रवीश कुमार, वरिष्ठ टेलीविजन एंकर :

"एक बार आप माउंट एवरेस्ट पर पहुँच जाते हैं तो उसके बाद उतरने का ही रास्ता रह जाता है।" यूपी में 2012 के विधान सभा चुनावों से पहले बसपा पर नजर रखने वाले उस मित्र की बात याद आ रही है।

नतीजों के बाद बसपा एवरेस्ट से उतर गयी और सपा चढ़ गयी। पर ये कहाँ लिखा है कि कोई एवरेस्ट पर दोबारा नहीं चढ़ सकता। यूपी के भीतर बसपा की लड़ाई पर नजर डालने का वक्त है। क्या बसपा भाजपा को रोक देगी। रोकने वाली ताकत भी बसपा ही है। भाजपा अपने उछाल के लिए बसपा ही माँगती है! ये दिल माँगे मोर।

बसपा इसबार 'चुपचाप' चुनाव लड़ रही है। आखिर इस रणनीति का बसपा ने क्यों प्रचार किया। टाइम्स आफ इंडिया में बड़ा सा 'चुपचाप रणनीति' पर विश्लेषण छपता है। 'चुपचाप' चुनाव लड़ने का क्या मतलब होता है। क्या बसपा ने 2007 और 2012 का विधान सभा चुनाव भी चुपचाप लड़ा था। याद कीजिये टीवी पर माया सरकार का आठ दस मिनट का लंबा लंबा विज्ञापन। क्या सही में बसपा 'चुपचाप' चुनाव लड़ रही है। यह सही है कि मीडिया बसपा को कम या नगण्य दिखाता है लेकिन इस साल पंद्रह जनवरी को खुद ही मायावती ने कह दिया था कि बसपा के लोग मीडिया और सोशल मीडिया के चक्कर में न पड़ें। मायावती ने मीडिया को इंटरव्यू न देने की बात का एलान भी लखनऊ की रैली में ही कर दिया। पहले तो वो इंटरव्यू देती थीं। जबकि बसपा का अदना सा कार्यकर्ता भी मीडिया में न होने को कमी मान रहा है। कह रहा है कि समय बदल रहा है। टीवी के कारण लोगों को मोदी मुलायम का पक्ष तो मालूम है पर हमारा नहीं। मायावती ने ऐसा निर्णय क्यों लिया? किसी से बात न करने का निर्णय क्या कुछ सवालों से बचने के लिए था।

ऐसा भी नहीं कि वे अपने भाषणों में नरेंद्र मोदी से कोई रियायत बरतती हैं। जमकर हमले करती हैं पर यही हमला अन्य माध्यमों से प्रचारित हो जाये तो क्या हर्ज। रोज एक प्रेस रिलीज तो इनबाक्स में आती ही है जिसमें वो नरेंद्र मोदी की जमकर आलोचना करती हैं। फिर वो सामने से क्यों नहीं लड़ रही हैं। मैं भी नहीं मानता कि चुनाव में मीडिया का इतना असर होता है बशर्ते लड़ने वाला लड़ता रहे। अगर वह लड़ रहा है तो मीडिया का असर नहीं होता। जैसे बिहार में लालू कई जगहों पर मोदी को चुनौती देने की स्थिति में पहुँच गये हैं जबकि मीडिया ने उन्हें ठीक से कवर तक नहीं किया। विशेषकर टीवी मीडिया ने। मायावती के साथ मीडिया की नाइंसाफी को छोड़ दीजिये तो क्या मायावती इस बार मोदी को रोकने के लिए लड़ रही हैं। ना कहने का कोई प्रमाण नहीं है मगर इसबार बसपा को देखकर हाँ भी ठीक से नहीं निकलता।

लखनऊ में हुई पंद्रह जनवरी की रैली के बाद मायावती चुप हो जाती हैं। दो तीन महीने के बाद जब प्रेस में चर्चा होने लगती है तो प्रेस कांफ्रेंस कर सफ़ाई देती हैं कि वे राष्ट्रव्यापी रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। खैर मायावती सभी जिलों में रैली तो कर रही हैं और उनकी रैलियों में भीड़ भी आती है। पर भीड़ के आगे क्या। जिन लोगों को मोदी को रोकने को लिए बसपा से उम्मीदें हैं उन्हें बसपा के चुनाव को करीब से देखना चाहिए। जमीन पर दलित पिछड़ा भाईचारा बनाने में बसपा सक्रिय है क्या। अगर मीडिया की चमक से बचकर बसपा का वोटर नहीं छिटका तो नतीजा कमाल का आयेगा।

