अतुल कौशिक

वैश्विक व्यापार विशेषज्ञ  

भारत और अमेरिका के बीच संबंधों के ऐसे तीन पहलू हैं, जिन पर डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे का प्रभाव होने वाला है। पहला तो रणनीतिक पहलू है। इसमें द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक – तीनों तरह की बातें हैं। इन रणनीतिक पहलुओं पर ट्रंप की इस यात्रा की तैयारी के चरण में काफी प्रगति हुई है। लिहाजा इस संबंध में काफी सकारात्मक असर रह सकता है।

दूसरा पहलू है व्यापार और अर्थव्यवस्था का। इस संबंध में भारत ने बहुत तर्कपूर्ण रुख अपनाया है कि कोई भी व्यापार समझौता (ट्रेड डील) दोनों पक्षों के लिए लाभदायक होना चाहिए। जो भी बातचीत अभी तक हुई है, उससे यह लग रहा है कि दोनों पक्षों की जीत वाले परिणाम अभी दोनों के हाथ में नहीं आये हैं और उस पर बातचीत करनी पड़ेगी। ट्रंप जो एकमात्र लाभ लेकर जा सकते हैं, वह यही है कि उन्होंने कोशिश की और वे एक बड़ा समझौता बाद में हासिल कर सकते हैं, जैसा उन्होंने कहना भी शुरू कर दिया है। दोनों देशों के लोगों के लिए पारस्परिक जीत की स्थिति पायी जाये, इसके बदले वे अपनी घरेलू राजनीति में इसका उपयोग कर सकते हैं। 

जहाँ तक भारत का संबंध है, हमने यह दिखाया है कि संतुलित तरीके से दोनों का लाभ ही हमारे व्यापार संबंधी एजेंडा को आगे बढ़ा सकता है। कोई दौरा होने, या न होने से यह निर्धारित नहीं होगा कि लंबी अवधि के व्यापारिक संबंध कैसे बनेंगे। 

तीसरा पहलू राजनीतिक है। सबसे बड़े और सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश साथ आकर बातचीत कर रहे हैं। यहाँ कुछ संवेदनशील मुद्दे हैं, भारत में वर्तमान सरकार और अमेरिका की मौजूदा सरकार ने जो कुछ कदम उठाये हैं, वे दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध को प्रभावित कर सकते हैं। इसमें पंथ (रिलीजन) के मुद्दे हैं, एच1बी वीसा के मुद्दे हैं, ग्रीन कार्ड में देरी के मुद्दे हैं, अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों के डेमोक्रेटिक दल से रिपब्लिकन दल की ओर जाने के पीछे क्या कारण हैं – पर ये बातें दलगत राजनीति की हैं, चाहे रिपब्लिकन पार्टी के लिए हो या भाजपा के लिए। इसका भारत या अमेरिका के लोगों के नजरिये से कुछ खास निष्कर्ष नहीं है। 

व्यापार के मसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो शिकायती लहजा दिखाया है, दरअसल ट्रंप को अगर आप ठीक से समझें तो राष्ट्रपति बनने या 2014 में राष्ट्रपति पद के लिए प्रचार अभियान शुरू करने से भी पहले से वे स्वयं को एक डील-मेकर और कुशल मोल-भाव करने वाले के रूप में पेश करते रहे हैं। कुशल वार्ताकार यह कोशिश करते हैं कि अपनी शर्तों पर बात करें, दूसरे लोगों को अपनी शर्तों पर बातचीत करने की स्थिति में ले आयें। ट्रंप इसी उद्देश्य से शिकायती भाषा का उपयोग कर रहे हैं। यह कहना कि आप हमारी मोटरसाइकिलें नहीं ले रहे हैं, या हमारे दुग्ध उत्पाद नहीं ले रहे हैं तो आप बहुत बड़ी व्यापारिक दीवार खड़ी कर रहे हैं – यह सब केवल दिखावा है। हमारे प्रधानमंत्री ने तो कभी यह नहीं कहा होगा ना कि एक करोड़ लोग स्वागत करेंगे! पर ट्रंप ने यह बात उछाल दी कि देखो वहाँ एक करोड़ लोग होंगे। कभी 10 लाख कहते हैं, कभी एक करोड़ कहते हैं! ये सब बातें दिखावा हैं, सारी दुनिया ट्रंप के बारे में जानती है और उन्हें इन बातों पर गंभीरता से नहीं लेती है। 

इसी तरह से व्यापार समझौते पर वे जो कह रहे हैं, उसका मतलब यह नहीं है कि वे वाकई नाराज हैं। उसका मतलब यह है कि वे स्वयं को एक कुशल वार्ताकार के रूप में पेश कर रहे हैं कि मैं इनको कितना दबाव में ला सकता हूँ। वे इस तरह की बयानबाजी करके भारत को दबाव में लाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं लाइटहाइजर (अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि) चुप करके बैठ गये हैं, आने से भी मना कर रहे हैं। ये सब बातें वार्ता की चालबाजियाँ हैं, जिसे दुनिया समझती है। लेकिन जब वे असल में वार्ता के लिए बैठेंगे, जिस तरह से चीन के साथ समझौते के लिए बैठे, तब वे अपने आडंबरों को उतार कर रख देंगे और एक उचित समझौते के बारे में बात करेंगे। 

