संदीप त्रिपाठी :

यदि आप किशोरवय के बच्चों के अभिभावक या शिक्षक हैं तो आपके लिए पूरी तरह सतर्क हो जाने का समय है।

आपने सतर्कता छोड़ी नहीं कि आपके बच्चे को नीली व्हेल निगल सकती है। जी हाँ, यह नीली व्हेल (Blue Whale) खारे पानी के समंदर वाली नहीं है, यह व्हेल ऑनलाइन समंदर में है जो 10 से 15 आयु वर्ग के बच्चों को निगलने के लिए घात लगाये बैठी है।

क्या है नीली व्हेल

व्लू व्हेल एक ऑनलाइन गेम है। इसमें सोशल मीडिया के जरिये 10 से 14 वर्ष के बच्चों को जोड़ा जाता है और उन्हें डेथ ग्रुप से जोड़ा जाता है। यह डेथ ग्रुप बच्चों को आत्महत्या के लिए उकसाता है। इस गेम में बच्चे को 50 दिनों में गेम की विभिन्न चुनौतियाँ पूरी करनी पड़ती हैं। यह खेल टीवी पर चलने वाले ऐडवेंचर रियलिटी शो की तरह का है। फर्क सिर्फ यह है कि इस गेम में आखिरी पड़ाव आत्महत्या करना है और गेम के दौरान क्यूरेटर और खिलाड़ी के अलावा किसी को पता नहीं होता कि गेम चल रहा है। यदि कोई बच्चा गेम बीच में छोड़ता है तो उसकी निजी सूचनाएँ सार्वजनिक करने या उसके माता-पिता को मार डालने की धमकी दी जाती है। व्लू ह्वेल चैलेंज नामक यह गेम अ साइलेंट हाउस, ए सी ऑफ व्हेल्स और वेक अप मी ऐट 4 एएम नाम से भी चल रहा है। अब तक दुनिया भर ब्लू व्हेल चैलेंज खेल कर करीब 200 बच्चे अपनी जान दे चुके हैं। भारत में पहला मामला मुंबई के अंधेरी इलाके में प्रकाश में आया है जहाँ मनप्रीत साहनी नामक एक 14 वर्षीय बच्चे ने 29 जुलाई को शाम छठवें माले से कूद कर अपनी जान दे दी। ट्विटर पर एक अन्य भारतीय किशोरी इस गेम के लिए क्यूरेटर तलाशते दिखी है।

कैसे होता है यह गेम

फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के जरिये इस गेम के क्यूरेटर किशोरवय खिलाड़ी तलाशते हैं। वह खिलाड़ी आपका बच्चा भी हो सकता है। इस गेम का हैशटैग #iamawhale #iwanttoplay #searchingcurator, #BlueWhaleChallenge आदि है। खिलाड़ी मिल जाने पर क्यूरेटर उसका ब्रेनवाश करते हैं और दुस्साहस के लिए तैयार करते हैं। यह गेम शुरू होने पर खिलाड़ी को प्रतिदिन एक दुस्साहसिक कार्य करने को कहा जाता है। यह दुस्साहिक कार्य 50 दिनों तक करना होता है। शुरुआत में कम दुस्साहसिक कार्य दिये जाते हैं। धीरे-धीरे दुस्साहस का स्तर बढ़ाया जाता है। इससे बच्चे में दुस्साहस करने के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है। 50वें दिन आखिरी दुस्साहसिक कार्य आत्महत्या करना होता है। हर दुस्साहसिक कार्य का फोटो या वीडियो क्यूरेटर को भेजना होता है। इस गेम के आठ खतरनाक कार्यों में रेजर से हाथ काट कर ‘F57’ बना कर क्यूरेटर को फोटो भेजना, सुबह 4:30 बजे उठ कर क्यूरेटर की भेजी डरावनी वीडियो देखना, अपनी त्वचा पर व्हेल की डिजाइन बना कर क्यूरेटर को फोटो भेजना, पूरे दिन क्यूरेटर के भेजे हुए संगीत को सुनना, पुल पर जा कर किनारे खड़े हो जाना, सुई को अपने हाथ पर बार-बार चुभोना, सबसे ऊपर की मंजिल पर जा कर वहाँ किनारे खड़े रहना और सुबह 4:20 बजे निकटवर्ती रेल रोड पर पहुँचना शामिल है। 

