क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार :

सुना है, सरकार काला धन ढूँढ रही है। उम्मीद रखिए! एक न एक दिन काला धन आ कर रहेगा! अगर कहीं मिल जायेगा, तो जरूर आ जायेगा! न मिला तो सरकार क्या कर सकती है?

उसका काम ढूँढना है, काले धन का पता लगाना है, सूँघना है कि काला धन किस विदेशी बिल (बैंक) में छिपा हो सकता है! सरकार सूँघ रही है। उसे गंध लग गयी तो सारा काला धन खींच लायेगी! लोग बेमतलब सरकार पर शक कर रहे हैं कि सरकार को साँप सूँघ गया! हो सकता है कि काले धन को ही साँप सूँघ गया हो, इसलिए अब वह किसी विदेशी बैंक में दिख नहीं रहा है!

फिर वही लिस्ट!

पहले यूपीए की ‘करमजली’ और ‘निठल्ली’ सरकार ढूँढ रही थी! उसे भी काला धन नहीं मिला। एक लिस्ट मिली कुछ बरस पहले। तब से वह सरकार उसे सूँघने में लगी थी। फिर अलादीन का चिराग लेकर मोदी सरकार आ गयी! पूर्ण बहुमत वाली! मजबूत! पक्के इरादों वाली! लोग बड़ी उम्मीद से थे। देखना अब चुटकी बजाते ही चमत्कार हो जायेगा! लेकिन बेचारी सरकार के पास तो बस एक लिस्ट थी, जो उसे पिछली सरकार से मिली थी। सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने अपना काम सँभालते ही जून में एसआईटी बना दी और लिस्ट उसे सौंप दी! तालियाँ बजीं! इसे कहते हैं चुस्त सरकार! अब आ जायेगा सारा काला धन! छह महीने बाद सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने बड़ी ना-नुकुर के बाद फिर वही पुरानी लिस्ट कोर्ट में जमा कर दी। वाया सुप्रीम कोर्ट वही लिस्ट फिर से एसआईटी के पास पहुँच गयी!

बस तब से अब तक में एक फर्क है। तब नहीं खुली थी, लेकिन अब लिस्ट की पोल खुल चुकी है! यही कि लिस्ट में आधे तो एनआरआई ही हैं, जिन पर देश के टैक्स कानून तो लागू ही नहीं होते! बाकी बची लिस्ट में बहुत-से खातों में एक दमड़ी भी नहीं है। सारा पैसा बरसों पहले ही कहीं और ठिकाने लगाया जा चुका है। बाकी बचे कुछ खातों में कुछ तो कानूनी रूप से बिल्कुल सही बताये जा रहे हैं, कुछ पर कार्रवाई हो कर पहले ही जुर्माना वगैरह वसूला जा चुका है और जो बचे-खुचे ‘काले’ खाते हैं भी, उनमें कुछ ज्यादा बड़ी रकम नहीं पड़ी है!

न राई निकली, और न निकलेगी!

यानी कहा आपने पहाड़, निकली राई भी नहीं! और निकलेगी भी नहीं! पिछले बीस-पच्चीस बरसों में अब तक की तमाम सरकारें टैक्स चोरों को पकड़ने के लिए अस्सी से ज्यादा देशों के साथ संधियाँ कर चुकी हैं। लेकिन इन संधियों के बावजूद कितना काला धन पकड़ा जा सका? कितने टैक्स चोर पकड़े जा सके? चलिए मान लिया कि एनडीए की पिछली वाजपेयी सरकार के साथ-साथ यूपीए, नेशनल फ्रंट, थर्ड फ्रंट वगैरह-वगैरह की तमाम सरकारें बड़ी ढीली थीं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकीं। मोदी सरकार बड़ी कड़क है। कुछ न कुछ जरूर करेगी। बस धीरज रखिए। सरकार को थोड़ा समय दीजिए। बिलकुल ठीक बात है। छह महीने में कोई सरकार कुछ भी चमत्कार नहीं दिखा सकती। समय लगता है। जी हाँ, समय तो लगेगा बशर्ते कि सरकार ने कुछ शुरुआत तो की हो? और फिर क्या काला धन वहीं है, जहाँ सरकार उसे ढूँढ रही है? और फिर क्या काले धन को ढूँढते-ढूँढते सरकार जब तक वहाँ पहुँचेगी, क्या तब तक काला धन वहीं पड़ा रहेगा कि आइये सरकार और मुझे पकड़ लीजिये!

खाते बंद करने की सलाह!

अभी हाल में ही खबर आयी है कि कई स्विस बैंकों ने अपने ग्राहकों को सलाह दी है कि अगर वह अपना नाम सामने नहीं आने देना चाहते तो अगले दो महीनों में अपने खाते बंद कर दें। जाहिर है कि यह पैसा या तो वहाँ से सरकाया जा चुका है या बस अब सरकने ही वाला है! तो इस बात का किसके पास क्या हिसाब है कि विदेशी निवेश के रास्ते शेयर बाजार के जरिये कितना काला धन देश में पहले ही वापस लौट चुका है! और इस बात का कौन हिसाब लगा सकता है कि देश में सोने के भंडार में लगातार होती रही बढ़ोत्तरी के पीछे काले को सफेद करने की कितनी कहानी है?

देसी काला धन क्यों नहीं ढूँढते?

