रवीश कुमार, वरिष्ठ टेलीविजन एंकर :

"लालू जिंदा हो गया है। सब बोलते थे कि लालू खत्म हो गया। देखो कहाँ ख़त्म हो गया है।" लालू यादव को जैसे ही मैंने कहा कि लोग बता रहे हैं कि आप बिहार में नंबर दो पर आ गये हैं।

लालू ने कहना शुरू कर दिया कि मैं नंबर वन हूँ। चालीस का चालीस सीट जीत रहा हूँ। बिहार में बीजेपी को मैंने एक ही हेलीकाप्टर से रोक दिया है। हेलीकाप्टर से कोई रूका हो या न हो मगर हेलीकाप्टर न हो तो रैलियों में गड़गड़ाहट पैदा नहीं होती है।

भीषण गर्मी में लालू का दावा सर के ऊपर से गुज़र रहा था। कैमराकार मोहम्मद की हालत ख़राब होने लगी थी। मुझे भी लग रहा था कि कुछ गड़बड़ हो रहा है। लगा कि शुगर डाउन हो गया है। बीच इंटरव्यू में लालू यादव से पूछ दिया कि आपके साथ कुछ खाने को है। मेरी हालत ख़राब हो रही है। लालू सकपका गये। फिर किसी को कहने लगे कि खाने का इंतजाम हो सकता है। तब तक चाय आ गयी। मुझे तो चाय से राहत मिल गयी पर मोहम्मद की तबीयत ख़राब होने लगी। कैमरा बंद। इंटरव्यू हो चुका था मगर मोहम्मद पेट पकड़ कर बैठ गये। शूटिंग करते वक्त कब क्या हो जाये पता नहीं। हालत ख़राब थी पर कैमरे के सामने सामान्य दिखने के लिए मुस्कुरा रहे थे। लालू भाषण दे रहे थे और मैं उनके ड्राइवर से पानी माँग रहा था। कहा साहब के लिए एक ही बोतल है। दे दिया। दोपहर की गर्मी कभी कभी मार देती है। बाद में स्थानीय पत्रकार बंधु के घर भोजन मिला और हम सामान्य हुए।

नरेंद्र मोदी ने रैलियों का स्तर इतना भव्य कर दिया है कि लोग भूल चुके हैं कि चुनावी सभाएँ भी होती हैं। नरेंद्र मोदी की रैली की तरह कोई इंतज़ाम नहीं। मीडिया का कोई कैमरा नहीं। कोई ओबी वैन नहीं। जबकि आज ही मोदी की बिहार में हुई सभी रैलियों का कुछ न कुछ हिस्सा चैनलों पर ज़रूर चला होगा। लालू, मायावती, मुलायम और नीतीश की सिर्फ बाइट चलती है। मोदी, राहुल, सोनिया और प्रियंका ही लाइव होते हैं। लालू की सभा का इंतज़ाम ऐसा था जैसे रास्ते में बारात का इंतज़ाम हो। कोई चमक दमक नहीं। प्रेस को संभालने वाला कोई मैनेजर नहीं।

लालू की सभा में हेलीकाप्टर दिखने से पहले कोई सौ लोग भी नहीं थे। जैसे ही हेलीकाप्टर दिखायी दिया पता नहीं कहाँ से पाँच मिनट के भीतर सभा स्थल भर गया। समझ ही नहीं कि कहाँ से इतने लोग आ गये। जबकि ठीक उसी वक्त छपरा में मोदी की रैली चल रही थी। लोगों ने बताया कि धूप के कारण भीड़ बाग़ीचे में इंतजार कर रही थी।

बिहार में अचानक लोग लालू के उभार की बात करने लगे हैं। क्या सचमुच लालू ने मोदी लहर को रोक दिया है। लालू के दावे और उनके प्रति भीड़ के आकर्षण के कारण ऐसा लग सकता है। आज भी लोग लालू की बात को ध्यान से सुन रहे थे। जब बीजेपी के दावे विश्वसनीय बताये जा सकते हैं, तो लालू के क्यों नहीं। अगर लालू ने ऐसा कर दिया तो वे मोदी के सामने बड़े नेता बन जायेंगे। सोलह मई के बाद देखा जायेगा।

इस चुनाव में जनमत बदल रहा है। वह जातियों के बंधन में ज़रूर फँसा है मगर उससे निकल भी रहा है। यही निकले हुए लोग बीजेपी को ऊर्जा दे रहे हैं। उन्हें रास्ता दिखाने में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन का भी योगदान है। रिज़ल्ट क्या होगा पता नहीं मगर बिहार में चर्चाओं का तराज़ू बराबर दिख रहा है एकतरफा झुका हुआ नहीं। मोदी ने खुद को बदलाव के एजेंट के रूप में पेश कर दिया है। इस दावेदारी को चुनौती देने के लिए दूसरी तरफ कोई उम्मीदवार नहीं है। दूसरी तरफ़ से मोदी की तरह कोई सपना नहीं बेचा गया है। इसलिए जाति या क्षेत्रीय दलों के सहारे मोदी को रोकने की बात दमदार तो लगती है मगर सारे दलील पुराने फ़ार्मूले पर आधारित हैं। ये नरेंद्र मोदी के पक्ष में है या नहीं मगर इस चुनाव में राजनीतिक सामाजिक संबंधों में व्यापक बदलाव हो रहा है।

भाजपा या संघ का एक कमाल यह भी है कि उसने हर चौक चौराहे पर अपने समर्थकों को आक्रामक दलीलों से लैस कर दिया है। किसी की रैली में जाता हूँ तो ये लोग कैमरे के पास आकर मोदी मोदी करने लगते हैं। दमदार बहस करते हैं। मुझे बीजेपी की रैली में कोई सपाई या कांग्रेसी नहीं मिलता मगर बाक़ियों की रैली में बदलाव या मोदी मोदी करने वाला युवा जरूर मिलता है।

अब पूछने लगा हूँ तो पता चलता है कि स्वयंसेवक है या बीजेपी नेता के रिश्तेदार। वैसे ये काम तो दूसरे दल वाले भी कर सकते थे, किसने रोका है। इनके मोदी मोदी करने से पहले भीड़ कुछ और बात कर रही होती है, लेकिन अचानक ऐसे तत्वों के आने से भीड़ छँटने लगती है। एक ही पोस्टर में लालू सोनिया और शहाबुद्दीन की तस्वीर है। जो बिहार की राजनीति को जानता है वो इस तस्वीर का मतलब अपने आप समझ जायेगा। इस पर लिखूँगा तो फिर बीजेपी के समर्थन से लोजपा के टिकट से लड़ रहीं सूरजभान सिंह की पत्नी भी हैं। ऐसे विषय अब चुनाव के आख़िरी दौर में अकादमिक हो चले हैं। फ़िलहाल सवाल यह है कि क्या वाक़ई लालू बीजेपी को रोक देंगे।

(देश मंथन, 01 मई 2014)

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