हुक्मरान चला रहे अपनी दुकान

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संजय सिन्हा, संपादक, आज तक :

छोड़िए उस आज उस राजा की कहानी को, जिसने मुनादी पिटवाई थी कि मेरा सब ले जाओ। आज कहानी सुनाता हूँ, उन चार दोस्तों की जिन्होंने मिल कर बिजनेस करने की ठानी थी।

चार दोस्त थे। चारों बेरोजगार थे। चारों को लगता था कि दुनिया में कोई उनके टैलेंट की कद्र नहीं करता। चारों ने मिल कर तय कर लिया कि अब वो किसी से नौकरी माँगेंगे ही नहीं। अब वो अपना काम करेंगे। चारों ने काम भी चुन लिया। उन्होंने तय कर लिया कि वो मोटर वर्कशॉप खोलेंगे। वो गाड़ियों की मरम्मत का काम करेंगे।

चारों ने मिल कर बढ़िया इलाके में गाड़ियों की मरम्मत की दुकान खोली। चारों रोज वहाँ जाते, पर उनकी दुकान में कोई ग्राहक नहीं आता। महीने भर में ही चारों को लगने लगा कि दुकान बंद कर देनी चाहिए। और अपना मोटर गैराज उन्होंने बंद कर दिया।

उनकी मोटर कार मरम्मत की दुकान नहीं चली। जानते हैं क्यों?

क्योंकि उन्होंने गाड़ियों की मरम्मत का गैराज चौथी मंजिल पर खोला था। जाहिर है कोई गाड़ी वहाँ जा ही नहीं पाती थी।

क्या आपको हंसी आयी, इस कहानी पर? क्या कहा आपने, ये पुराना चुटकुला है?

बिल्कुल सही कहा आपने। यह बहुत पुराना चुटकुला है।

खैर, जब मैंने कहानी शुरू कर ही दी है, तो बीच में क्यों रोकूँ?

हाँ, तो उन चारों दोस्तों ने तय किया कि अब वो मोटर गैराज बंद कर टैक्सी सर्विस शुरू करेंगे। उन्होंने एक गाड़ी खरीदी और उसे टैक्सी में चलाने लगे।

हाय री किस्मत! वो महीना भर शहर में घूम-घूम कर टैक्सी चलाते रहे, लेकिन एक भी ग्राहक उन्हें नहीं मिला। दुनिया जहान की टैक्सियों का धंधा चल रहा था, एक उन्ही की टैक्सी में कोई नहीं बैठता था।

जानते हैं, उनकी टैक्सी पर कोई क्यों नहीं बैठता था?

क्योंकि वो चारों दोस्त उसी टैक्सी में बैठ कर ग्राहक ढूँढने निकलते थे।

फिर हँसी आई?

रुकिए। अब आखिरी हिस्सा सुनिए।

तो जनाब, उन चारों को बहुत दुख हुआ कि न तो उनका मोटर गैराज का धंधा चला, न टैक्सी का धंधा चला। अब क्या करें? चारों ने तय कर लिया कि इस गाड़ी को अब नदी में ले जाकर डूबो आएँगे। चारों ने उस गाड़ी को धक्का लगाना शुरू कर दिया। पर गाड़ी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई, नदी में क्या खाक जाती?

ओह! अब क्या हुआ संजय सिन्हा? जब चारों लोग गाड़ी को धक्का लगा ही रहे थे, तो फिर गाड़ी हिली क्यों नहीं? गाड़ी नदी तक पहुँची क्यों नहीं?

हँसिएगा मत। उस गाड़ी को दो दोस्त आगे से धक्का दे रहे थे, दो पीछे से।

***

हमारे यहाँ हुक्मरान भी खूब कोशिशें करते हैं कि देश आगे बढ़े। पर शाम होते-होते उनके यार लोग टीवी चैनल और अखबार के दफ्तरों में ऐस-ऐसे बयान दे आते हैं, कि बेचारे हुक्मरानों की कोशिशें धरी की धरी रह जाती हैं। कोई बोल आता है कि हम जानवर के बदले आदमी काट देंगे। कोई बोल आता है कि अगर किसी ने अंग्रेजी बोली तो जुबान खींच लेंगे। कोई कह देता है कि अगर किसी ने कुछ कहा, तो खून की नदियाँ बहा देंगे।

मेरी कहानी के चारों यार तो मूर्ख थे, इसलिए उनकी दुकान नहीं चली, उनकी टैक्सी भी नहीं चली। पर हुक्मरानों के सारे यार चतुर हैं। वो अपनी हरकतों से आपकी दुकान नहीं चलने दे रहे, आपकी गाड़ी नहीं चलने दे रहे। उनकी तो दुकान भी चल रही है, गाड़ी भी।

(देश मंथन, 08 अक्तूबर 2015)

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