पुण्य प्रसून बाजपेयी, कार्यकारी संपादक, आजतक :

'भागवत कथा' के नायक मोदी यूँ ही नहीं बने। क्या नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल के पीछे आरएसएस ही है। क्या आरएसएस के घटते जनाधार या समाज में घटते सरोकार ने मोदी के नाम पर संघ को दाँव खेलने को मजबूर किया।

क्या अटल-आडवाणी युग के बाद संघ के सामने यह संकट था कि वह बीजेपी को जनसंघ की तर्ज पर खत्म कर दे। और इसी मंथन में से मोदी का नाम झटके में सामने आ गया। क्या आरएसएस ने संघ परिवार के पर कतर कर मोदी को आगे बढाने का फैसला किया? यानी राजनीतिक तौर पर ही संघ परिवार का विस्तार हो सकता है, यह देवरस के बाद पहली बार मोहन भागवत ने सोचा। यानी कांग्रेस के खिलाफ जेपी आंदोलन में जिस तरह संघ के स्वयंसेवकों की भागीदारी हुई, उसी तरह मोदी के राजनीतिक मिशन को लेकर संघ के स्वयंसेवक देश भर में सक्रिय हो चले हैं। ये सारे सवाल ऐसे हैं, जो नरेंद्र मोदी के हर राजनीतिक प्रयोग के सामने कमजोर पड़ती आरएसएस की विचारधारा या संघ के विस्तार के लिए मोदी की राजनीतिक ताकत का ही इस्तेमाल करने की जरूरत के साथ खड़े हो गये हैं। और जिस बीजेपी ने दिल्ली की सियासत से दूर करने की साजिश के तहत मोदी को अक्टूबर 2001 में गुजरात भेजा, वही बीजेपी 12 बरस बाद मोदी के सामने ही छोटी हो गयी। इतिहास के इन पन्नों को पलटें तो कई सच नये तरीके से सामने आ जायेंगे।

दरअसल गांधीनगर सर्किट हाउस के कमरा नंबर 1 ए से गुजरात के सीएम पद को सँभालने वाले नरेंद्र मोदी अब जिस 7 आरसीआर की उड़ान भर रहे हैं, उसका नजारा चाहे आज सरसंघचालक मोहन भागवत की खुली ढील के जरिये नजर आ रहा हो, लेकिन इसकी पुख्ता शुरुआत 2007 में तब हो गयी थी जब मोदी को हराने के लिए संघ परिवार का ही एक गुट हावी हो चला था। और उस वक्त मोदी को और किसी ने नहीं, बल्कि सोनिया गांधी के मौत के सौदागर वाले बयान ने राजनीतिक ऑक्सीजन दे दिया था। सोनिया गांधी ने 2007 के चुनाव प्रचार में जैसे ही मौत के सौदागर के तौर पर मोदी को रखा, वैसे ही मोदी ना सिर्फ कट्टर हिंदूवादी और हिंदू आइकन के तौर पर संघ की निगाहों में चढ़ गये, बल्कि राजनीतिक तौर पर भी मोदी को जबरदस्त जीत मिल गयी।

और मोदी को समझ में उसी वक्त आया कि 2002 में एचवी शेषाद्रि ने उन्हें गुजरात को विकास के नये मॉडल पर खड़ा करने को क्यों कहा था। असल में मोदी को राजनीतिक उड़ान देने की शुरुआत भी बीजेपी और संघ से खट्टे-मीठे रिश्तों से हुई, जो बेहद दिलचस्प है। प्रमोद महाजन ने 2001 में राष्ट्रीय राजनीति से दूर करने के लिए नरेंद्र मोदी को दिल्ली से गुजरात भेजने की बिसात बिछायी। 23 फरवरी 2002 को राजकोट से उपचुनाव जीतने के बावजूद जिस नरेंद्र मोदी को संघ परिवार में ही कोई तरजीह देने को तैयार नहीं था, 4 दिन बाद 27 फरवरी 2002 को गोधरा की घटना के बाद वही मोदी संघ परिवार की निगाहों में आ गये। लेकिन सरसंघचालक सुदर्शन भी उस वक्त दिल्ली के झंडेवालान से मोदी से ज्यादा विश्व हिंदू परिषद और संघ के स्वयंसेवकों पर ही भरोसा किये हुये थे।