अमेरिका से भारत के जो व्यापारिक मुद्दे हैं, उनमें यह है कि अमेरिका ने 50-60 लाख डॉलर के नुकसान को लेकर जीएसपी हटा दिया। इतना नुकसान तो हम भुगत सकते हैं, हमारे लिए यह इतनी बड़ी समस्या नहीं है, लेकिन इससे संदेश क्या निकल रहा है? एक विकासशील देश को आप पाँच दशकों से यह छूट दे रहे थे, और अचानक एक ऐसे तर्क से आपने इस छूट को खत्म कर दिया जो डब्लूटीओ में जाने पर न्यायिक रूप से ठहर नहीं सकेगा। जीएसपी पर हम यही कह रहे हैं कि इसके लिए आप हमसे बदले में बहुत बड़ी चीजें मत माँगिए। जीएसपी हमें मिलना चाहिए, जैसे कि बाकियों को मिलता है। बस आपकी पीठ थपथपा देंगे हम! 

हम जीएसपी की बहुत चिंता इस रूप में नहीं करेंगे कि उसके लिए एकदम झुक जायें, बदले में बहुत कुछ दे दें। पर अपने छोटे निर्यातकों की चिंता तो हमें है। हमारे छोटे दवा निर्यातक हों, या साइकल के पुर्जे निर्यात करने वाले हों, उनको तो इससे नुकसान हो ही रहा है। उन्हें 3-4% ज्यादा सीमा शुल्क देना पड़ रहा है, उस पर वह ताइवान, इंडोनेशिया और चीन से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। उन्हें समस्या हो रही है। लेकिन हमारे कुल भारत-अमेरिका व्यापार को देखें तो यह कोई बड़ी चोट नहीं है। 

दूसरा मामला काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी) का है। सीवीडी उन देशों पर लगाया जाता है, जो अपने निर्यातकों को सब्सिडी देते हैं। सब्सिडी का प्रतिरोध करने के लिए सीवीडी लगाया जाता है। पर सीवीडी के लिए डब्लूटीओ में कुछ प्रावधान हैं और डब्लूटीओ से पहले भी अमेरिका के कानून में ही यह बात थी कि वे विकासशील देशों के साथ अलग तरह का व्यवहार करेंगे। मगर दो हफ्ते पहले अमेरिका ने अपने इन नियमों को भारत पर लागू करना बंद कर दिया। अमेरिका के इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन (आईटीसी) ने भारत के लिए अपने नियमों को बदल दिया है। इसके कारण हमारे छोटे-मँझोले (एसएमई) निर्यातकों को भी अगर भारत में कुछ कर रियायतें या क्षेत्र के आधार पर सब्सिडी मिल रही हैं, उन सबको भी अमेरिका सब्सिडी मार्जिन का स्तर निर्धारित करने में जोड़ेगा और उसके ऊपर सीवीडी लगायेगा। इससे हमारे निर्यातकों के उत्पाद अमेरिकी बाजार में महँगे हो जायेंगे। 

हमारे एसएमई निर्यातकों के पास इतनी शक्ति नहीं है कि वे अमेरिका के स्थानीय न्यायालयों में आईटीसी के खिलाफ अपील करके मुकदमा जीतें। हालाँकि यह मुकदमा जीतने लायक ही होगा। भारतीयों ने अमेरिकी अदालतों में बहुत सारे ऐसे मुकदमे जीते हैं, पर सीवीडी के खिलाफ वे मुकदमे बड़ी कंपनियों या उद्योग संगठनों ने लड़े थे, जो कपड़ा, कृषि उत्पाद और इस्पात (स्टील) क्षेत्र से हैं। पर हमारे छोटे निर्यातकों को नुकसान होगा। यह हमारी एक बड़ी चिंता है। अमेरिकी प्रशासन और खास कर ट्रंप यह मानने लगे हैं कि हम अब विकासशील देश नहीं रह गये हैं, और इस गलत मान्यता के चलते उन्होंने अपने नियम बदल कर हम पर सीवीडी लगाने का फैसला किया है। इसे पलटने की जरूरत है। 

तीसरा मसला यह है कि हमें अमेरिका को निर्यात किये जाने वाले कुछ उत्पादों के लिए उनकी बाजार में ज्यादा पहुँच (मार्केट ऐक्सेस) चाहिए। जैसे मैं एक उदाहरण देता हूँ। हम उनको कहते हैं कि आप हमें कुछ निर्यात करेंगे जीएमओ-फ्री होना चाहिए, हमारी कुछ जाँच से गुजरे बिना हम उनकी चीजों का आयात नहीं करेंगे। हमारी एजेंसियाँ पहले उन उत्पादों की जाँच करेंगी, उसके बाद ही खेप अंदर आयेगी। वे इसके खिलाफ हैं कि आप क्यों हमारी चीजों की ऐसी जाँच कराना चाहते हैं। लेकिन हम जब यहाँ से निर्यात करते हैं, जैसे हमारे खाद्य उत्पाद जाते हैं, झींगा वगैरह जाते हैं, तो उनके ऊपर वैसे ही मानक वे वहाँ लगाते हैं। तो यह बड़ी एकपक्षीय किस्म की बातचीत उनकी ओर से होती है कि चूँकि आप अपने देश में कमतर मानक रखते हैं, इसलिए आप अपने देश में कमतर मानक वाली चीजों के आयात की भी अनुमति दें। लेकिन हम आपको यह अनुमति नहीं देंगे कि हमारे मानक से नीचे की चीजें आप अमेरिका को निर्यात करें। 

(देश मंथन, 24 फरवरी 2020)

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