किसने किया शुरू

इस आत्महंता दुस्साहसिक गेम का आवष्कारक रूस के 22 वर्षीय फिलिप बुदेकिन को माना जा रहा है। फिलिप को नवंबर में गिरफ्तार कर साइबेरिया की जेल में बंद किया जा चुका है। फिर भी पूरी दुनिया में इस गेम का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। हाल यह है कि जेल में बंद फिलिप के पास किशोरियाँ ढेरों प्रेमपत्र भेज रही हैं। फिलिप का कहना है कि गेम में चुने जाने वाले खिलाड़ी बायोडिग्रेडेबल कचरे हैं। ये मानसिक रूप से कमजोर किशोर हैं और समाज पर बोझ हैं। इसलिए समाज से उनकी सफाई करने के लिए वह ऐसे किशोरों को आत्महत्या के लिए उकसा रहा था। फिलिप ने सोशल मीडिया नेटर्क वीकांटेक्ट के जरिये 2013 में ब्लू ह्वेल चैलेंज शुरू किया था। हालाँकि उसका कहना है कि उसे प्रत्यक्षत: सिर्फ 17 किशोरों को आत्महत्या के लिए निर्देशित किया। जेल जाने से पहले 28 अन्य किशोर उसके संपर्क में थे। लेकिन अन्य आत्महत्याओं से वह नावाकिफ है। फिलहाल यह ब्लू ह्वेल चैलेंज रूस से आगे बढ़ता हुआ अमेरिका, यूरोप से होते हुए भारत आ पहुँचा है।

किशोरों में हताशा खतरनाक स्तर पर

भारत में किशोरों की मानसिक स्थिति इस गेम के लिए उर्वर दिखती है। डब्लूएचओ (WHO) ने विश्व स्वास्थ्य दिवस पर 7 अप्रैल, 2017 को दक्षिण पूर्व एशिया में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति : कार्रवाई का सबूत नामक एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में बहुत चौंकाने वाले नतीजे सामने आये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जनसंख्या 131.11 करोड़ है जिसमें 7.5 करोड़ किशोर (13-15 वर्ष) हैं और यह कुल जनसंख्या का 5.8 प्रतिशत है। इसमें 3.98 करोड़ लड़के हैं और 3.57 करोड़ लड़कियाँ हैं।

रिपोर्ट के अनुसार भारत के 13-15 आयु वर्ग के हर चार बच्चे में एक बच्चा अवसादग्रस्त (Depression) है और उदास या निराश है। रिपोर्ट सात प्रतिशत किशोर झिड़की (adverse comment) से आहत पाये गये। 11 प्रतिशत हमेशा या अधिकांश समय अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। आठ प्रतिशत किशोर चिंता के कारण बेचैन हैं और सो नहीं पाते। आठ प्रतिशत किशोर अकेलापन महसूस करते हैं। 10.1 प्रतिशत किशोरों के कोई घनिष्ठ मित्र नहीं हैं। 20 प्रतिशत किशोरों ने माता-पिता से कम घनिष्ठता की शिकायत की। चार प्रतिशत किशोर तंबाकू सेवन करते हैं और आठ प्रतिशत शराब पीते हैं।

भारत आत्महत्या के मामले में अव्वल

डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में भारत में 15-29 आयु वर्ग के प्रति एक लाख व्यक्ति पर आत्महत्या की दर 35.5 थी जो दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में सर्वाधिक है। रिपोर्ट बताती है कि 15-29 आयु वर्ग के लोगों के बीच मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है। डब्लूएचओ की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में होने वाली वार्षिक तौर पर आठ लाख आत्महत्याओं में 21 प्रतिशत भारत में ही होते हैं यानी आत्महत्या के मामले में भारत अव्वल है।

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014 में आत्महत्या करने वालों में 18 से 30 आयु वर्ग के युवाओं की तादाद सबसे ज्यादा 44,870 थी। उनके अलावा 14-18 वर्ष के 9,230 किशोर भी इनमें शामिल थे। एनसीआरबी के ही वर्ष 2015 के आँकड़ों के अनुसार भारत में हर घंटे एक विद्यार्थी आत्महत्या करता है। वर्ष 2015 में 8,934 विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या के मामले दर्ज हुए। 2015 तक पाँच वर्ष में 39,775 विद्यार्थियों ने विद्यार्थियों ने अपनी जान ले ली। वर्ष 2015 में विद्यार्थियों द्वारा सर्वाधिक आत्महत्या महाराष्ट्र (1230) में, फिर क्रमश: तमिलनाडु (955), छत्तीसगढ़ (730), पश्चिम बंगाल (676) और मध्य प्रदेश (625) में की गयी।

