क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार :

तो झाड़ू अब ‘लेटेस्ट’ फैशन है! बड़े-बड़े लोग एक अदना-सी झाड़ू के लिए ललक-लपक रहे हैं! फोटो छप रही है! धड़ाधड़! यहाँ-वहाँ हर जगह झाड़ू चलती दिखती रही है!

आम आदमी पार्टी वाले हैरान हैं। झाड़ू उनकी थी। चला उसे बीजेपी वाले रहे हैं! और तो और, उनकी पुरानी नेता शाजिया इल्मी झाड़ू के निशान पर दो चुनाव हारने के बाद पार्टी से तो हट गयीं, लेकिन झाड़ू उन्होंने फिर से पकड़ ली है! लेकिन इस बार यह झाड़ू ‘आप’ की नहीं, ‘स्वच्छ भारत’ अभियान की है!

जिस दिन इस देश का नागरिक सीख जायेगा कि उसे कचरा कहाँ और कैसे फेंकना है, उस दिन वह बहुत-सी और बातें भी सीख जायेगा!

बेचारे काँग्रेस वाले भी लटपटाये हुए हैं! मोहनलाल, मोहनलाल कहते-कहते नमो जी मोहनदास करमचन्द गाँधी को भी अपने साथ घसीट ले गये! अब अचानक उन्हें चाचा नेहरू पर भी प्यार आ गया! झाड़ू के चक्कर में शशि थरूर भी पड़ गये! थरूर पहले भी मोदी की तारीफ कर विवादों में फँस चुके हैं। अब फिर से केरल के काँग्रेसी उन पर झाड़ू ताने खड़े हैं! बहरहाल, शाजिया भी यही कहती हैं और शशि थरूर भी कि ‘स्वच्छ भारत’ अभियान किसी पार्टी का कार्यक्रम तो है नहीं, तो इसमें हाथ बँटाने में क्या हर्ज? हर्ज तो कुछ नहीं है, बशर्ते कि मामले के पीछे कोई और मामला न हो! 

क्या टोटकों से बनेगा जनान्दोलन?

और सारा पेंच यहीं है! ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से भला किसे इन्कार हो सकता है? सच तो यह है कि देश के लोग सफाई से रहने की तमीज सीखें, यह बात तो बहुत पहले सोची और की जानी चाहिए थी! मोदी ने इसे शुरू किया, बड़ी अच्छी बात है! बड़ा नेक काम है, लेकिन वह नेक तभी तक रह सकता है, जब तक वह नेक इरादों से किया जाये! वरना फिर जो भी चीज राजनीति के पलड़ों पर रखी जायेगी, उसमें से गँध भी वैसी ही आयेगी और रंग भी वैसा ही निकलेगा, नतीजे भी वैसे ही होंगे! हमारे यहाँ राजनेता अक्सर इस बात को समझ नहीं पाते कि बहुत-सी चीजें अगर राजनीति के बिना की जायें, तो उसके राजनीतिक फायदे कहीं ज्यादा मिल सकते हैं! और इसीलिए अक्सर ऐसा होता है कि बड़ा बनने के बड़े-बड़े अवसर अक्सर उनके हाथ से फिसल जाते हैं!

सवाल यही है कि ‘स्वच्छ भारत’ अभियान क्या ऐसे टोटकों से कहीं पहुँच सकता है? खास कर तब, जबकि देश की करीब आधी आबादी यानी लगभग साठ करोड़ लोग आज भी खुले में शौच के लिए अभिशप्त हैं! विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में करीब एक अरब लोग खुले में शौच करते हैं, जिनमें से 60% केवल भारत में हैं! मोदी सरकार अगले पाँच सालों में ही हर घर में शौचालय का लक्ष्य पाना चाहती है। क्या यह कायाकल्प सिर्फ पाँच साल में हो सकेगा? मुश्किल लगता है! फिर भी चलिए मान लें कि सरकार अपना काम समय पर पूरा कर लेगी, तो भी क्या समस्या से छुटकारा मिल जायेगा? अभी गाँवों में जो विकल्प अपनाया जा रहा है, वह सोख्ता शौचालयों का है। बड़ी आबादी वाले गाँवों में ऐसे शौचालय कुछ वर्षों के इस्तेमाल के बाद भूगर्भ जल को बुरी तरह प्रदूषित कर सकते हैं! और जहाँ आबादी उतनी ज्यादा नहीं भी है, वहाँ भी इनके रोजमर्रा के इस्तेमाल में इतनी सावधानी और सफाई तो रखे जाने की जरूरत है ही कि मक्खियों को बीमारियाँ फैलाने का न्योता न मिल सके। क्या इन साठ करोड़ लोगों को इसके लिए तैयार किया जा सकता है कि वे शौचालयों का रखरखाव ठीक रख सकें? (पशुओं से होनेवाली गंदगी इसमें शामिल कर लें तो समस्या और भी विकराल हो जाती है)। जाहिर है कि एक-एक नागरिक की सक्रिय और सचेत भागीदारी के बिना यह लक्ष्य पाया नहीं जा सकता! क्या हम लोगों को समझा पायेंगे कि ऐसी गन्दगी से कैसी बीमारियाँ फैलती हैं, जिनसे देश में हर साल लाखों लोग मरते हैं और देश को जो आर्थिक नुकसान होता है, वह देश की जीडीपी के 6% के बराबर है! यह सवाल इसलिए बहुत बड़ा हो जाता है कि हमारे देश में साफ-सफाई, स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपने खुद के जीवन को लेकर लोगों में घोर उपेक्षा का एक अद्भुत भाव है! गाँव के लोग हों या शहर के, पढ़े-लिखे हों या अनपढ़, लोग समभाव से गन्दगी फैलाते हैं और सड़क पर यह मान कर चलते हैं कि चाहे वह कुछ भी कर लें, उनके साथ कोई दुर्घटना नहीं होगी!

