित भी करेंगे कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ/विदेशी निकाय ऐसे अधिकार-क्षेत्र में करों का भुगतान करें, जहाँ उन्होंने लाभ कमाया है। 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कामकाज से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए कहा गया है कि हम स्पष्ट खाका लागू करेंगे, जिसके अंतर्गत बैंकों का पुन:पूँजीकरण, गैर-निष्पादनीय परिसंपत्तियाँ (एपीए), प्रचालनात्मक स्वायत्तता, मानक संसाधन विकास तथा प्रत्येक बैंक में उत्तराधिकारी अधिकारियों के नियोजन को शामिल किया जायेगा।

इस पूरे घोषणा-पत्र को पढ़ने से यह स्पष्ट दिखता है कि इसमें नयी सोच की कमी है और बीते 10 वर्षों की थकान है। ऐसा लगता है कि हाल के जनमत-सर्वेक्षणों के मद्देनजर पार्टी ने केवल एक औपचारिकता निभाने के लिए यह घोषणा-पत्र जारी कर दिया है।

(देश मंथन, 27 मार्च 2014)

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