बिहार से अलग नतीजे क्यों रहे उत्तर प्रदेश चुनाव के?

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राजीव रंजन झा : 

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में प्रचार, मतदान और मतगणना तक के समूचे दौर में लोगों को बार-बार बिहार चुनाव भी याद आता रहा। 

संभवतः इसीलिए शुरुआती तीन-चार चरणों तक बहुत-से लोग भाजपा को पहले स्थान पर भी देखने से मना कर रहे थे। बाद के चरणों में भाजपा की स्थिति कुछ बेहतर होने की बातें कही गयीं। अंतिम चरण में, खास कर बनारस में तीन दिनों तक खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डटे रहने के बाद यह माना गया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा को कुछ बढ़त मिल सकती है। पर मतगणना के बाद यही हकीकत सामने आयी है कि भाजपा प्रदेश के हर क्षेत्र में और चुनाव के हर चरण में सबसे बहुत आगे चल रही थी। 

आखिर उत्तर प्रदेश में हुआ क्या? इसे 2014 से नहीं, 2007 से समझना होगा। 

2007 में उत्तर प्रदेश की जनता को बदलाव चाहिए था। भाजपा विकल्प नहीं बन पायी थी। लोगों ने मायावती को चुन लिया। 

2012 में मायावती से निराश जनता को फिर बदलाव चाहिए था। भाजपा फिर से विकल्प नहीं बन पायी थी। लोगों को सपा का पुराना राज याद था, पर अखिलेश के नये चेहरे से उम्मीद बनी। लोगों ने उनको चुन लिया। 

2017 में जनता को फिर बदलाव चाहिए था। अखिलेश ने पाँच साल के भ्रष्टाचार और गुंडाराज का पाप पिता और चाचा के सिर पर डाल कर खुद को पाक-साफ दिखाने की नौटंकी रची, पर भुक्तभोगी जनता इस नौटंकी की हकीकत जानती थी। जनता मायावती से पिछली निराशा भूली नहीं थी। वहीं भाजपा खुद को सत्ता की दौड़ में दिखाने में सफल रही। लोगों ने भाजपा को चुन लिया।

राजनीतिक विश्लेषक ओबीसी, दलित, मुसलमान जैसे जातीय-मजहबी समीकरणों पर इन दलों का नफा-नुकसान तौलते रहे। पर इन हवाई आकलनों के विपरीत जमीनी स्तर पर ये समीकरण बुरी तरह छितरा गये। मुस्लिम मतदाताओं को थोक में अपनी ओर रिझाने के लिए सपा और बसपा दोनों से खुलेआम अपीलें कीं, दलीलें दी। बयानों और भाषणों में साफ तौर पर की जाने वाली मजहबी अपीलों और दलीलों ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और चुनाव आयोग के नियमों तो धता बता कर रख दिया। इन पर न्यायालय और आयोग कोई फैसला करे न करे, पर जनता ने खुद अपना फैसला सुना दिया। जनता ने इन दोनों दलों को मुस्लिम वोटों के लिए लड़ रही दो बिल्लियों के रूप में देखा। 

मगर मीडिया ने ज्यादा तवज्जो दी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के श्मशान बनाम कब्रिस्तान और होली बनाम ईद वाले भाषणों को। मीडिया में होने वाली बहसों में भले ही भाजपा को एक आरोपी की तरह पेश किया गया, मगर मोदी जनता तक यह संदेश पहुँचाने में सफल रहे कि वे सांप्रदायिक भेदभाव पैदा नहीं कर रहे, बल्कि जो लोग ऐसा कर रहे हैं उनकी कारस्तानी को उजागर कर रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश की राजनीति जातीय खाँचों में बँटी रही है, जिसमें सपा को ओबीसी और बसपा को दलित पार्टी कहा जाता रहा है। मगर भाजपा ने जनता के सामने यह प्रस्तुत किया कि सपा यादव पार्टी और बसपा जाटव पार्टी बन गयी है। चुनाव परिणामों ने यह दिखाया है कि भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित मतदाताओं में काफी बड़े स्तर पर जगह बना ली है। 

बिहार चुनावों के साथ इन चुनावों के नतीजों को अगर जोड़ कर देखें, तो यही परिदृश्य उभर रहा है कि गैर-भाजपावाद की राजनीति के इस दौर में जहाँ भी भाजपा के विरुद्ध एक से ज्यादा शक्तियाँ हों और भाजपा बनाम अन्य सभी की सीधी लड़ाई ठन जाये, वहाँ भाजपा घाटे में रहेगी। लेकिन जहाँ भी तिकोनी या चौकोनी लड़ाई होगी, वहाँ भाजपा आसानी से बढ़त बनाने की स्थिति में है। जहाँ भाजपा के मुकाबले केवल एक ही दल हो, वहाँ स्थिति इस पर निर्भर करती है कि मुकाबले में कौन है। मसलन, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में इसके मुकाबले में कमजोर कांग्रेस है, जबकि ओडिशा में इसके मुकाबले में मौजूद नवीन पटनायक की पकड़ अब तक ढीली नहीं हुई है।

इस बात को अब भाजपा भी बखूबी समझेगी और बाकी सारे दल भी। इसलिए अब से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव तक एक तरह की रस्साकशी चलेगी। जहाँ भाजपा हरसंभव कोशिश करेगी कि तमाम राज्यों में उसकी विरोधी शक्तियाँ एकजुट न हो सकें, और अगर संभव हो तो कुछ विरोधी उसके पाले में आ जायें। खास नजर बनी रहेगी नीतीश कुमार पर। प्रधानमंत्री मोदी को लेकर नीतीश अब वैसी कटुता नहीं दिखा रहे हैं, जैसी कुछ समय पहले तक दिखाते थे। इसलिए यह कयास लगाना अस्वाभाविक नहीं है कि जरूरत पड़ने पर वे फिर से एनडीए के पाले में लौट सकते हैं। हालाँकि जब तक राज्य सरकार में लालू खेमा उनके लिए बड़ी मुसीबत पैदा नहीं करता, तब तक उन्हें ऐसी जरूरत महसूस नहीं होगी। लिहाजा अभी वे देखो और इंतजार करो की नीति पर चलेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए उनके सुर पहले से ज्यादा नरम हो सकते हैं। 

पर दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों को करारी चोट लगी है। इस चोट से अगर ये दोनों महसूस करें कि भाजपा और खास कर मोदी के करिश्मे का सामना वे साथ आये बिना नहीं कर सकते, तो अखिलेश ‘बुआ जी’ को मनाने के गंभीर प्रयास कर सकते हैं। मायावती ने चुनाव परिणामों के बाद जिस तरह से ठीकरा ‘ईवीएम की गड़बड़ी’ के कथित आरोप पर फोड़ने की कोशिश की है, उससे जाहिर है कि वे इस हार को पचा नहीं पा रही हैं। ऐसे में तिलमिलायी हुई मायावती आने वाले समय में अखिलेश के आमंत्रण को स्वीकार कर लें, तो इसमें कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होगा। अगर उत्तर प्रदेश में लगभग सवा तीन सौ सीटों से ज्यादा की ऐतिहासिक जीत के घमंड में भाजपा 2019 में कांग्रेस, सपा और बसपा के महागठबंधन से मिल सकने वाली चुनौती को नजरअंदाज करके चलेगी तो यह गलती उसे भारी पड़ सकती है।

(देश मंथन, 14 मार्च 2017)

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