इसलिए तमाम सरकारी आयोजनों, तमाशों, सेलिब्रिटी तामझाम के बावजूद क्या यह एक स्थायी जनान्दोलन बन सकता है? क्या यह बात लोगों की चेतना में स्थायी जगह बना सकती है कि खुद साफ-सुथरा रहना, अपने पास-पड़ोस को साफ-सुथरा रखना क्यों जरूरी है, उससे उन्हें क्या फायदा होगा, उससे देश को क्या फायदा होगा, सफाई रखने जैसी मामूली-सी बात देश को आर्थिक तरक्की करने में कैसी जबर्दस्त मदद कर सकती है?

समस्या सिर्फ एक है!

पता नहीं, इस अभियान को शुरू करने के पहले इतनी गहराई में जा कर सोचने की जरूरत समझी गयी या नहीं? दरअसल, इस देश की मूल समस्या क्या है? जब तक हम इस एक बात पर उँगली नहीं धरेंगे, तब तक सारी कोशिशें, सारे इरादे, सारे अभियान, सारी योजनाएँ धरी की धरी ही रहेंगी। इस देश की केवल एक समस्या है। और दुर्भाग्य की बात यह है कि हम आज तक उस एक समस्या को या तो देख नहीं सके या देख कर भी कन्नी काट गये! वह समस्या यह है कि हम देश के नागरिकों को आज तक यह एहसास ही नहीं करा पाये कि नागरिक होने का मतलब क्या है? हम कभी इस बात पर जोर नहीं दे पाये, कभी यह बात दम से रख नहीं पाये, कभी लोगों को यह ढंग से बता ही नहीं पाये या बताने की कोशिश ही नहीं की कि देश का हर नागरिक अगर केवल नागरिक के तौर पर अपने मामूली-मामूली और छोटे-छोटे कर्तव्य पूरा करता रहे तो देश कैसे असीम तरक्की कर सकता है?

अब लोगों को यह समझ में ही नहीं आता कि अगर वे यहाँ-वहाँ कहीं भी कूड़ा फेंक देते हैं, तो इससे देश का क्या नुकसान होता है? लोगों को यह भी समझ में नहीं आता कि अगर सड़कें, बाजार, नदियाँ, घाट, बस, ट्रेनें साफ-सुथरी रहें, तो इससे देश की आर्थिक तरक्की कैसे हो सकती है? तभी तो ऐसा होता है कि ताजमहल जैसी सुन्दर चीज जिस शहर में हो, उस शहर को वहाँ के लोग इतना गंदा रखते हों और उन्हें एहसास भी न हो कि इस गंदगी से उनके शहर को क्या नुकसान होता है! आगरा ही क्यों, देश में ज्यादातर बड़े पर्यटन स्थलों पर भारी गंदगी रहती है। क्या कभी लोगों ने सोचा कि अगर ये सारी जगहें साफ रहें तो वहाँ आनेवाले पर्यटकों की संख्या कितनी ज्यादा बढ़ सकती है, उससे रोजगार कितना बढ़ सकता है, समृद्धि और संपन्नता कितनी आ सकती है?