क्रिया की प्रतिक्रिया का असल सच यह भी है कि मोदी कुछ भी समझ पाते, उससे पहले संघ परिवार का खेल गुजरात की सड़कों पर शुरू हो चुका था और मोदी दिल्ली को जवाब देने से ज्यादा कुछ कर नहीं पा रहे थे। लेकिन उसके तुरंत बाद अक्टूबर 2002 में वाजपेयी के अयोध्या समाधान के रास्ते से विहिप को झटका लगा। वाजपेयी सुप्रीम कोर्ट के जरिये अयोध्या का रास्ता संघ के लिए बनाना चाहते थे, लेकिन हुआ उल्टा। विहिप को अयोध्या की जमीन भी छोड़नी पड़ी। संघ पहले ही आर्थिक नीतियों और उत्तर-पूर्व में संघ के स्वयंसेवकों पर हमले जैसी बातों से नाराज था। अयोध्या की घटना के बाद तो उसने पूरी तरह खुद को अलग कर लिया। 2004 में संघ परिवार ने खुद को चुनाव से पूरी तरह दूर कर लिया। लेकिन इसी दौर में मोदी को आसरा एच. वी. शेषाद्रि ने लगातार दिया। मोदी को विकास मॉडल के तौर पर गुजरात को बनाने की सोच दी।

यह अजीबोगरीब संयोग है कि राजनीतिक तौर पर मोदी ने पटेल समुदाय के जिस केशुभाई और प्रवीण तोगड़िया को निशाने पर लिया, उसी पटेल समुदाय के युवाओं को ग्लोबल बिजनेस का सपना दिखा कर मोदी ने अपने साथ कर लिया। असल में 2004 के चुनाव में आरएसएस ने एक तरह की खामोशी बरती और एनडीए सरकार वाजपेयी-आडवाणी की अगुवाई में दोबारा सत्ता में आये इसे लेकर कोई रुचि नहीं दिखायी। इसके बाद संघ के भीतर का एक धड़ा 2007 में मोदी को भी हराने में लग गया। आर्थिक नीतियों से लेकर राम मंदिर तक के मुद्दे पर रूठे दत्तोपंत ठेंगड़ी से लेकर अशोक सिंघल और तब एम. जी. वैद्य तक नहीं चाहते थे कि नरेंद्र मोदी की वापसी सत्ता में हो। लेकिन पहले शेषाद्रि और उसके बाद 2007 में सरकार्यवाह मोहन भागवत ने ही नरेंद्र मोदी को सँभाला।

मोहन भागवत ने मोदी के रास्ते के काँटों को हटाया। उग्र पटेल गुट के प्रवीण तोगड़िया को विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय मॉडल पर काम करने के लिए गुजरात से बाहर किया गया। एम. जी. वैद्य के बेटे मनमोहन वैद्य को भी अखिल भारतीय स्तर पर काम देकर गुजरात से बाहर किया गया। दरअसल 2007 में सोनिया के मौत के सौदागर वाले बयान के बाद पहली बार मोहन भागवत ने ही इन हालात को पकड़ा कि मोदी का गुजरात मॉडल अगर गांधी परिवार को परेशान कर सकता है तो फिर मोदी के जरिये ही आरएसएस दिल्ली की राजनीति को भी साध सकता है। और इसी के बाद मोहन भागवत ने खुले तौर पर मोदी के हर प्रयोग को हवा देनी शुरू की।

ध्यान दें तो 2012 में संघ परिवार में से सबसे पहले विहिप के उसी अशोक सिंघल ने मोदी को पीएम पद के लायक बताया जो 2007 से पहले मोदी का विरोध करते थे।

दरअसल मोहन भागवत ने बतौर सह सरकार्यवाह अपने एक्जीक्युक्टिव पावर का इस्तेमाल कर ना सिर्फ गुजरात को संघ परिवार की बंदिशों से मुक्त किया और 2009 में सरसंघचालक बनते ही बीजेपी के कांग्रेसीकरण से परेशान होकर मोदी को ही तैयार किया कि वे वाजपेयी-आडवाणी के हाथों से बीजेपी को निकालें। लेकिन 2009 में मोदी ने 2012 तक का वक्त माँगा, जिससे गुजरात में जीत की हैट्रिक बना कर दिल्ली जाये। इस दौर में आरएसएस का प्लान मोदी के लिए भविष्य का रास्ता बनाने लगा। संघ का प्लान सीधा था। दिल्ली में बीजेपी के कांग्रेसीकरण को रोकना जरूरी। वाजपेयी-आडवाणी युग को खत्म करना जरूरी है। संघ को सक्रिय करने के लिए राजनीतिक मिशन से जोड़ना जरूरी। विकास मॉडल के जरिये दिल्ली की सत्ता की व्यूह रचना करना जरूरी, क्योंकि अयोध्या सामाजिक मॉडल था और उस प्रयोग से भी बीजेपी अपने बूते सत्ता तक पहुँच नहीं पायी थी। राजनीतिक मशक्कत करने के लिए एक चेहरा भी चाहिए था। सरसंघचालक भागवत का मानना रहा कि मोदी ही इसे अंजाम देने में सक्षम हैं।