बसपा ने इस बार 21 ब्राह्मणों को टिकट दिये हैं जबकि भाजपा ने 19 को। एक दो सीट से ख़ास फर्क नहीं पड़ता। सब जानते हैं कि यूपी के ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ है। फिर भी बसपा ने पिछड़ों से ज़्यादा ब्राह्मणों पर भरोसा किया। 2007 में बसपा ने भाईचारा कमेटी बनाकर ब्राह्मणों को उसका अध्यक्ष बनाया था। ब्राह्मणों का पूरा वोट तो नहीं मिला मगर मिला। फूलपुर के एक ब्राह्मण बहुल गाँव में कई पंडितों ने कहा कि सपा को हराने के लिए बसपा को दिया था। वैचारिक तालमेल नहीं था। इस बार भाजपा को देंगे। 2012 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण बसपा से दूर जा चुका था। बसपा चुनाव हार गयी। क्या इस बार ब्राह्मण उम्मीदवार अपनी जाति का वोट ले आयेगा जिसे जाटव और मुसलमान मिलाकर जीता देंगे। ऐसा होता दिख नहीं रहा है। ब्राह्मण मतदाताओं में सजातीय उम्मीदवारों के कारण बसपा के प्रति ख़ास उत्साह नहीं दिखता। तो इन इक्कीस ब्राह्मण उम्मीदवारों में से कितने जीतेंगे यह आपको जमीन पर दिख जाता है।

इस बार यूपी की लड़ाई में पिछड़ी जातियों का बड़ा रोल रहेगा। बसपा ने पंद्रह या सत्रह ओबीसी को टिकट दिये हैं जबकि भाजपा ने 28 को। भाजपा के ओबीसी उम्मीदवारों में गैर यादव ओबीसी जातियाँ ज्यादा हैं। भाजपा ने लोध जाति के नेता कल्याण सिंह और पटेलों की नेता अनुप्रिया पटेल को मिलाकर अपनी जमीन मजबूत की है। कुर्मी पटेल और कुशवाहा मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ़ जा रहा है। ये जातियाँ बसपा और सपा में हुआ करती थीं। इनसे पहले भाजपा के साथ रह चुकी हैं। इनका कहना है कि बसपा सपा दोनों अपनी प्रमुख जातियों को ही आगे बढ़ाती रही हैं इसलिए गैर यादव पिछड़ी जातियों का विश्वास बैकवर्ड सोशलिस्ट राजनीति से कम हो गया है। इसमें आर एस एस के प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। मुलायम सत्रह ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति में डलवाना चाहते हैं और मायावती इसका विरोध करती हैं। उसी तरह से मुलायम मुसलमानों के आरक्षण की बात करते हैं तो संघ या भाजपा ओबीसी को समझाते हैं कि उनके हिस्से से मुसलमानों को जायेगा। जो आरक्षण हिंदुत्व को कमजोर करने का हथियार बना था वही मज़बूत करने का औज़ार बन रहा है। मायावती या मुलायम दोनों इस आधार को खिसकने से बचाने के लिए वैचारिक संघर्ष करते नहीं दिख रहे हैं। सिर्फ टिकट देने की औपचारिकता काफी नहीं है।

"भाई साहब आज भी बहन जी आक्रामक हो जायें तो हम बीजेपी को रोक देंगे" उस कार्यकर्ता को ऐसा क्यों लगा कि चुपचाप की रणनीति पर चल रही बसपा को लाभ नहीं हो रहा है। इतना भी क्या चुपचाप कि किसी को पदचाप तक सुनायी न दे। मतदाता भी न सुन पाये। हर पार्टी अपना अस्तित्व बचाकर रखना चाहेगी। लगातार मत प्रतिशतों में गिरावट का सामना कर रही बसपा के लिए यह चुनाव काफी अहम है। अगर इस चुनाव में बसपा एवरेस्ट पर दोबारा न चढ़ पायी तो तीन साल बाद के विधान सभा चुनाव में भी नहीं चढ़ पायेगी। दिल्ली में बैठे मोदी को 2019 में यूपी की ज़रूरत फिर पड़ेगी। जिस यूपी को इतनी मेहनत से हासिल करेंगे उसे इतनी आसानी से छोड़ देंगे। क्या वे पिछड़ी जातियाँ बसपा की तरफ लौट आयेंगी। क्या ब्राह्मण भाजपा को इतनी जल्दी छोड़ देंगे। तब बीजेपी का नारा होगा कि यूपी का विकास तभी होगा जब दोनों सरकार भाजपा की होगी। क्या तब भी बसपा चुपचाप चुनाव लड़ेगी।

बनारस गये अविनाश दास ने फेसबुक पर बसपा उम्मीदवार के पर्चा भरने की कहानी लिखी है। उम्मीदवार देरी से आता है, बिना किसी दमखम के आता है। अविनाश लिखते हैं कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं। बिना कांसपिरेसी थ्योरी के कोई चुनावी विश्लेषण पूरा नहीं हो सकता। यह थ्योरी क्या हो सकती है गेस कीजिये। क्या पता बसपा सबको गलत साबित कर तीस सीटें ले आये या क्या पता बसपा के कारण किसी को पचास सीटें आ जाये। बसपा ने कमाल कर दिया तो धमाल हो जायेगा और बसपा के कारण कमल खिल गया तो बवाल हो जायेगा। क्या पता किस वजह से किसका क्या हो जाये।

(देश मंथन, 22 अप्रैल 2014)

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