राजीव रंजन झा : 

दरअसल संजय लीला भंसाली और उनकी फिल्म पद्मावत के खिलाफ मोर्चा तो छद्म सेक्युलरों का खुलना चाहिए था, पर करणी सेना का मोर्चा खुला होने के चलते छद्म सेक्युलर खुल कर अपनी बात कहनी कहने की जगह ही नहीं बना पा रहे हैं। मगर सेक्युलर मोर्चे से पद्मावत और भंसाली की कुछ-कुछ आलोचना सामने आने लगी है। 

यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि सिनेमाघरों से बाहर आते दर्शक बता रहे हैं कि इसमें तो राजपूतों और हिंदुओं के विरोध लायक कुछ है ही नहीं। तो मतलब यह कि अगर फिल्म राजपूती सम्मान और हिंदू परंपरा का मजाक नहीं उड़ा रही, तो निश्चित रूप से सेक्युलर नैरेटिव के विपरीत जा रही है! 

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने द क्विंट में एक लेख में जो बातें कही हैं, वे बता रही हैं कि यह फिल्म क्यों सेक्युलर नैरेटिव के विपरीत है। अभी इस खेमे ने भंसाली से निराश होने की बात शुरू की है, आगे इस फिल्म को सांप्रदायिक सोच को बढ़ावा देने वाला कह कर इसका विरोध भी किया जा सकता है। शायद इंतजार इस बात का हो कि करणी सेना वाले जरा चुप तो हो लें। 

आशुतोष इस लेख में कहते हैं, "फिल्म शुरू होती है अलाउद्दीन से। उसके वहशीपन से। उसकी काम पिपासा से। वो क्रूर है। वो विद्रूप है। वो अहंकारी है। वो अत्यंत महत्वाकांक्षी है। उसको हर नायाब चीज से मुहब्बत है। उसे हर हाल में पाना उसका सबसे प्यारा शगल है। उसके बड़े-बड़े बाल, उसके चेहरे पर चोट के निशान, उसकी अजीबो-गरीब पोशाक, उसके हाव-भाव, बोलने, चलने, उठने-बैठने का अंदाज, उसे हिंदुस्तान का सुल्तान कम और किसी कॉमिक्स पत्रिका का खलनायक ज्यादा बना देते हैं।"

और यहीं से इस फिल्म का सेक्युलरिज्म से छत्तीस का आँकड़ा शुरू हो जाता है। खिलजी का खलनायकत्व दर्शाना उन्हें चुभता है। मगर यह किसी भी किस्सागोई की बुनियादी बात है कि खलनायक जितना खतरनाक दिखेगा, नायक-नायिका का संघर्ष भी उतने ही जोरदार ढंग से उभरेगा। अगर शोले के गब्बर को कमजोर कर दें तो जय-वीरू और ठाकुर के पात्र भी अपने-आप कमजोर हो जाते हैं। मगर सेक्युलर खेमे की तो परेशानी यह है कि खिलजी को खलनायक के रूप में स्वीकार ही कैसे किया जाये? 

आशुतोष याद दिलाते हैं, "वामपंथी इतिहासकारों की बातें वैसे तो आजकल फैशन में नहीं हैं जो उसे एक काबिल सुल्तान का दर्जा देते हैं। जिसके बारे में लिखा गया कि उसने शराबबंदी लागू की, वैश्यावृत्ति पर रोक लगाई, उसकी ओर से उठाये गये टैक्स रिफॉर्म 19वीं शताब्दी तक चले, उसके भूमि सुधारों पर आगे चलकर शेरशाह सूरी और अकबर तक ने अमल किया।" एक "काबिल सुल्तान" को वहशी लुटेरे के रूप में दिखाया जाना सेक्युलर बिरादरी को नहीं पच सकता।

खिलजी सेक्युलर वामपंथी इतिहासकारों का आदर्श सुल्तान रहा है। पर सच से कितनी दूर भागा जा सकता है? इसलिए आशुतोष भी लिखते हैं, "ये सच है कि उसने हिंदू मंदिरों को ढहाया। लाखों हिंदुओं का कत्ल भी किया।" मगर फिर वे इसके तुरंत बाद जोड़ते हैं, "पर अमीर खुसरो के मुताबिक कट्टर मुसलमान उससे नफरत करते थे और कहते थे कि वो हिंदुओं के प्रति नरम था।"

कमाल है! हिंदू मंदिरों को ढहाने वाला, लाखों हिंदुओं का कत्ल करने वाला हिंदुओं के प्रति नरम था! तो फिर सख्त हो कर क्या करता? अमीर खुसरो की नजर में जो कट्टर मुसलमान थे, उनकी शिकायत क्या थी? क्या यह कि उसने लाखों हिंदुओं को मरवाया, पर करोड़ों हिंदू जिंदा बच गये?

फिल्म निर्माण की शैली और शिल्प के लिहाज से यह भंसाली की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से है, या सबसे कमजोर फिल्मों में से, इस पर भी एक बहस चल पड़ी है। लेकिन इस बहस में भी मुझे वैचारिक झुकाव का ही असर नजर आता है। सिनेमा हॉल से बाहर आते सामान्य दर्शक अभिभूत नजर आते हैं। मगर फिल्म के कथ्य को लेकर परेशान चिंतक-आलोचक बिरादरी ने बताना शुरू कर दिया है कि भंसाली फिल्म निर्माण भूल गये हैं!

(देश मंथन, 26 जनवरी 2018)

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