राजीव रंजन झा : 

इस देश में पैसों के लेन-देन को लेकर विवाद और मार-पीट होना, हत्या तक हो जाना कोई नयी बात नहीं है। लेकिन ऐसी किसी घटना को सनसनीखेज बनाने के लिए मीडिया इसमें जाति का कोण ढूँढ़े, राजनीतिक एजेंडाबाज इसमें एक नया रोहित वेमुला या भारत का जॉर्ज फ्लॉइड तलाशने लगें, तो उन्हें गिद्ध कहना क्या किसी तरीके से गलत होगा?

घटना उत्तर प्रदेश के अमरोहा की है। थाना हसनपुर में आने वाले ग्राम डोमखेड़ा में एक नाबालिग युवक की हत्या करने के संबंध में अमरोहा के पुलिस अधीक्षक डॉ. विपिन ताडा का यह बयान देखें -

"एक युवक की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी, जिसमें कि पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर आगे कार्रवाई शुरू की। इसी दौरान पुलिस ने दो अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है। इनका ये कहना है कि जो मृतक है, उनके भाई के साथ में इनके आम के बगीचों के ठेके और मधुमक्खी पालन की साझेदारी थी, जिसमें इनके पाँच हजार रुपये मृतक के बड़े भाई पर शेष थे। इस बात के तकादे को लेकर 31 तारीख को मृतक और अभियुक्त पक्ष में झगड़ा हुआ, जिसके बाद अभियुक्त गाँव छोड़ कर भाग गया। कल रात्रि में इसने बदला लेने के उद्देश्य से अचानक गाँव में आया और इस युवक को गोली मार कर फरार हो गया। पुलिस ने युवक को गिरफ्तार किया है, एक साथी को गिरफ्तार किया है और इनसे पूछताछ की जा रही है। इनके अन्य साथियों की जानकारी कर शीघ्र ही उनकी गिरफ्तारी भी की जायेगी।"

https://twitter.com/amrohapolice/status/1269585374680055808

अब इस खबर के बारे में गूगल पर खोजने से जो सुर्खियाँ सामने आ रही हैं उन्हें देखें -

1. मंदिर में जाना चाहता था दलित, दबंगों ने मारी गोली  

2. मंदिर जाने पर हुई दलित छात्र की हत्या

3. दलित नाबालिग ने की मंदिर में पूजा

4. यूपी: मंदिर में पूजा करने को लेकर इतना बढ़ा विवाद, दलित युवक की गोली मारकर हत्या

5. अमरोहा : मंदिर में पूजा करने को लेकर हुए विवाद के बाद नाबालिग दलित की गोली मारकर हत्या

6. UP: दलित परिवार का आरोप-मंदिर में घुसने की वजह से लड़के की हत्या

अब इससे आगे की कहानी देखिए। सोशल मीडिया पर #Dalitlivesmatter का हैशटैग चालू हो गया है, पोस्टर बना लिये गये हैं जिनमें कहा जा रहा है कि Vikas Jatav 17 years old shot dead for visiting a temple. कांग्रेस, वाम और दलित एजेंडा चलाने वालों ने ऐसे पोस्टर को अपनी कवर फोटो में डालना शुरू कर दिया है। क्या यह उनका दलित-प्रेम है, मानवीय संवेदनशीलता है, या एक नया रोहित वेमुला बनाने का एजेंडा है? जब अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉइड की हत्या के बाद अश्वेतों के दंगे शुरू हो गये, तो भारत में बड़ी कसक के साथ लोग सोशल मीडिया पर सवाल कर रहे थे कि हाय, भारत में ऐसा क्यों नहीं होता, कब होगा यहाँ भी इस तरह का आंदोलन? क्या यह पोस्टरबाजी भारत में जातीय दंगे भड़काने का शिगूफा है? 

मृतक के परिवार के हवाले से ही बताया जा रहा है कि वे लोग बरसों से मंदिर जाते रहे हैं। जब बरसों से वह परिवार मंदिर जा रहा था, तो इन पोस्टरों और खबरों में यह बात क्यों है कि मंदिर जाने के लिए मार दिया गया? मारने वाला इतना जातिवादी था कि मृतक को मंदिर जाने से रोकने के लिए उसे गोली मार दी। लेकिन वह इतना जातिवादी था कि मृतक के साथ व्यापारिक साझेदार भी था!

वहाँ के एसएचओ नीरज कुमार ने एक वेबसाइट को बताया कि इस बात का वीडियो सबूत मौजूद है कि दलित उस मंदिर में दशकों से जा रहे हैं। इसके बाद भी वह वेबसाइट उसी खबर का शीर्षक यह क्यों लिखती है,  "दलित परिवार का आरोप-मंदिर में घुसने की वजह से लड़के की हत्या"? 

जब दशकों से दलित समुदाय के लोग उस मंदिर में जाते रहे हैं, जब बरसों से वह परिवार खुद मंदिर जाता रहा था, तो फिर मंदिर जाने को लेकर झगड़ा अभी क्यों हुआ? वह भी लॉकडाउन के समय जब बहुत कम लोग मंदिर जा रहे हैं? क्या उस समुदाय के और लोगों को भी उस मंदिर में जाने से रोका गया या मारा गया? इन सारे सवालों के जवाब लिये बगैर इस हत्या को जातीय भेदभाव और मंदिर जाने से रोकने के लिए हत्या का मोड़ देना एक नया रोहित वेमुला खोजने का एजेंडा नहीं है क्या? 

जो लोग इस घटना पर पोस्टरबाजी कर रहे हैं, उन पर ध्यान दीजिए। ये वही लोग हैं, जो अमेरिका में दंगों के बाद सोशल मीडिया पर कसमसा रहे थे कि हाय, भारत में कब होंगे ऐसे दंगे। इन गिद्धों से सबको सावधान रहने की जरूरत है। दलित लाइव्स मैटर का हैशटैग अभी नहीं चल पाया तो फिर कभी किसी और घटना में चलाया जायेगा। लेकिन उनको यह चलाना जरूर है, वे मन बना चुके हैं।

(देश मंथन, 11 जून 2020)

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