राजीव रंजन झा : 

कोरोना की श्रृंखला तोड़ने की लड़ाई हम उसी दिन हार गये थे, जब दिल्ली में हजारों-लाखों मजदूरों की भीड़ को उत्तर प्रदेश की बस चलने के नाम पर आनंद विहार में जुटा दिया गया था।

तब मैंने लिखा था, बोला था कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार को निलंबित करके केंद्र सरकार यहाँ का शासन अपने हाथों में ले। मोदी सरकार यह राजनीतिक साहस नहीं जुटा सकी। यहाँ तक कि भाजपा के नेता यह बात बोलने तक का साहस नहीं कर सके। और फिर मजदूरों-प्रवासियों का जो रेला शुरू हुआ, वह किसी के रोके नहीं रुकने वाला था। जैसे बांध का पानी नहीं रुकता है। 

कोरोना की लड़ाई हम तभी हार गये थे, जब निजामुद्दीन के मरकज से सैंकड़ों जमाती निकल कर देश भर के छोटे-बड़े शहरों में फैल गये थे। वे जहाँ-जहाँ गये, वहाँ मस्जिदों में उन्हें छिपाया गया। लेकिन हमारा सेक्युलिबरल तबका बताता रहा कि वे छिपे नहीं थे, वे तो मासूम थे। 

कोरोना की लड़ाई हम उसी समय हार गये थे, जब एक समुदाय के लोगों ने कोरोना-योद्धाओं से ही लड़ाई छेड़ दी थी। सेक्युलिबरल जमात बोलती रही कि इसके लिए पूरे समुदाय को दोष देना उचित नहीं, केवल कुछ सिरफिरे लोग थे ऐसे। लेकिन बाकी समझदार लोगों का बहुमत चंद गिने-चुने सिरफिरों के आगे बेबस क्यों रहा फिर? खैर, केवल सेक्युलिबरल तबके को क्यों बोला जाये? माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तो कहा कि किसी खास समुदाय को दोष नहीं देना है। और हाँ, देश के सबसे बड़े परिवार के मुखिया मोहन भागवत जी ने भी तो यही कहा ना। फिर हो गयी बात खत्म। 

पर बात खत्म कहाँ हुई? शुरू हुआ रमजान का महीना। और देश भर में सारे सरकारी तंत्र ने सरेंडर कर दिया। हर गली-मुहल्ले में लॉकडाउन चला, नहीं मानने वालों पर लाठियाँ चलीं। मगर सरकार बहादुर गायब रही तो कुछ खास मुहल्लों से। कुछ खास बस्तियों से। कुछ खास बाजारों से। वहाँ लॉकडाउन नहीं था, हर तरफ रौनक थी, हर तरफ भीड़ थी। सारे देश में सोशल डिस्टेंसिंग चली, कुछ खास इलाकों में कंधे से कंधा रगड़ कर लोग त्योहार मनाते रहे, गलबहियाँ करते रहे। 

लेकिन यह सब बोलना ठीक नहीं है। प्रधानमंत्री जी ने और मोहन भागवत जी ने समझाया ना कि किसी समुदाय को अलग से चिह्नित करके दोषी नहीं ठहराना है। अब कोरोना की लड़ाई हम हार गये तो हार गये। क्या हुआ। हुआ तो हुआ। 

और फिर हमने उस दिन सरेंडर कर दिया, जिस दिन हमने प्रवासियों के लौटने के लिए रेलगाड़ियाँ चलवा दीं। उस दिन हमने मान लिया कि अब कोरोना की लड़ाई लड़ने का कोई मतलब नहीं है। अब हम शेर के सामने खड़े हैं, तो हम क्या करेंगे, जो करना है वह शेर ही करेगा। 

कोरोना के ग्राफ और ऊपर बतायी गयी बातों की तारीखें मिलाते जाइये, हर एक बात के साथ कोरोना के ग्राफ में नयी तेजी आती गयी। हम हारते गये। लेकिन किसी को दोषी नहीं ठहराना है। 

पर नहीं, यह बात भी नहीं है। एक हारी हुई लड़ाई के लिए कोई तो दोषी ठहराया ही जायेगा। तो वह दोषी खोज निकाला गया है। वह दोषी है हिंदू मध्यम वर्ग, जो सेक्युलिबरलों के अनुसार नफरती बन गया है। उसने अपनी नफरत में एक समुदाय को निशाना बनाया, इसलिए कोरोना के फैलने का दोषी वही है। कुछ विद्वान बताने लग गये हैं कि हिंदू मध्यम वर्ग के लिए कोरोना बस मुसलमानों से नफरत करने का एक जरिया था। तीन महीने पहले आँकड़े भले दिखा रहे थे कि कोरोना किनके जरिये फैल रहा है, लेकिन हमारे सेक्युलिबरल विद्वान इसमें भी हिंदू मध्यम वर्ग का ही दोष निकाल रहे हैं। सबने देखा था कि जमातियों के चलते कोरोना फैलने की संख्या से रोज-रोज की शर्मिंदगी के बाद सरकारों ने पहले इस कॉलम का नाम बदला। स्रोत के रूप में जमातियों का उल्लेख करने के बदले कभी सिंगल सोर्स लिखा गया, कभी स्पेशल ऑपरेशंस लिखा गया। 

