संदीप त्रिपाठी

सुशासन बाबू की छत्रछाया में बिहार में जंगलराज रिटर्न की शूटिंग चल रही है। महज बीते दो दिन यानी 20 अगस्त और 21 अगस्त, 2018 की घटनाओं पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है। आरा (भोजपुर) के बिहिया क्षेत्र में सोमवार को एक युवक की हत्या के शक में भीड़ एक महिला को निर्वस्त्र कर एक घंटे चौराहे पर घुमाती है और इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है।

सोमवार को ही पटना के मशहूर न्यूरोलॉजिस्ट एसएम रोहतगी को फोन कर अपराधियों ने चार करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी। रंगदानी न देने पर जान से मारने की धमकी दी। दूसरे दिन मंगलवार यानी 21 अगस्त को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में एक महादलित महिला से बलात्कार करने में विफल रहने पर दबंगों ने उस पर तेल डाल कर जिंदा जला दिया। फिलहाल महिला अस्पताल में जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रही है। बिहार की कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या है, इसका एक उदाहरण हाजीपुर में देखा गया जब एफआईआर पर दस्तखत लेने गये एक दरोगा से विवाद होने पर भीड़ ने उसे बीच सड़क दौड़ा-दौड़ा कर न सिर्फ पीटा बल्कि उसकी पिस्टल भी छीन ली। इससे पहले बिहार मुजफ्फरपुर होमशेल्टर कांड, पटना आसरा होम कांड जैसे शर्मनाक कुकृत्यों से रूबरू हो चुका है।

सियासी आरोप-प्रत्यारोप

ऊपर गिनायी गयी घटनाएँ एक बात साफ करती हैं कि राज्य में पुलिस-प्रशासन का कोई खौफ नहीं रह गया है। विपक्ष के नेता राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव इसे महाजंगलराज बताते हुए नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं तो नीतीश की पार्टी जनता दल युनाइटेड तेजस्वी को तेवर दिखा रही है कि जंगलराज वाले हमें कानून-व्यवस्था का पाठ न पढ़ायें। दरअसल, आरा के बिहिया कांड में गिरफ्तार 15 लोगों में एक कौशल किशोर यादव राजद का स्थानीय नेता बताया जा रहा है। इससे जदयू को इस कांड के लिए राजद पर आरोप लगाने का मौका मिल गया है। लेकिन क्या यह सही है? जदयू और राजद के आरोप-प्रत्यारोप के बीच बिहार की जनता कहाँ पिस रही है, यह देखना होगा।

अच्छी कानून-व्यवस्था ने दिया था सुशासन बाबू का तमगा

नीतीश कुमार जब पहली बार भाजपा के गठबंधन में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, उस वक्त राजद के लंबे शासनकाल से राज्य मुक्त हुआ था। राजद के शासनकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिल्कुल चौपट हो चुकी थी और जनता लालू प्रसाद यादव के जंगलराज से त्राहिमाम कर रही थी। लालू यादव के शासनकाल में हत्या, नरसंहार, लूट, अपहरण उद्योग का रूप धारण कर चुका था। नीतीश ने लालू प्रसाद के जंगलराज के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया था। ऐसे में नीतीश बिहार के लिए नये सवेरे की तरह आये और उन्होंने कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारने को प्राथमिकता के आधार पर लिया। नीतीश के शासनकाल में कानून-व्यवस्था इतनी बेहतर बतायी जाने लगी कि जो महिलाएँ शाम छह बजे के बाद घर से निकलना मुनासिब नहीं समझती थीं, वे रात को दस बजे भी अपने काम से सड़कों पर बेधड़क निकलने लगीं। इन खूबियों के कारण ही नीतीश कुमार का नाम सुशासन बाबू पड़ गया। यह स्थिति 2013 तक चलती रही।

