विद्युत प्रकाश मौर्य, वरिष्ठ पत्रकार : 

भेंट द्वारका नगरी द्वारका से 35 किलोमीटर आगे है। यहाँ कृष्ण का अति प्राचीन मंदिर है। भेंट द्वारका इसलिए क्योंकि यहीं पर कृष्ण की अपने बाल सखा सुदामा से भेंट हुई थी। दरिद्र ब्राह्मण सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर अपने बचपन के मित्र और द्वारका के राजा कृष्ण के पास पहुँचे थे। यहाँ भी ऐतिहासिक द्वारकाधीश का मंदिर है।

मंदिर में कृष्ण और सुदामा की प्रतिमा है। कहा जाता है कि किसी जमाने में कृष्ण का महल यहीं हुआ करता था। बाद में सारी द्वराका नगरी समुद्र में डूब गई लेकिन भेंट द्वारका का एक हिस्सा टापू के रूप में मौजूद है। मंदिर का अपना अन्न क्षेत्र भी है। इस मंदिर में भी हमेशा ही श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

भेंट द्वारका को भेंट शंखोद्धार भी कहा जाता है। पुजारी बताते हैं कि यह श्रीकृष्ण का असली मंदिर है। वर्तमान भेंट शंखोद्धार श्री कृष्ण का मंदिर कोई 500 साल पुराना है। इसे महाप्रभु संत वल्लभाचार्य ने बनवाया था। उनका जन्म 1479 में राजिम, रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उन्हें महाप्रभु के नाम से भी जानते हैं जिनकी देश भर में 84 बैठके हैं। अपने इन सिद्धांतों की स्थापना के लिए उन्होंने तीन बार पूरे भारत का भ्रमण किया और विद्वानों से शास्त्रार्थ कर अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया। ये यात्राएँ 19 वर्षों में पूरी हुईं। ये स्थान ही बैठक नाम से जाने जाते हैं। भेंट द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर की कृष्ण प्रतिमा के बारे में कहा जाता है कि इनका निर्माण स्वयँ रानी रुक्मिणी ने किया था। चूँकि कृष्ण को सुदामा ने चावल भेंट किया था। इसलिए यहां मंदिर के पास ब्राह्मणों को आज भी चावल दान करने की परंपरा है। परिसर में हनुमान, शिव लक्ष्मी और विष्णु की भी मूर्तियाँ हैं।

शंखोद्धार की कथा 

कृष्ण ने अपने गुरु संदीपनी को गुरु दक्षिणा में गुरु पुत्र को वापस लाने का वचन दिया था जिसकी प्रभास सागर में डूबकर मृत्यु हो गयी थी।  गुरु पुत्र की तलाश में कृष्ण सागर में उतरे। पर सागर ने बताया कि पुत्र यहाँ नहीं है उसे शंखासुर नामक दैत्य खा गया होगा। शंखासुर (पंचजन) सागर का एक दैत्य था। इसके बाद श्री कृष्ण ने शंखासुर का वध कर डाला। पर दैत्य के पेट से भी कृष्ण को बालक नहीं मिला। शंखासुर के शरीर का शंख लेकर कृष्ण और बलराम यम के पास गये। यमलोक में शंख बजाने पर अनेक गण उत्पन्न हो गये। यमराज ने कृष्ण की माँग पर गुरु पुत्र उन्हें लौटा दिया। वे बालक को लेकर गुरु संदीपनी के पास गये और पुत्र को लौटा कर गुरु दक्षिणा दी। इस तरह के गुरु को पुत्र प्राप्त हुआ, जबकि विष्णु के हाथों मर कर शंखासुर का उद्धार हो गया।

कान्हा ने भरी नरसी भगत की हुंडी 

कहा जाता है कि बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहाँ भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भक्त नरसी की हुंडी भरी थी। कहा जाता है कि 15वीं सदी के महान संत नरसी मेहता (भगत) के जमाने में लोग पैदल-यात्रा में नकद धन नहीं ले जाते थे। किसी विश्वस्त और प्रसिद्ध व्यक्ति के पास रुपये जमा करके उससे दूसरे शहर के व्यक्ति के नाम हुंडी (धनादेश) लिखवा लेते थे। नरसिंह मेहता की गरीबी का उपहास करने के लिए कुछ शरारती लोगों ने द्वारका जाने वाले तीर्थ यात्रियों से हुंडी लिखवा ली, पर जब यात्री द्वारका पहुँचे तो भगवान कृष्ण ने श्यामल शाह सेठ का रूप धारण करके नरसी भगत की हुंडी का धन तीर्थयात्रियों को दे दिया। नरसी भगत वही संत हैं जिन्होंने वैष्णव जन तो तेने कहिए जैसा भजन लिखा था।

