राजीव रंजन झा : 

यदि बाबा रामदेव अपनी दवा का नाम कोरोना के आधार पर कोरोनिल रखने के बदले कुछ अलग रखते, इसे कोरोना की दवा कहने के बदले रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा (इम्युनिटी बूस्टर) कहते, तो इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ होता। दवा तो उनकी तब भी बिक जाती। आज के माहौल में सुपरहिट ही रहती।

फिर अगर उन्होंने बाकायदा पहले से घोषित करके एक संवाददाता सम्मेलन में टीवी चैनलों पर सीधे प्रसारण के बीच यह दावा किया कि यह कोरोना की दवा है, रोकथाम नहीं बल्कि उपचार (क्योर) करती है, तो उन्हें इस दावे के साथ जुड़े खतरों के बारे में भी पता होगा। क्या अपने राजनीतिक संपर्कों (जो पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ के बड़े नेताओं से हैं) पर अति-आत्मविश्वास था, जिसके चलते उन्होंने इस खतरे की अनदेखी कर दी? या उन्हें अपनी तैयारियों पर पूरा विश्वास था कि जो भी सवाल उठेंगे उन सबका जवाब देने में वे सफल रहेंगे?

इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर आज हमारे पास नहीं हो सकता, हम केवल कयास लगा सकते हैं। ठीक उसी तरह से, जैसे हम कोरोना की दवा तैयार कर लेने के बाबा रामदेव के दावे की पुष्टि या खंडन करने के उचित अधिकारी नहीं हैं। यह खंडन या पुष्टि आईसीएमआर और आयुष मंत्रालय की ओर से ही हो सकती है। 

और अगर वैश्विक दवा उद्योग (एलोपैथिक) का भी इतिहास देखें, तो क्लीनिकल परीक्षण और तमाम नियामक स्वीकृतियों के बाद बाजार में उतारी जाने वाली बहुत-सी दवाओं पर आगे भी वाद-विवाद चलते रहते हैं। बाजार में आने वाली नयी दवाओं के असर को लेकर, किसी अन्य दवा के साथ उनकी तुलना को लेकर अध्ययन होते रहते हैं। यहाँ तो बाबा का नाम ही काफी है विवाद पैदा करने के लिए। 

इसलिए आईसीएमआर या आयुष मंत्रालय की ओर से अंततः जो भी निर्णय होगा, उसके बाद भी मुझे लगता है कि यह विषय विवादों से मुक्त नहीं रहेगा। अगर इस दवा से कोरोना का इलाज होने के दावे को मान लिया गया, तो बाबा के विरोधी, आयुर्वेद के विरोधी और मोदी-भाजपा के विरोधी इसे स्वीकार नहीं करेंगे। उनकी नजर में यह बाबा और भाजपा की नजदीकी का परिणाम होगा। 

वहीं अगर इस दवा से कोरोना के मरीज ठीक होने के दावे को खारिज कर दिया गया, इसे कोरोना की दवा बता कर बेचने से मना कर दिया गया, तो मोदी सरकार पर यह आरोप भी लग सकता है कि वह गेट्स फाउंडेशन के दबाव में आ गयी, या वैश्विक दवा लॉबी के दबाव में आ गयी। 

एक और बात समझने की है। कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि इस दवा का परीक्षण गंभीर रोगियों पर किया ही नहीं गया। मगर दवाओं के क्षेत्र में यह कोई नयी बात नहीं लगती। ऐसी काफी बीमारियाँ हैं, जिनके अलग-अलग चरणों के लिए अलग-अलग दवाएँ होती हैं। इनमें कोई एक दवा केवल आरंभिक चरण के लिए उपयुक्त होती है, पर बीमारी गंभीर हो जाने पर नहीं दी जाती। वहीं कोई दूसरी दवा आरंभिक चरण में नहीं दी जाती, बीमारी गंभीर हो जाने पर ही दी जाती है। 

अभी कोरोना के इलाज के लिए जो फैबिफ्लू दवा बाजार में आयी है, वह भी केवल आरंभिक चरण में शुरू कर दिये जाने पर ही प्रभावी बतायी जा रही है। यह भी मूलतः कोरोना की दवा नहीं है, कोविड-19 वायरस फैलने के पहले से खोजी हुई दवा है, लेकिन प्रयोगों के आधार पर यह पाया गया कि आरंभिक दिनों में ही कोरोना के मरीजों को इसे देने पर लाभ मिलता है। मगर जिस तरह का हल्ला-गुल्ला कोरोनिल पर मचा, वैसा फैबिफ्लू पर नहीं मचा। उसके कारण स्पष्ट हैं। हल्ला मचाने वाले ज्यादातर लोगों को बाबा से दिक्कत है, आयुर्वेद से दिक्कत है। 

