राजीव रंजन झा : 

सेना प्रमुख अवैध घुसपैठ की बात करें और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से उसका विश्लेषण करें, यह बिल्कुल उचित है। लेकिन किन्हीं राजनीतिक दलों की सार्वजनिक चर्चा करना उनके लिए कतई उपयुक्त नहीं लगता।  

आशा है कि सेना इसे केवल एक बार की फिसलन मान कर भविष्य में इससे पूरा परहेज करेगी, और तमाम राजनीतिक दल भी इसे मुद्दा न बनाने की परिपक्वता दिखायेंगे।

सेनाध्यक्ष को यह चिंता करनी चाहिए कि घुसपैठियों के लिए सीमा पार कर भारत के अंदर आना कैसे असंभव बन जाये। जो ऐसा दुस्साहस करें, उनका स्वागत सैनिकों की अचूक गोलियों से हो। सेनाध्यक्ष को चाहिए कि सैनिकों को घुसपैठ कर रहे लोगों पर सीधे गोली चलाने का आदेश दें। राजनीतिक दलों का नाम लेकर वक्तव्य देना उनका काम नहीं है।

भाजपा और संघ परिवार के लोगों की आपत्ति है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर मचलने वाले लोग जनरल को लक्ष्मण रेखा की नसीहत देने लगे हैं। लेकिन जो उन न्यायाधीशों को लक्ष्मण रेखा बता रहे थे, उन्हें तो जनरल साहब की लक्ष्मण रेखा याद रखनी चाहिए। फलाँ लोग फलाँ जगह गलत थे, इसलिए फलाँ साहब की गलती पर बात न की जाये, यह उचित तर्क नहीं है।

कुछ लोग तो घुसपैठ पर बात चलते ही परेशान हो जाते हैं। वोटबैंक की राजनीति करने वाले सांप्रदायिक नहीं लगते, इस पर सवाल उठाने वाले सांप्रदायिक हो जाते हैं। वोटबैंक की राजनीति के लिए अवैध घुसपैठ करा कर घुसपैठियों को पूरा राजनीतिक संरक्षण दिया जाता है, यह सर्वज्ञात सत्य है। इसके चलते राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा होता है, इस नाते यह सेना के विचार का विषय जरूर है। सेना प्रमुख ने केवल राजनीतिक दलों का नाम नहीं लिया होता तो वे निरर्थक राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनते। सीमा सुरक्षा का विश्लेषण राजनीतिक विश्लेषण की परिधि में न प्रवेश कर जाये, यह उन्हें ध्यान में रखना था। मुझे नहीं ध्यान आता कि इससे पहले किसी सेनाध्यक्ष ने अपने किसी वक्तव्य में राजनीतिक दलों का नाम लिया हो। सेना प्रमुख यदि केवल राजनीतिक दलों का नाम लेने से परहेज कर लेते तो बेहतर होता और मूल विषय पर सबका ध्यान जाता।

घोषित या अघोषित नियम यही है कि सेनाध्यक्ष राजनीति की परिधि में प्रवेश नहीं करते। सेना कभी राजनीतिक दलों की चर्चा नहीं करती। जनरल रावत के बयान को फिर से सुनिए। अगर उन्होंने केवल राजनीतिक दलों के नाम और मत प्रतिशत वगैरह की चर्चा नहीं की होती, व्यर्थ का विवाद नहीं पैदा होता। तब अवैध घुसपैठ से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे के संबंध में उनकी चिंता पर ही चर्चा होती। राजनीतिक दलों का नाम लेकर उन्होंने बहस का केंद्र-बिंदु ही बदल दिया। निश्चित रूप से यह उनका आशय नहीं रहा होगा। 

हालाँकि उनके इस बयान के बाद कुछ लोग तत्काल इस निष्कर्ष पर कूदने लगे हैं कि जनरल रावत सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में प्रवेश करेंगे। ऐसे लोग जनरल साहब को पद की गरिमा का ध्यान में रखने की नसीहत दे रहे हैं। इनसे यही कहूँगा कि अगर कभी जनरल साहब राजनीति में आयेंगे, तब उनके ऊपर आप भी राजनीतिक बातें कर लीजिएगा। अभी तो आप भी उनके पद की गरिमा का ख्याल रख लें हुजूर!

(देश मंथन, 23 फरवरी 2018)

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