राजीव रंजन झा : 

एक दवा है एचसीक्यूएस। मलेरिया के इलाज में काम आती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बोल दिया कि इससे कोरोना के मरीज ठीक हो रहे हैं। भाई लोगों ने पक्ष-विपक्ष दोनों में मोर्चा खोल दिया। 

जिनको ट्रंप से चिढ़ थी, वे एचसीक्यूएस को नकारने में जुट गये। विरोधी एचसीक्यूएस को राम-बाण बताने में जुट गये। फिर चूँकि एचसीक्यूएस की आपूर्ति का मुख्य स्रोत भारत ही है, तो लोग इस हिसाब से भी मोर्चेबंदी करने लगे। क्यों दे दिया, एक्सपोर्ट क्यों खोल दिया, यहाँ के मरीजों के लिए बचा कर रखना था, वगैरह-वगैरह। 

रेमडेसिविर दवा का उपयोग कोरोना के इलाज में होने की खबर आयी। कोई हल्ला नहीं मचा। किसी ने चुनौती नहीं दी। इसका जेनेरिक रूप हाल में एक भारतीय कंपनी ने भी पेश कर दिया। कोई हल्ला-गुल्ला नहीं हुआ। न पक्ष में न विपक्ष में। ठीक है, दवा आयी तो कितनी असरदार है यह डॉक्टर देखें। 

फिर एक फैबिफ्लू दवा आ गयी भारतीय कंपनी की। यहाँ भी सोशल मीडिया वीरों ने मोर्चे नहीं खोले। दरअसल रेमडेसिविर या फैबिफ्लू की खबर में कोई ट्रंप का ऐंगल नहीं था, मोदी या बाबा रामदेव नहीं थे, तो लोगों ने खबर की वैसी चीड़-फाड़ नहीं की। मसला दवा का नहीं है, मसला ट्रंप को, मोदी को, या बाबा को सही-गलत साबित करने का है। 

अब बाबा रामदेव की कंपनी ने कोरोनिल प्रस्तुत की, तो इसकी खबर आने के साथ ही सब भिड़े पड़े हैं। कोई कह रहा है कि बाबा व्यापारी है, आपदा में अवसर देख रहा है। कोई सवाल उठा रहा है कि किसने अनुमति दी, किसने परीक्षण किया। कोई निढाल है कि देखो, आखिर दुनिया को परित्राण आयुर्वेद ने ही दिलाया। कोई कह रहा है कि आयुर्वेद पर तो पूरा भरोसा है, लेकिन बाबा पर नहीं। सब अपनी-अपनी पूर्व-मान्यताओं के हिसाब से मोर्चा खोले बैठे हैं। 

जितने लोग फेसबुक-ट्विटर पर भिड़े पड़े हैं, उनमें से किसी से इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल की रिपोर्ट नहीं पढ़ी होगी। किसी को इस बात पर ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं हो रही कि इस आयुर्वैदिक दवा का बाकायदा क्लीनिकल परीक्षण हुआ है, और उसका पूरा विवरण सामने रखा गया है। आयुर्वैदिक दवाओं का क्लीनिकल परीक्षण करना एक स्वागत-योग्य नया रुझान है। अब तक जितनी आयुर्वैदिक दवाएँ बाजार में आती हैं, वे केवल पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हैं। लेकिन यदि बाबा रामदेव की कंपनी आयुर्वैद पर आधारित किसी दवा को क्लीनिकल परीक्षण के रास्ते से बाजार में लाती है तो बिना किसी प्रमाण के उसे खारिज करने की उछल-कूद मचाना भी एक बड़ा अंधविश्वास ही है। इसे खारिज करने वालों का एक बड़ा तर्क यही है कि अरबो-खरबों डॉलर के कारोबार वाला वैश्विक एलोपैथिक दवा उद्योग जब सारी दुनिया में कोरोना की दवा खोज रहा है, तो हमारे देश में एक बाबा की कंपनी इसकी दवा कैसे बना ले सकती है! 