भेंट द्वारका की यात्रा

मुख्य जमीन से भेंट द्वारका की दूरी कोई तीन किलोमीटर है। हर 15 मिनट पर आमतौर पर एक मोटर से चलने वाली नाव भेंट द्वारका के लिए प्रस्थान करती है। इसमें स्थानीय लोग भी जाते हैं और सैलानी भी। एक नाव में 30 से 40 लोग सवार हो जाते हैं। इसी नाव पर लोग बाइक आदि भी लाद देते हैं। थोड़ी देर का समंदर में सफर आनंद देता है। लहरों के संग अटखेलियाँ करती नाव कब भेंट द्वारका पहुँच जाती है पता भी नहीं चलता। आप चाहें तो भेंट द्वारका के लिए अलग से आरक्षित नाव भी ले सकते हैं। भेंट द्वारका की ओर जाने वाली नांवे खुली हैं, उनमें दोपहर में काफी गरमी लगती है। भेंट द्वारका टापू की लंबाई 13 किलोमीटर और चौड़ाई से 3 से 4 किलोमीटर है। टापू पर कदम रखने के साथ पतला लंबा रास्ता है, जिसके दोंनों तरफ दुकाने हैं। कुछ खाने पीने की कुछ खिलौनों और मंदिर के प्रसाद की। हमलोग थोड़ा थक गए हैं इसलिए रूक कर गन्ने का रस पीते हैं। नाव से उतरने के बाद मंदिर की दूरी कोई 700 मीटर है। जूते चप्पल, कैमरे, मोबाइल आदि जमा करने के बाद हम मंदिर में प्रवेश कर जाते हैं। शंखोद्धार मंदिर के परिसर में कैमरा मोबाइल आदि प्रतिबंधित है।

हनुमान दंडी भी जाएँ

भेंट द्वारका जब आप मोटर बोट से पहुँचेगें तो पास में ही द्वारकाधीश का मंदिर है। भेंट द्वारका में द्वारकधीश मंदिर के अलावा हनुमान दंडी देखने लायक जगह है। यहाँ स्वामी प्रेम भिक्षु का बनवाया हुआ आश्रम है। यहाँ संत निवास करते हैं। यहाँ जाने के लिए द्वारकाधीश मंदिर से आटो रिक्शा लिया जा सकता है। द्वारकाधीश मंदिर से हनुमान दंडी की दूरी पाँच किलोमीटर है। भेंट द्वारका टापू की आबादी लगभग पाँच हजार है। इसमें चार हजार मुसलमान परिवार हैं। सिर्फ एक हजार ही हिंदू हैं। भेंट द्वारका टापू पर आवासीय इंतजाम नहीं है। टापू होने के कारण सारी उपभोक्ता वस्तुएँ ओखा से ही आती हैं। इसलिए यहाँ थोड़ी महँगाई है। 

मीठापुर में बनता है टाटा नमक 

ओखा से द्वारका की ओर लौटते हुए आपको मीठापुर गाँव दिखायी देता है। गाँव का नाम मीठापुर है, लेकिन यहाँ बनता है नमक। हाँ! वही टाटा नमक जिसे सारा देश खाता है। यहाँ टाटा केमिकल्स का बड़ा नमक बनाने का विशाल प्लांट है।

कैसे पहुँचे

भेंट द्वारका वास्तव में चार किलोमीटर की चौड़ाई में फैला हुआ एक टापू है। यह ओखा शहर से पाँच किलोमीटर समुद्र के अंदर है। ओखा आखिरी रेलवे स्टेशन भी है और नौ सेना का केंद्र भी। गुजराती इसे बेट द्वारका कहते हैं। यहाँ बेट का मतलब टापू से है। द्वारका दर्शन वाली सारी बसें भेंट द्वारका लेकर जाती हैं। ओखा रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूरी पर ही भेंट द्वारका के लिए जाने वाली मोटर बोट का स्टेशन है। यहाँ से हर वक्त मोटर बोट चलती रहती हैं। इनका एक तरफ का किराया 10 रुपये है।

(देश मंथन, 05 जनवरी 2016) 

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