संदीप त्रिपाठी 

कांग्रेस नेता, पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री, पूर्व क्रिकेटर, कॉमेडी शो के पूर्व जज नवजोत सिंह सिद्धू का पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ ग्रहण में जाना, वहाँ गुलाम कश्मीर के मुखिया के साथ बैठना और फिर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के गले लगना विवादों के घेरे में है। इस पूरे प्रकरण में में कई सवाल हैं।

क्या सिद्धू को पाक जाना चाहिए था

पहला सवाल तो यह है कि क्या सिद्धू को इमरान खान के बुलावे पर पाकिस्तान जाना चाहिए था? यहाँ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इमरान खान ने प्रधानमंत्री पद पर अपने शपथग्रहण कार्यक्रम मं  भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या नेता प्रतिपक्ष को आमंत्रण नहीं भेजा। यहाँ मैं कोविंद, मोदी, सुषमा या मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम नहीं दे रहा हूँ क्योंकि वैदेशिक मामलों में ये व्यक्ति नहीं, एक संवैधानिक पद है जिसका मान-सम्मान पूरे देश का मान-सम्मान है। स्पष्ट है कि इमरान खान अपने भाषणों में भारत के साथ रिश्ते बेहतर बनाने की लाख इच्छा प्रकट करें लेकिन उनकी आमंत्रण सूची ही उनकी मंशा को जाहिर कर देती है।

इमरान ने भारत से तीन लोगों को आमंत्रण दिया। ये तीनों ही – सुनील गावस्कर, कपिल देव और नवजोत सिंह सिद्धू - पूर्व क्रिकेटर हैं। यानी यह आमंत्रण व्यक्तिगत था, इमरान अपने शपथग्रहण में भारत को शामिल करना नहीं चाहते थे। सुनील गावस्कर और कपिल देव ने इस आमंत्रण को नजरअंदाज कर दिया क्योंकि उन्होंने इसे व्यक्तिगत तौर पर लेने की बजाय देश के स्तर पर देखा। एक बात और, गावस्कर और कपिल इमरान के समकालीन थे जबकि नवजोत सिंह सिद्धू काफी कनिष्ठ खिलाड़ी थे। इसके साथ ही गावस्कर और कपिल किसी संवैधानिक पद पर भी नहीं हैं और न ही भारत की विदेश नीति के बारे में विस्तृत जानकारी होने की उनसे अपेक्षा की जाती है।

लेकिन सिद्धू का मामला अलग है। सिद्धू वर्ष 2004 से तीन बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके हैं और एक बार राज्यसभा के। वर्ष 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विधायक चुने गये और पंजाब सरकार में मंत्री बने। यह सब बताने का मंतव्य सिर्फ यह बताना है कि सिद्धू फिलहाल एक संवैधानिक पद पर हैं और 14 वर्ष के राजनीतिक सफर के बाद उनसे इतनी अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे वैदेशिक, खास कर पाकिस्तान के मामले में राजनीतिक संकेतों का अर्थ समझते होंगे। साथ ही, चाहे सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की या किसी अन्य मोर्चे की, पाक के प्रति भारत की नीति स्पष्ट रही है और जिसे आम तौर पर देश का हरेक जागरूक नागरिक जानता है कि पाकिस्तान पहले सीमापार आतंकवाद पर रोक लगाये, तब आगे की बातचीत हो सकती है। गावस्कर, कपिल इस बात को समझते हैं, हालाँकि वे राजनीति में नहीं रहे, लेकिन संवैधानिक पद पर होने के नाते सिद्धू तो यह समझते होंगे। इसीलिए सिद्धू का पाकिस्तान जाना अखरता है।

निजी हैसियत से गये या गुडविल एंबेसडर के रूप में

सिद्धू एक तरफ यह कहते हैं कि वे अमन और मोहब्बत के दूत (गुडविल एंबेसडर) के रूप में भारत की ओर से पाकिस्तान गये थे तो उन्हें बताना चाहिए कि उन्हें किसने अधिकृत किया? यह सही है कि दोनों देशों के बीच विवादों को शांत करने के लिए बैक चैनल या चैनल टू के माध्यम से बातचीत होती रहती है। लेकिन इसमें शामिल लोग पर्दे पर नहीं होते बल्कि पर्दे के पीछे काम करते हैं और उन्हें हरी झंडी भी दोनों देशों की सरकारें ही दिखाती हैं। लेकिन सिद्धू तो इस काम के लिए नहीं गये थे। फिर सिद्धू और उनकी पार्टी कांग्रेस यह भी कहती है कि सिद्धू एक दोस्त की हैसियत से निजी तौर पर गये थे। पहले तो सिद्धू यह तय कर लें कि वे शांति और मोहब्बत का पैगाम लेकर एक दूत के रूप में गये या एक दोस्त की हैसियत से। हालाँकि दोनों ही रूप में उनका जाना एक परिपक्व व्यवहार नहीं कहा जा सकता।

देश शोकाकुल, सिद्धू समारोह में

तीसरा सवाल समय का है। जिस समय सिद्धू पाकिस्तान जाते हैं, पूरा देश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन से शोकाकुल था। उनकी मृत्यु पर सात दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया था। राजकीय शोक की स्थिति में देश ही नहीं, विदेशों में भी भारतीय दूतावासों, उच्चायोगों में राष्ट्रीय ध्वज को आधा झुकाया जाता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय भोज भी रद कर दिये जाते हैं। ऐसे में संवैधानिक पद पर बैठे सिद्धू का एक समारोह, वह भी पाकिस्तान जैसे शत्रुभाव रखने वाले देश के समारोह में शिरकत करना राष्ट्रीय शोक की अवहेलना करने जैसा है। 