2009 में सरसंघचालक मोहन भागवत हर हाल में दिल्ली की बीजेपी चौकड़ी को ठिकाना लगाना चाहते थे और नरेंद्र मोदी 2012 से पहले गुजरात छोड़ना नहीं चाहते थे। नितिन गडकरी की बतौर बीजेपी अध्यक्ष एन्ट्री करा कर आरएसएस ने पहला निशाना आडवाणी के दिल्ली सामाज्य पर साधा। उसके बाद मोहन भागवत ने मोदी के विकास मॉडल को ही बीजेपी के भविष्य की राजनीति को साधने के लिए संघ परिवार के भीतर ही राजनीतिक प्रयोग करने शुरू कर दिये। सबसे पहले अयोध्या में राम मंदिर को लेकर सक्रिय विश्व हिन्दू परिषद को ठंडा करने के लिए विहिप को संघ प्रचारक देना ही बंद कर दिया। इसके समानांतर धर्म जागरण का निर्माण किया। धर्म जागरण के जरिये संघ के उन कार्यो को अंजाम देना शुरू किया जो पहले विहिप करता था। यानी संघ के प्रचारक जो अलग-अलग संघ के सहयोगी संगठनों में काम करते थे, वे प्रचारक विहिप के बदले धर्म जागरण में जाने लगे। इससे मोदी के घुर विरोधी प्रवीण तोगडिया की शक्ति भी खत्म हो गयी और वे विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बने भी रहे। इसी तर्ज पर किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, आदिवासी कल्याण संघ सरीखे एक दर्जन से ज्यादा संगठनों को नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल के अनुसार काम करने पर ही लगाया गया। इतना ही नहीं, पहली बार आरएसएस ने स्वयंसेवकों को खुले तौर पर राजनीतिक तौर पर सक्रिय करने का दाँव भी खेला।

संजय जोशी को दरकिनार करने के लिए मोदी ने जो बिसात बिछायी, उस पर आँखें भी संघ ने मूंद ली, जबकि संजय जोशी खुद नागपुर के हैं। बावजूद इसके आरएसएस ने संजय जोशी को खामोश करने के लिए मोदी को ढील भी दी और स्वयंसेवकों को संदेश भी दिया कि मोदी की राजनीतिक बिसात में कोई काँटे ना बोये। सर सहकार्यवाहक भैयाजी जोशी ने चुनाव के साल भर पहले से ही खुले तौर पर कमोबेश हर मंच पर यह कहना शुरू कर दिया कि हिंदू वोटरों को घर से वोट डालने के लिए इस बार चुनाव में निकालना जरूरी है क्योंकि बिना उनकी सक्रियता के सत्ता मिल नहीं सकती।

इसे खुले तौर पर बीते 10 अप्रैल को नागपुर में बीजेपी उम्मीदवार गडकरी को वोट डालने निकले सरसंघचालक और सर सहकार्यवाह कैमरे के सामने यह कहने से नहीं चूके कि इस बार बडी तादाद में वोट पड़ेंगे, क्योकि परिवर्तन की हवा है। तो मोदी के जरिये परिवर्तन की लहर का सपना आरएसएस ने पहले बीजेपी में, फिर संघ परिवार में और उसके बाद देश में देखा था। लेकिन जिस तेजी से संघ की चौसर को अपनी बिसात में मोदी ने बदला है, उसके बाद आरएसएस भी मान रहा है कि परिवर्तन देश की राजनीतिक सत्ता में पहले होगा और उसके बाद बीजेपी और संघ परिवार भी बदल जायेगा।

(देश मंथन, 21 अप्रैल 2014)

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