राजीव रंजन झा : 

एक रेस्टोरेंट के ग्राहक बड़े नाखुश थे। खाना अच्छा नहीं था। वेटरों को तमीज नहीं थी। ऑर्डर देने के बाद खाना कब टेबल पर आयेगा मालूम ही नहीं पड़ता था। खाने के बीच में दो रोटी और मंगा ली तो शायद दोपहर से शाम भी हो जाये आते-आते। पर उस इलाके में कोई और रेस्टोरेंट था नहीं, इसलिए ग्राहकों को मजबूरी में वहीं खाना पड़ता था। 

एक के बाद एक जो लोग मैनेजर बन कर आते थे वे महाभ्रष्ट थे, लूट मचा रखी थी। ऐसे में लगातार घाटा तो होना ही था। आखिर रेस्टोरेंट बिक गया। नये मालिक को जल्द समझ में आ गया कि मामला ठीक नहीं चल रहा है। उसने एक काबिल, कर्मठ, ईमानदार, मैनेजर चुना। 

नये मैनेजर ने काम सँभालते ही देखा कि रसोई टूटी-फूटी, बहुत गंदी है, सारे बर्तन-चूल्हे वगैरह खराब हालत में हैं और एक नयी रसोई बनाने की जरूरत है। उसने नयी रसोई का निर्माण शुरू करा दिया। लेकिन ग्राहकों को खाना खिलाते रहना था, इसलिए नयी रसोई बनने तक गंदी रसोई में ही बना खाना बनाया जाता रहा। 

मैनेजर ने देखा कि रेस्टोरेंट में टेबलों और फर्श पर गंदगी फैली रहती है। उसने कुछ लोगों को लगातार सफाई के काम में लगा दिया। मैनेजर के ये अंदाज देख कर ग्राहकों को उम्मीद जगी कि अब शायद रेस्टोरेंट का हाल सुधरने वाला है। 

पर तभी मैनेजर ने देखा कि 10 साल पुराने मेनू वाली दरें ही चल रही हैं। उसने तुरंत नया मेनू छपवाया, जिसमें हर व्यंजन के दाम बढ़े हुए थे। कुछ ग्राहकों ने विरोध किया तो मैनेजर ने हिसाब-किताब दिखा दिया कि इसके बाद भी रेस्टोरेंट घाटे में ही चल रहा है। ग्राहकों ने कहा कि घाटा तुम्हारी बदइंतजामी के चलते होगा, हम तो पूरे पैसे दे ही रहे हैं। पर मैनेजर ने उनकी एक न सुनी। उसने गिना दिया कि जो खाना बचता है उससे हम लंगर भी तो चलाते हैं। 

खैर, नयी रसोई का निर्माण जोरों पर था। मैनेजर ईमानदार था, इसलिए उसने पूरा जोर लगा रखा था कि ठेकेदार कोई घपला न करे। उसने रेस्टोरेंट मालिक की महत्वाकांक्षाओं को ध्यान में रख कर अलग से एक पाँच-सितारा रेस्टोरेंट बनाने की भी तैयारियाँ शुरू कर दीं। 

ग्राहकों की शिकायतों पर तुरंत सुनवाई करने के लिए उसने हर टेबल पर एक घंटी का बटन लगवा दिया, घंटी सीधे उसके केबिन में बजती थी। घंटी कब किस टेबल से बजी, यह देखते रहने के लिए उसने एक खास आदमी अपने केबिन में बिठा दिया। वेटरों पर इसका थोड़ा असर पड़ा, वे कुछ चुस्त हुए। 

मगर नयी रसोई बनने में तो अभी समय लगना था, और पुरानी रसोई को सुधारना आसान न था। रसोइये बीसियों सालों से वहाँ काम कर रहे थे। आधा राशन अपने घर भिजवाना उनकी आदत में शामिल था। मैनेजर को इसका पता तो था, पर खुद लाख ईमानदार होने के बाद भी वह रसोइयों की चोरी नहीं रोक पाया। केवल राशन की चोरी ही नहीं, रसोई बनाने में भी वे पूरे लापरवाह थे। रसोई घर चूहों, कीट-पतंगों, तिलचट्टों और छिपकलियों की लुकाछिपी का अड्डा था। 

इसका नतीजा जल्दी सामने आ गया। एक ग्राहक की टेबल पर खाना परोसे जाने के साथ ही बवाल मच गया। खाने में मरी छिपकली पड़ी थी। हंगामा मचा। मैनेजर ने एक सहायक रसोइये और एक वेटर की छुट्टी कर दी। लेकिन रसोई का हाल नहीं सुधरा। 

पर मैनेजर को पूरा भरोसा था कि नयी रसोई बनते ही सब कुछ ठीक हो जायेगा। किसी ने पूछा कि रसोई तो नयी होगी, पर पुराने रसोइयों की बिगड़ी आदत कैसे सुधारेंगे? मैनेजर ने जवाब दिया, मैं जब से आया हूँ, खून-पसीना एक करके काम कर रहा हूँ। मेरी मेहनत देख कर बाकी सब पर भी असर होगा। 

पर राशन की चोरी के चलते घाटा अब भी जारी था। मैनेजर ने कमाई के नये रास्ते सोचे। उसने मुफ्त पानी बंद कर दिया। ग्राहकों को पानी पीना है तो बोतल वाला पानी खरीदें। रेस्टोरेंट में भीड़ रहती थी, जिसके चलते ग्राहकों को खाली टेबल मिलने का इंतजार करना पड़ता था। उसने कुछ खास टेबलें रिजर्व कर दीं, जिन पर दोगुने पैसे देने वाले ग्राहकों को बिठाया जाने लगा। ग्राहकों की नाराजगी बढ़ी, पर उनके पास कोई विकल्प नहीं था। उस इलाके में और कोई रेस्टोरेंट था नहीं। 

मालिक ने जब भी मैनेजर से रिपोर्ट तलब की, उसने नयी रसोई के निर्माण में प्रगति के बारे में बताया, कम होते घाटे के बारे में बताया। लोगों की नाराजगी पर उसका एक ही जवाब था - मैं होटल की हालत सुधारने के लिए खून-पसीना एक कर रहा हूँ। 

पर कुछ दिनों बाद ही कोहराम मचा। एक शाम वहाँ खाने आये ग्राहकों को उल्टियाँ शुरू हो गयीं। पता नहीं कैसे सारा खाना विषैला था। बात समझ में आती उससे पहले दर्जनों ग्राहक अस्पताल पहुँच गये। 

माफ कीजिए, आपको अब तक मैनेजर साहब का नाम तो बताया ही नहीं - रमेश प्रभु। लोग बताते हैं कि उनका एक भाई सरकार में मंत्री है। उनके ही जैसा काबिल, कर्मठ, ईमानदार...

(देश मंथन, 24 अगस्त 2017)

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