पाक कूटनीति के जाल में फँसे गुरू

इसके बाद आते हैं पाकिस्तान में सिद्धू के साथ हुई घटनाओं की। सिद्धू इमरान के शपथग्रहण समारोह में प्रथम पंक्ति में बैठाये गये थे। उन्हें गुलाम कश्मीर के राष्ट्रपति मसूद खान के बगल में बैठाय़ा गया था। यह एक तरह का अपमान था। सिद्धू चाहते तो इसका प्रतिकार कर सकते थे लेकिन यहाँ सिद्धू को संदेह का लाभ दिया जा सकता है कि एक तो कहाँ बैठना है, यह तय करना सिद्धू के हाथ में नहीं था, दूसरे संभव है, वे गुलाम कश्मीर के राष्ट्रपति को पहचानते न हों। हालाँकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए ऐसी चूकें क्षम्य नहीं होतीं। पाकिस्तान ने उन्हें गुलाम कश्मीर के राष्ट्रपति का बगलगीर बनाया तो यह उसकी कूटनीति थी।

पाक जनरल से गले मिलने की सफाई और फँसा रही

लेकिन जो सबसे बड़ा विवाद है, वह पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा से गले मिलने का है। यहाँ सिद्धू बुरी तरह फँस रहे हैं। उनकी अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता भी इस मुद्दे पर न सिर्फ सिद्धू से दूरी बना रहे हैं बल्कि उन पर प्रहार भी कर रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने भी कहा कि ‘सिद्धू यदि मुझसे पूछते तो मैं उन्हें पाकिस्तान जाने से रोकता। वे दोस्ती के नाते गये हैं, लेकिन दोस्ती देश से बड़ी नहीं है। सीमा पर हमारे जवान मारे जा रहे हैं और ऐसे में पाक सेना के चीफ को सिद्धू का गले लगाना गलत संदेश देता है।‘ पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी कहा कि जब सीमा पर पाकिस्तानी फायरिंग में रोजाना भारत के जवान शहीद हो रहे हों तो सिद्धू पाकिस्तानी जनरल के साथ झप्पी से बच सकते थे। पाक जनरल को गले लगाना सही नहीं था। जम्मू एवं कश्मीर के कांग्रेस अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर ने कहा, नवजोत सिंह सिद्धू पार्टी के अहम नेता और जिम्मेदार व्यक्ति हैं। इस मसले पर सिर्फ वही बोल सकते हैं। लेकिन, उन्हें इससे बचना चाहिए था।

इस पर सिद्धू का कहना है कि ‘पाक जनरल आकर उनसे गले मिले और कहा कि हम एक ही संस्कृति के हैं, गुरुनानक देव के 550वें प्रकाश वर्ष पर 2019 में वे भारत-पाक के बीच करतारपुर मार्ग खोलना चाहते हैं। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए।‘ यहाँ बहुत मासूम बन रहे हैं सिद्धू। सिद्धू कह सकते थे कि सीमापार आतंकवाद पर रोक लगाइये और सीमा पर जो पाकिस्तानी सेना रोजाना गोलाबारी कर रही है, यहाँ तक कि नागरिक ठिकानों पर भी गोले दाग रही है, उसे रोक दीजिये। ऐसा नहीं है कि सिद्धू यह जानते नहीं थे। अब वह गुरुनानक देव का नाम बीच में लाकर अपनी गलती को ढकने और साथ में सिख वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कह के सिद्धू यह भी साबित कर रहे हैं कि करतारपुर मार्ग खुल जाये तो वे प्रसन्न होंगे, भले ही पाक की ओर से भारत में आतंकी गतिविधियाँ बदस्तूर जारी रहें और सीमा पर पाकिस्तानी गोलाबारी से हमारे जवान शहीद होते रहें।

और सिद्धू क्या सोचते हैं? पाकिस्तानी जनरल यह नहीं जानता होगा कि करतारपुर मार्ग खोलने के मुद्दे पर भारत में सिद्धू की संवैधानिक स्थिति क्या है? यह मार्ग खोलने की बात करने के लिए भारत सरकार से बात करनी होगी या एक राज्य के किसी मंत्री से जो देश की ओर से नहीं, एक दोस्त के समारोह में देशवासियों की भावना के विपरीत निजी हैसियत से आया है। सिद्धू जी! जान लीजिये कि न तो इमरान ने आपको बुलावा महज दोस्त की हैसियत से दिया था और न ही पाकिस्तानी जनरल इतना सरल और सद्भावनापूर्ण है जैसा कि आप बता रहे हैं। सिद्धू यह भी कहते हैं कि अगर भारत एक कदम बढ़ाये तो पाकिस्तान दो कदम बढ़ाने को तैयार है। यानी सिद्धू जी की नजर में भारत एक कदम नहीं बढ़ा रहा है, इसीलिए पाकिस्तान दो कदम नहीं बढ़ा पा रहा है। सिद्धू जी! पहले यह तय कर लीजिये कि आप किसकी तरफ हैं – भारत की तरफ या पाकिस्तान की तरफ।

(देश मंथन, 20 अगस्त 2018) 

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