क्या कहते हैं मनोविज्ञानी

इस पूरे मुद्दे पर हमने आईआईटी, कानपुर के मनोविज्ञान के प्रोफेसर ब्रजभूषण से बातचीत की। प्रो. ब्रजभूषण ने बताया कि इस तरह के गेम की ओर बच्चों के आकर्षित होने का मुख्य कारण अपनी योग्यता और उपलब्धि का अहसास, जोखिम से प्राप्ति का गलत आकलन और प्रतिफल का अनुबंध है। उम्र-विशेष के दौरान हो रहे शारीरिक परिवर्तन इस उम्र के बच्चों को ऐसे कार्यों की तलाश के लिए बाध्य करते हैं जो उन्हें उनके होने का, उनकी योग्यता का भान कराये। आभासी दुनिया उन्हें ऐसी गतिविधियों में शामिल होने का अवसर प्राप्त करा सकती है जिससे उन्हें जल्द से जल्द उपलब्धि का अहसास हो और इसके फलस्वरूप उन्हें योग्य होने का भान हो।

प्रो. ब्रजभूषण बताते हैं कि परिपक्व होने के साथ ही जोखिम-प्राप्ति आकलन के साथ हमारा तारतम्य बेहतर होता जाता है। लेकिन बच्चों के मामलों में ऐसा नहीं होता। आभासी गेम से मिलने वाले अल्पावधि खुशी उन्हें इस तरह के गेम के लिए और प्रेरित करती है। गेम के प्रारंभिक चरण में लाभप्रद सक्रियता जोखिम आकलन की सुविधा नहीं देती। यदि इस चरण में बच्चे अभिभावकों की निगरानी से वंचित होते हैं तो गलती का जोखिम बढ़ जाता है। इसका अंत सांघातिक परिणाम के रूप में सामने आ सकता है। पाने की इच्छा बच्चे को गेम में बनाये रखती है। उपलब्धि के भान के साथ ही यह बच्चे को गेम के आगे के चरण में जाने को बाध्य करती है।

बच्चे में किन बदलावों पर रखें नजर

आपका किशोरवय बच्चा यदि इस तरह के गेम में फँसता है तो उसकी पहचान के लिए कुछ लक्षण हम दे रहे हैं। यदि बच्चे के अभिभावक सतर्क रहें तो इन लक्षणों के आधार पर समय रहते अपने बच्चे को नीली व्हेल का शिकार होने से बचा सकते हैं। सर्वप्रथम तो किशोरवय के बच्चों के शरीर पर नजर रखें। यदि बच्चे के शरीर के किसी अंग पर किसी नुकीली चीज से कोई निशान बनाया गया दिखता है तो इसे हल्के में न लें। दूसरा बड़ा लक्षण है कि बच्चा यदि आपसे कुछ छुपा रहा है, कम बोलने लगा है, असमय सोने-जगने लगा है या उसकी सामान्य दिनचर्या से व्यतिक्रम दिखता है तो सतर्क हो जायें। ऐसा बच्चा समाज से थोड़ा कटने लगेगा, झिड़कियों पर उसकी प्रतिक्रिया बदल जायेगी, वह सुस्त सा दिखेगा, कभी अचानक गुस्सा आ जायेगा या वह बेपरवाह होने लगेगा, ऐसे परिवर्तनों पर अभिभावकों को सूक्ष्म नजर रखनी होगी। अभिभावकों के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वे अपने बच्चे की ऑनलाइन गतिविधियों से नियमित रूप से पूरी तरह वाकिफ रहें।

बच्चों को ऐसे बचा सकते हैं अभिभावक

प्रो. ब्रजभूषण बच्चों को इस सांघातिक गेम से बचाने में अभिभावकों की बड़ी भूमिका को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि अभिभावकीय निगरानी को सुनिश्चित करने के लिए बच्चे के साथ घनिष्ठता बनाये रखें। बच्चे के समय के भटकाव पर ध्यान दें और बच्चे की दिनचर्या में किसी भी बदलाव के प्रति संवेदनशील रहें। प्रो. ब्रजभूषण के अनुसार बच्चे के साथ अभिभावकों की घनिष्ठता ही इस समस्या का मुख्य निदान है। इससे जहाँ बच्चे पर निगरानी बनी रहती है, वहीं बच्चा यह भी महसूस नहीं करता कि उसे नियंत्रित किया जा रहा है या उस पर निगरानी की जा रही है। यह समय के भटकाव, खास कर आभासी चरित्रों के प्रति आकर्षण पर नजर रखने का भी अवसर देगा। वास्तविक जीवन परिदृश्य से निष्क्रियता से बच्चे की दिनचर्या में भी परिवर्तन की संभावना है जैसे बच्चा अपने समय पर खेलने जाने, दोस्तों से मिलने और भाई-बहनों के साथ बातचीत करने में अनिच्छुक हो सकता है। अभिभावक अपनी घनिष्ठता से बच्चे को भटकने से बचा सकते हैं। ज्यादा परेशानी आने पर अभिभावकों को परमार्शदाता की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

(देश मंथन, 04 अगस्त 2017)

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