यदि आयुष मंत्रालय या आईसीएमआर यह पाता है कि कोरोनिल से कोरोना का उपचार होने के दावे की पुष्टि करने में बाबा रामदेव और उनके पतंजलि आयुर्वेद ने प्रक्रियाओं का ठीक से पालन नहीं किया है या उनके आँकड़े पर्याप्त नहीं हैं तो उन्हें नये सिरे से सरकारी निगरानी में क्लीनिकल परीक्षण पूरा करने का निर्देश दिया जाना चाहिए और तब तक इस दवा की बिक्री पर रोक लगी रहनी चाहिए। 

संभवतः विस्तृत परीक्षणों में यह भी देखा जा सकता है कि क्या यह दवा केवल गैर-लाक्षणिक (एसिंप्टोमैटिक) कोरोना मरीजों के लिए ही लाभप्रद है या लाक्षणिक मरीजों को भी इससे लाभ मिल पाता है। आगे यह परीक्षण भी हो सकता है कि क्या ऑक्सीजन या वेंटिलेटर समर्थन पर रखे गये मरीजों को भी यह दवा देने से कुछ मदद मिलती है या नहीं। 

बाबा रामदेव ने कोरोनिल के क्लीनिकल परीक्षण के बारे में जितनी जानकारी दी है, उसे जाने-समझे बगैर भी काफी लोग तलवारें भाँज रहे हैं। कोई कह रहा है कि बाबा को कोरोना के मरीज कहाँ से मिले होंगे, उन्होंने बस यूँ कि कुछ लोगों को पकड़ लिया होगा जिनकी कोरोना जाँच नहीं हुई होगी। मगर परीक्षण के लिए चुने गये लोगों के बारे में स्वयं बाबा रामदेव ने स्पष्ट बताया है कि उनके क्लीनिकल परीक्षण 15 से 60 आयु वर्ग के ऐसे मरीजों पर हुए, जिनको कोरोना होने की पुष्टि आरटी-पीसीआर टेस्ट से हो चुकी थी। ऐसे 100 लोगों को उनकी सहमति से चुना गया था, जिनमें से चार लोगों ने बाद में सहमति वापस ले ली। इसमें ऐसे लोगों को नहीं रखा गया था जिनमें कोरोना के लक्षण बहुत ही गंभीर थे, जिन्हें साँस की तकलीफ काफी बढ़ गयी थी, या अन्य को-मॉर्बिड दशाओं के कारण जीवन-प्रत्याशा एक वर्ष से कम रह गयी थी। बाबा रामदेव स्वयं यह भी बता चुके हैं कि जल्द ही आगे दूसरा परीक्षण गंभीर रूप से बीमार मरीजों पर किया जायेगा। 

कोरोनिल के क्लीनिकल परीक्षण में आये एक शब्द पर भी चिकित्सा-क्षेत्र से संबंध न रखने वाले कुछ विद्वान काफी उछले हैं। यह शब्द है प्लेसिबो ग्रुप स्टडी। इस शब्द को उछाल कर वे बताना चाह रहे हैं कि कोरोनिल से फायदा नहीं हुआ होगा, बल्कि इस धारणा से ही मरीजों में सुधार आ गया होगा कि हम दवा खा रहे हैं। मगर रामदेव यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने 100 लोगों का जो समूह बनाया, उनमें पचास मरीजों को आयुर्वेदिक दवाएँ दी गयीं, जबकि बाकी मरीजों को प्लेसिबो रखा गया यानी उनको आयुर्वेदिक दवाएँ नहीं दी गयीं। यहाँ प्लेसिबो का मतलब यह है कि आधे लोगों को दवा नहीं दी गयी। विद्वानों ने कुछ और ही मतलब निकालना शुरू कर दिया। 

अगर आयुष मंत्रालय और आईसीएमआर की जाँच में यह पाया जाये कि इस दवा से इलाज में मदद तो मिलती है, लेकिन यह अपने-आप में पर्याप्त नहीं है, तो फिर इसे कोरोना की दवा के रूप में मान्यता देने के बदले रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा के रूप में मान्यता दी जाये और इसका नाम कोरोनिल से बदल कर कुछ और रखे जाने का निर्देश दिया जा सकता है। वहीं यदि ऐसा पाया जाये कि उनके दावे सरासर हवा-हवाई हैं और बिल्कुल अमान्य हैं, तो फिर दंडात्मक कार्रवाई भी होनी चाहिए। 

लेकिन इनमें से कौन-सा कदम उठाया जाना ठीक है, यह उचित जाँच के बाद आयुष मंत्रालय या आईसीएमआर ही तय कर सकता है। इस समय जो लोग ताल ठोक कर बाबा को जेल भिजवाने की बातें कर रहे हैं, और जो लोग यह कोरस गा रहे हैं कि वाह वाह, बाबा ने दवा खोज ली, वे दोनों ही हवाबाजी कर रहे हैं। 

(देश मंथन, 24 जून 2020)

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