आपका दोहरापन सबको दिखने लगा है हुजूर!

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आपको तस्लीमा नसरीन पर हुए अत्याचारों में मर्दवादी अहंकार और मजहबी उन्माद का घालमेल नहीं दिखा था, लेकिन नारीवादी होने का तमगा आपसे कोई नहीं छीन सकता।

और वे आप ही हैं ना, जो मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में जयपुर लिट फेस्ट में तस्लीमा नसरीन को प्रतिबंधित किये जाने पर मुँह में दही जमाये बैठे हैं? लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आपसे बड़ा पैरोकार कौन है भला!

तारेक फतेह को लेकर आप ही चिढ़ते हैं ना कि हमेशा उल्टा-पुल्टा बोलता रहता है, उसे भला यहाँ आकर कुछ बोलने का क्या हक? 

सलमान रश्दी तो दशकों से आपका भी खलनायक है ना? एक किताब लिखने के कसूर में? 

पर हाँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आपसे मुखर झंडाबरदार कोई नहीं, क्योंकि मकबूल फिदा हुसैन की नंगी तस्वीरों में आपने कला देखी थी। 

आलोक तोमर ने डेनमार्क वाले व्यंग्य चित्रों का विरोध किया था तो क्या हुआ, वे आपकी ही जमात के थे तो क्या हुआ, पर उन्होंने संदर्भ दिखाने के लिए उन व्यंग्य चित्रों को छापने का घोर गुनाह क्यों कर दिया? किसी आतंकवादी की तरह उनकी गिरफ्तारी वाजिब ही नहीं, जरूरी भी थी आपकी नजर में, ताकि सबको सबक मिले।

शार्ली हेब्दो के खून-खराबे पर अफसोस तो हुआ था आपको, पर लगे हाथ आप उन चित्रों की मजम्मत करने का सेक्युलर फर्ज भी नहीं भूले थे। कलाकार की अभिव्यक्ति ने तब आपकी लक्ष्मण रेखा को लांघ लिया था ना। 

कमल हासन जब विश्वरूपम में आतंकवादियों को दिखाने के चलते फतवाबाज मौलवियों और सेंसरबाज सरकारों से जूझते हैं, तो आपकी अभिव्यक्ति कहीं विश्राम कर रही होती है। 

आपकी अभिव्यक्ति की बत्ती कब जलती है और कब बुझी रहती है, यह अब सबको दिखने लगा है हुजूर! आपका बयान आने से पहले लोग बता सकते हैं कि आप क्या बोलेंगे!

(देश मंथन, 30 जनवरी 2017)