मूल समस्या यह है कि हम यह देखते हैं कि हम जो काम कर रहे हैं, उससे हमें व्यक्तिगत तौर पर क्या फायदा, क्या नुकसान हो रहा है? इसलिए घर की सफाई तो होती है, लेकिन बाहर कचरा कहाँ और कैसे डालना है, इसकी चिन्ता नहीं! कहीं भी डाल दो! कचरा उठाने का काम सफाईकर्मी का है, वह जब आयेगा, ले जायेगा, नहीं आयेगा तो वैसे ही पड़ा रहेगा, सड़क तो ‘सरकारी’ है! वहाँ कचरा पड़ा है, तो मुझे क्या? कुत्ते उसे नोच-खसोट रहे हैं, पूरी सड़क पर फैला रहे हैं, तो मुझे क्या? सड़क गन्दी हो रही है, तो मुझे क्या नुकसान?

ऐसे में जब तक हम एक-एक आदमी को यह समझा और सिखा न पायें कि उसे कचरा कहाँ और कैसे फेंकना है, तब तक सफाई का यह अभियान कैसे सफल होगा? तो क्या कुछ बड़े लोग सड़कों पर झाड़ू लगा दें, स्कूलों में बच्चों से ‘श्रमदान’ करा कर सफाई कार्यक्रम चलवा लिया जाये, कॉलोनियों-मुहल्लों में कुछ स्वयंसेवी संगठनों के लोग जुट कर कोई पार्क, कोई नुक्कड़, कोई ठीहा साफ कर दें, अखबारों में फोटो आ जाये, टीवी पर खबरें चल जायें, क्या महज इतने से भारत स्वच्छ हो जायेगा? पर्यावरण बचाने, दीवाली पर पटाखे न फोड़ने, दहेज न लेने, कन्या भ्रूण हत्याएँ रोकने आदि-आदि के बारे में चले तमाम अभियानों को लोगों ने देखा, तालियाँ बजायीं और भूल गये! नतीजा क्या हुआ? कुछ नहीं!

वह अपील कहाँ से आयेगी?

‘स्वच्छ भारत’ अभियान बेहद ज़रूरी है। इसे पूरी शिद्दत और ईमानदारी से चलाया जाना चाहिए। लेकिन यह बात समझनी होगी कि इसे जनान्दोलन बनाये बगैर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता! और यह जनान्दोलन कैसे बनेगा! तभी जब जनता को यह बात अपील करे। क्या वह अपील महज कुछ फ़िल्मी सितारों, कुछ उद्योगपतियों, कुछ नेताओं की भागीदारी से आ सकती है? और अगर आयी भी तो क्या वह स्थायी भाव के तौर पर जनता की चेतना में बनी रह सकती है? यह बड़ा मुश्किल काम है। अन्ना के आन्दोलन का उदाहरण लेते हैं। एक अन्ना ने कैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश भर में अलख जगा दिया था! वह आन्दोलन राजनेताओं के भ्रष्टाचार के विरुद्ध था। जनता में उसने उस भ्रष्टाचार के विरुद्ध ग़ुस्सा तो पैदा किया, लेकिन ऐसी कोई प्रेरणा नहीं दी कि आम जनजीवन में जो भ्रष्टाचार है, लोग उसे भी त्यागने का संकल्प लें! नतीजा यही हुआ कि इतना बड़ा आन्दोलन कुछ दिनों बाद अब किसी को याद भी नहीं है!

इसलिए ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से जनता कैसे जुड़े और जुड़ने के बाद लगातार जुड़ी रहे, इसकी प्रेरणा निरन्तर कहाँ से आयेगी, कैसे आयेगी, यह बात अभी तक साफ नहीं है। पता नहीं, नमो को इस बात का अंदाजा है या नहीं कि जिस अभियान की शुरुआत उन्होंने की है, वह कितना महत्त्वपूर्ण है और अगर वह सफल हो गया तो वह कितने बुनियादी परिवर्तनों का जनक हो सकता है! जिस दिन इस देश का नागरिक सीख जायेगा कि उसे कचरा कहाँ और कैसे फेंकना है, उस दिन वह बहुत-सी और बातें भी सीख जायेगा! मसलन, सड़क पर कैसे चलना है, लाइन में कैसे लगना है, सार्वजनिक जगहों पर कैसे रहना है, ऐतिहासिक धरोहरों को कैसे बचा कर रखना है, दफ्तरों में कैसे काम करना है, कारखानों में जो बन रहा है, बाजारों में जो बेचा जा रहा है, उसमें गुणवत्ता का ध्यान कैसे रखना है, सामान्य जीवन में सामान्य नियमों का पालन करते रहना एक स्वस्थ समाज के लिए कितना जरूरी है और अन्ततः यह कि राजनीति में स्वच्छता भी कितनी जरूरी है और कैसे लायी जा सकती है! (raagdesh.com)

(देश मंथन, 11 अक्तूबर 2014) 

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