राजद से गठबंधन के बाद बिगड़ी स्थिति

वर्ष 2013 में भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किये जाने पर नीतीश कुमार बिदक गये और भाजपा से बरसों पुराना गठबंधन तोड़ दिया। ऐन मौके पर लालू यादव ने सियासी नजाकत को भाँपते हुए नीतीश कुमार को राजद का समर्थन घोषित कर दिया। अब नीतीश कुमार राजद के समर्थन से बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे। बीच में हालाँकि 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू की दुर्गति के बाद उन्होंने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और अपनी जगह अपने विश्वस्त गया के जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन माँझी नौ महीने मुख्यमंत्री रह पाये और नीतीश कुमार से अनबन होने पर उन्हें फरवरी, 2015 में इस्तीफा देना पड़ा। अब नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बने। अब प्रशासन में राजद का हस्तक्षेप बढ़ने लगा। यहीं से सुशासन बाबू की छवि टूटनी शुरू हुई। राजद के समर्थन से सरकार चला रहे नीतीश कुमार कानून-व्यवस्था पर ज्यादा दबाव नहीं बना पा रहे थे लेकिन समय-समय पर तेवर दिखाते रहे। फिर बिहार विधानसभा के चुनाव में राजद-जदयू का महागठबंधन एक होकर चुनाव लड़ा। इसमें राजद को सर्वाधिक सीटें मिलीं। नीतीश की जदयू को कम सीटें मिलीं लेकिन राजद ने नीतीश को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया। हाँ, नीतीश को लालू के एक पुत्र तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री और दूसरे पुत्र तेज प्रताप यादव को स्वास्थ्य मंत्री बनाना पड़ा। अब नीतीश कुमार की प्रशासन पर पकड़ पहले जैसी नहीं रह गयी। राज्य में कानून-व्यवस्था की गिरती स्थिति को जाहिर करने वाली वारदातें होने लगीं। शासन में राजद का हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया और नीतीश असहाय महसूस करने लगे। आखिरकार जुलाई, 2017 को लालू प्रसाद के पुत्र और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के रेलवे कैंटीन घोटाले में नाम आने को मुद्दा बनाते हुए नीतीश कुमार ने राजद का हाथ झटका दिया और रातों-रात भाजपा के समर्थन से दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। लेकिन राजद से मुक्ति के बाद भी नीतीश सूबे की कानून-व्यवस्था पर लगाम नहीं कस पाये हैं। कारण क्या है?

नीतीश ने खो दिया नैतिक बल

दरअसल सुशासन करने के लिए नेतृत्व के पास नैतिक बल होना चाहिए। नीतीश कुमार वह नैतिक बल खो चुके हैं। बिहार की कानून-व्यवस्था की हालत दोबारा 2005 से पहले की स्थिति में पहुँच चुकी है। नीतीश का राजनीतिक लक्ष्य भी जनता की बेहतरी से ज्यादा खुद को सत्ता में बनाये रखना दिख रहा है। इसलिए वे सदा ऐसे में मुद्दों की तलाश में दिख रहे हैं जो उन्हें सत्ता में बनाये रखे। ऐसे में मूल मुद्दों और जनता की बेहतरी की बातें पीछे छूट गयी हैं। बिहार को विशेष दर्जा देने की बात हो या राजद के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा या भाजपा के खिलाफ सांप्रदायिकता का मुद्दा उठाने की बात हो, नीतीश अपनी जरूरत के हिसाब से मुद्दा पकड़ने के अभ्यस्त हो गये हैं। लेकिन बार-बार पलटी खाने से उनका सियासी चरित्र विश्वसनीय नहीं रह गया है।

इस पूरे कालक्रम में जो देखने वाली बात है कि वह यह कि सियासी आधार पर तीन प्रमुख दलों राजद, जदयू और भाजपा के बीच सामाजिक बँटवारा भी साफ दिख रहा है। इससे अब पार्टियाँ सत्ता पाने के लिए जनता के बीच जाकर संघर्ष करने की बजाय जोड़-तोड़ पर ज्यादा भरोसा कर रही हैं। ऐसी स्थिति में सियासी दलों के लिए जंगलराज, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता-धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे महज सियासी नारे बन कर रह गये हैं। बिहार को सुशासन के लिए अब सियासी ओवरहॉलिंग की जरूरत है और यह ओवरहॉलिंग करना बिहार की जनता के वश का ही है। वरना जंगलराज तो चल ही रहा है।

 (देश मंथन, 21अगस्त 2018)

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