कुछ लोग कह रहे हैं कि बाबा की यह दवा वेंटिलेटर पर जा चुके मरीजों को दी जाये और अगर उन्हें फायदा न हो तो बाबा रामदेव पर मुकदमा चलाया जाये। लेकिन यही बात क्या वे फैबिफ्लू के लिए कहेंगे, जिसका 14 दिनों का पूरा कोर्स है? फैबिफ्लू के लिए तो विशेषज्ञ डॉक्टर बता रहे हैं कि अगर संक्रमण होने के बिल्कुल शुरुआती दो-चार दिनों में ही यह दवा शुरू कर दी जाये, तभी फायदा होगा, वरना नहीं। तो क्या यही फेसबुकीय योद्धा बोलेंगे कि फैबिफ्लू को कोरोना की दवा कहने पर रोक लगायी जाये और इस कंपनी के कर्ता-धर्ताओं पर मुकदमा कर दिया जाये? 

जो लोग कोरोनिल की खबर आते ही इसके विरोध में टूट पड़े हैं, उन्हें आप मुख्यतः इन खाँचों में रख सकते हैं – स्थायी मोदी-भाजपा विरोधी, योग-आयुर्वेद आदि पर भरोसा न करने वाले या चिढ़ने वाले (चिढ़ के कई कारण हो सकते हैं), पाश्चात्य चिकित्सा प्रणाली के अंधभक्त जो मानते हैं कि इसके अलावा बाकी सभी चिकित्सा पद्धतियाँ कूड़ा हैं, कोरोना की विकरालता को अपने मन में इतना बिठा चुके लोग, जिन्हें विश्वास ही नहीं हो सकता कि इसकी दवा भारत में तैयार की जा सकती है और वह भी आयुर्वैदिक पद्धति से। 

कोरोनिल का क्लीनिकल परीक्षण सही तरीके से हुआ या नहीं हुआ, यह बात कहने के अधिकारी फेसबुकीय योद्धा कहाँ से हो गये? जो संस्था क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति देती है, वही इसे सही या गलत बता सकती है। बाबा रामदेव ने बताया है कि उन्होंने सीटीआरआई से बाकायदा अनुमति लेकर क्लीनिकल परीक्षण किया है। क्लीनिकल परीक्षण हुआ या नहीं हुआ, सही तरीके से हुआ या गलत हुआ, इसकी समीक्षा चिकित्सा क्षेत्र के विद्वान कर सकते हैं। न मैं इसके सही होने का प्रमाण-पत्र दे सकता हूँ, न फेसबुकीय योद्धा इसे गलत ठहराने के योग्य हैं। 

आयुष मंत्रालय को पतंजलि की इस दवा को कुछ चुने हुए अस्पतालों में उपयोग में ला कर उसके परिणाम देखने चाहिए। जितनी भी एलोपैथिक दवाएँ कोरोना के इलाज में काम आ रही हैं, उनमें भी यही तरीका अपनाया गया। पहले कुछ जगहों पर इस्तेमाल करके देखा गया और समझा गया कि कौन-सी दवा किन स्थितियों में कारगर है, किन स्थितियों में लाभप्रद नहीं हो रही। फेसबुकीय योद्धा समझें कि यह सेक्युलर और सांप्रदायिक होने का प्रमाण-पत्र नहीं है, जिसे वे बड़े आराम से बाँटते फिरते हैं। दवा कारगर होने या न होने का प्रमाण-पत्र देने के अधिकारी जो लोग हैं, उन्हीं को यह काम करने दीजिए।

आयुष मंत्रालय ने पतंजलि को आदेश दे दिया है कि वह कोरोनिल से कोरोना के उपचार के अपने दावे को प्रमाणित करे। मंत्रालय ने पतंजलि को इस दवा का विज्ञापन करने से भी रोक दिया है। अब यह बाबा रामदेव और उनकी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद के ऊपर है कि वे कैसे मंत्रालय को अपने दावे के बारे में आश्वस्त करते हैं। यदि मंत्रालय उनके दावों को स्वीकार करेगा तो स्पष्ट रूप से चिकित्सकीय प्रमाणों के आधार पर ही, और अगर नकार देगा तो उसके आधार भी चिकित्सकीय ही होंगे। मगर धारणा के आधार पर मैदान में कूद पड़े फेसबुकीय योद्धाओं से अनुरोध है कि अपनी तलवारें वापस म्यान में रखें, यह उनका मोर्चा नहीं है। 

(देश मंथन, 23 जून 2020)

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