तो सवाल यह है कि क्या काले धन को हम सही जगह ढूँढ भी रहे हैं या बस ढूँढते रहने का नाटक ही कर रहे हैं? काला धन क्या केवल विदेशी बैंकों में ही है? काला धन क्या देश में नहीं है? विदेश में काला पैसा पकड़ पाना इतना आसान नहीं है, यह बात बिल्कुल साफ है! फिर भी चलिये, जब आप वहाँ से पकड़ पाइएगा, तो पकड़िएगा, लेकिन पहले तो आप यह बताइये कि देश में जमा काला धन पकड़ने के लिए पिछले छह महीनों में आपने क्या किया? आप कहेंगे कि पिछले 67 साल में किस सरकार ने क्या किया? आपका सवाल बिल्कुल सही है। किसी ने कुछ नहीं किया। आपसे भी यह सवाल बिल्कुल नहीं किया जाता, अगर आपने अपने चुनाव प्रचार में बड़े-बड़े दावे न किये होते!

सब जानते हैं। बच्चा-बच्चा जानता है कि अपने देश में काला धन कहाँ खपता है। रियल एस्टेट में, फर्जी कंपनियों में, नाना प्रकार के रंग-बिरंगे ट्रस्टों में और राजनीति में! अब आप बताइए कि इन चार जगहों पर काले धन की खपत रोकने के लिए अब तक क्या कदम आपने उठाये हैं? और अगर अब तक नहीं उठाये हैं तो क्यों? क्या काला धन यहाँ नहीं है, इसलिए इसकी जरूरत नहीं! या यह कदम इतने कठिन हैं कि उठ नहीं सकते? बड़ी पुरानी कहावत है। अच्छे काम की शुरुआत पहले अपने से करो! तो क्यों न पहले राजनीति से काले धन के सफाये के लिए ‘स्वच्छता अभियान’ चलाया जाये?

राजनीति, रियल एस्टेट और बेनामी कंपनियाँ

आसान काम है! राजनीतिक दल एक भी पैसा बेनामी न लें। पाँच रुपये का चन्दा भी लें तो देनेवाले की पहचान, नाम, पता सब रिकार्ड में हो। ऑडिट हो तो दानदाताओं की पहचान स्थापित हो सके। यह पहला कदम है। क्यों नहीं उठ सकता है? क्या दिक्कत है? तो पहले अपने आपको काले धन से ‘मुक्त’ कीजिए, फिर दूसरों का काला धन पकड़ना बहुत आसान हो जायेगा!

फिर रियल एस्टेट! देश में सबसे ज्यादा काला धन अगर कहीं लगा है तो यहीं लगा है। आम आदमी से लेकर धन्ना सेठों और छोटे-बड़े राजनेताओं तक रियल एस्टेट के कितने सौदे काले पैसे के बिना नहीं होते, यह किससे छिपा है? राबर्ट वाड्रा जैसे कितने राजनेताओं या उनके रिश्तेदारों का रियल एस्टेट के धंधे से क्या रिश्ता है, यह कौन नहीं जानता? तो क्या इसीलिए इस सेक्टर में काले पैसे की बाढ़ रोकने के लिए न तो पिछली सरकारों ने कुछ ठोस किया और न मौजूदा ‘करिश्मों’ वाली सरकार ने?

काला धन फर्जी और बेनामी कंपनियों के जरिये भी धुलता है! (अब यह अपने गडकरी जी की दरियादिली ही रही होगी कि उन्होंने ‘सफेद धन’ वाली कंपनी में भी अपने ड्राइवर को डायरेक्टर बना रखा था! बड़े लोगों के बड़े दिल होते हैं!) बहरहाल, अब एक और नया काम इन ‘बेनामी’ कंपनियों से जुड़ गया है। घूस लेने का। फर्जी कंपनी बना लो, फिर कई और फर्जी कंपनियों के मकड़जाल से होते हुए ‘घूस’ के पैसे को कंपनी में ‘निवेश’ या ‘कर्ज’ के रूप में दिखा दो। घूस भी हो गयी और काले का सफेद भी हो गया। अब यह बड़ी-बड़ी घूस किन्हें दी जाती है? या तो बड़े-बड़े राजनेताओं को या बड़े-बड़े अफसरों को? क्या इसलिए ऐसी कंपनियों की निगरानी की जरूरत कभी महसूस नहीं की गयी? फिर आते हैं बड़े-बड़े ट्रस्ट। इनमें से बहुत-से ‘धार्मिक’ ट्रस्ट हैं या फिर ‘समाजसेवी’। अब इन पर कौन हाथ डाले?

तो अब बात आपको समझ में आ गयी होगी कि काले धन के खिलाफ ‘असली’ मुहिम आज तक कभी क्यों नहीं शुरू हुई और कभी भी क्यों शुरू नहीं होगी? काला पैसा देश में हो या विदेश में, राजनीति और राजनीतिक दलों से उसके गहरे रिश्ते हैं। इसलिए पार्टी कोई हो, सरकार कोई हो, बातें कितनी भी हों, काले धन का टेंटुआ कोई क्यों पकड़े? वरना अगर ऐसी बात नहीं तो क्या परेशानी है? आज के डिजिटल युग में कोई सरकार इसे रोकना चाहे तो चुटकियों में रोक सकती है! हमारे प्रधानमंत्री जी तो डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, उनके लिए तो यह काम बेहद आसान है, बशर्ते कि वह करना चाहें! (raagdesh.com)

(देश मंथन, 01 नवंबर 2014) 

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