मगर सेक्युलिबरलों ने अब कहना शुरू कर दिया है कि अब सबसे बड़ा तबका मध्यम वर्ग ही इस बीमारी से ग्रसित हो रहा है और अब रोग के धार्मिक आँकड़े नहीं जारी हो रहे। मानो वे बता रहे हों कि अब मध्यम वर्ग में यह बीमारी ज्यादा फैल रही है, इसलिए कोरोना के स्रोतों का धार्मिक आँकड़ा जारी करना बंद किया गया। वे यह भूल गये हैं, या चाहते हैं कि हम-आप भूल जायें कि स्रोत का कॉलम तब हटाया गया, जब तमाम शहरों और राज्यों में कोरोना के कुल मामलों में सिंगल सोर्स का योगदान 60-70 प्रतिशत तक जा रहा था। 

और हाँ, यह कभी भी धार्मिक आँकड़ा तो था ही नहीं। स्रोत पर आधारित आँकड़ा था और तीन महीने पहले सबसे बड़ा स्रोत बन गयी थी तबलीगी जमात। उसके आँकड़े रोज आते थे, लोग उनकी बातें करते थे, तो अपने-आप सेक्युलिबरल तबका फजीहत महसूस करता था और पलट कर जमातियों की चर्चा करने वालों को नफरती कहता था। 

तो हे मध्यमवर्गीय हिंदू, तुम लॉकडाउन भी झेलो, कोरोना की मार भी झेलो, और नफरती होने का आरोप भी अपने सिर पर लो। और एक समुदाय को दोषी तो हरगिज मत बताना, क्योंकि हिंदू हृदय सम्राट और हिंदू संगठनों के परिवार के मुखिया ने भी यही बोल रखा है। अगर चाहो तो कभी कांग्रेस, कभी केजरीवाल, कभी ममता बनर्जी, कभी उद्धव ठाकरे की थोड़ी आलोचना कर लो, क्योंकि उतना राजनीतिक रूप से चलेगा। लेकिन वह भी ज्यादा नहीं करना, अभी सबको साथ मिल कर कोरोना से लड़ाई लड़नी है। 

लड़नी है? पर लड़ाई बची कहाँ? अब तो शेर सामने है, जो करना है उसे ही करना है। 

पर अंत में यह जिक्र कर दूँ क्या कि हम यह लड़ाई असल में हारे क्यों? जब लॉकडाउन का पहला चरण ही चल रहा था और हम कोरोना के विरुद्ध अन्य देशों से बहुत अच्छी स्थिति में दिख रहे थे, तब की बात है। मैं दूध-सब्जी वगैरह खरीदने बाहर निकला था तो कुछ लोगों की बात सुनी थी - "यह मोदी अब किसी के हराने से नहीं हारेगा। कोरोना पर काबू हो जाना इतनी बड़ी बात है कि अब देश में कोई उसे टक्कर नहीं दे सकता।" यह बात किसी एक ने कही तो मैंने सुनी। पर चल तो सबके मन में रही थी। कुछ ताकतों ने तय किया कि कोरोना पर काबू नहीं होने देना है। फिर मजदूरों-प्रवासियों को सड़कों पर निकाला गया। एक समुदाय के मन में बिठा दिया गया कि कोरोना के क्वारंटीन सेंटर तो असल में डिटेंशन सेंटर हैं, जिनकी बात सीएए-एनआरसी के समय हो रही थी। उनके मन में भरा गया कि लॉकडाउन को न मान कर मोदी सरकार को कमजोर किया जा सकता है। कोरोना पर काबू हो जाने से मोदी अजेय हो जाता, कोरोना बेकाबू होने से मोदी हारेगा। 

तो हे मध्यमवर्गीय हिंदू, नफरती होने का आरोप अपने सिर से हटाना है तो मोदी को हराओ। वैसे अभी लोकसभा के चुनाव में देरी है, लेकिन उससे पहले जहाँ भी चुनाव आये वहाँ मोदी को हराओ, वरना नफरती कहलाओ। 

(देश मंथन, 12 जुलाई 2020)

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