अभी जिंदा हैं बदलाव की संभावनाएँ!

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श्रीकांत प्रत्यूष, संपादक, प्रत्यूष नवबिहार :

स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री द्वारा लोक लुभावन घोषणाएँ की जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी इसी तरह की उम्मीद देश को थी। दरअसल प्रभु वर्ग जरुरी फैसले कम लोकप्रिय फैसले ज्यादा लेता है।

इसलिए उससे ऐसे मौकों पर उसके द्वारा जरुरी नहीं बल्कि गैर-जरुरी और लोकप्रिय घोषणाएँ किये जाने की परंपरा रही है। मोदी से भी कुछ ऐसी ही उम्मीदें की जा रही थीं। लेकिन अगर मोदी ने पहले के सभी प्रधानमंत्रियों की तरह स्वतंत्रता दिवस के दिन लोकप्रिय की जगह जरुरी घोषणाएँ की हैं, तो उसका स्वागत होना चाहिए। देश को बतौर प्रधानमंत्री अपने पहले संबोधन में मोदी पुरानी परम्पराओं को निभाने की बजाय एक नयी परंपरा की शुरुआत करते नजर आये। मोदी ने बड़ी बड़ी परियोजनाओं और लोकप्रिय घोषणाओं की बजाय कुछ मामूली घोषणाएँ करते नजर आये।

मसलन डस्ट फ्री इंडिया, डिजिटल इंडिया, सुशासन। देखने सुनने में छोटी लगने वाली ये घोषणाएँ बड़े परिवर्तन की वाहक बन सकती हैं। वैसे भी वर्षों तक लटकी रहने वाली और कभी पूरी नहीं होने वाली योजनाओं से फायदा कम नुकसान ज्यादा होता रहा है। मोदी की घोषणाएँ छोटी हैं लेकिन उन्हें बहुत तेजी से अमलीजामा पहनाया जा सकता है। मोदी ने अपने को देश का प्रधान सेवक बताने और देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए अपनी जान लड़ा देने का वायदा करते हुए कहा कि अगर देश के सभी सवा सौ करोड़ लोग अगर एक कदम आगे बढ़ायेंगे तो देश सवा सौ कदम आगे बढ़ जायेगा। 

एक साल के अन्दर सभी स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग अलग शौचालय बनाने का मोदी सरकार लक्ष्य बहुत मायने रखता है। आज देश के स्तर फीसदी सरकारी स्कूलों में पीने के लिए पानी और शौचालय की व्यवस्था नहीं है। स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था नहीं होने के कारण आज भी करोड़ों गाँव देहात की लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। लड़कियों के लिए हर स्कूल में अलग से शौचालय बनाये जाने से महिला साक्षरता का दर तेजी से बढ़ेगा।

वैसे भी शौचालय का लोगों के स्वास्थ्य,शारीरिक बनावट और उनके कद काठी की लम्बाई चौड़ाई से भी गहरा सम्बन्ध है। एक रिसर्च के अनुसार यूरोपीय देश जहाँ सौ फीसदी घरों में शौचालय है, वहाँ के लोगों का स्वास्थ्य उनकी औसत शारीरिक लम्बाई उन देशों के लोगों से ज्यादा बेहतर हैं, जहाँ लोग खुले में शौच करते हैं। मोदी का नाम धर्म से भले ज्यादा जुड़ा है लेकिन ये उन्ही का नारा है -“शिवालय से ज्यादा जरुरी शौचालय।”

मोदी का दूसरा छोटा ऐलान जो बड़े परिवर्तन का वाहक बनेगा – स्वच्छ भारत -धुल रहित शहर-गाँव का है।  सुनने में यह मामूली बचकाना ऐलान भले लगे लेकिन अगर ये सच हो गया तो हमारा देश कैसा दिखेगा, जरा कल्पना कीजिये। हर गाँव शहर की गलियाँ, सड़कें पक्की होंगीं। वाहनों की तेज रफ्तार और आंधी तूफान भी डस्ट फ्री होगा। गाँव से ही जुड़ा एक और बड़ा ऐलान डिजिटल इंडिया का मोदी ने किया है। इस योजना के तहत इनफार्मेशन टेक्नोलोजी के जरिये देश के हर शहर के लोग हर गाँव के लोग आपस में जुड़ेंगे। अपनी समस्याओं, अपने विचार-सुझाव का आदान प्रदान करेंगे। पूरा देश इनफार्मेशन टेक्नोलोजी के जरिये आपस में जुड़ेगा तो एक जबरदस्त एकता कायम होगी।

इसी तरह से मोदी का तीसरा छोटा एलान लेकिन परिवर्तन का सबसे कारगर हथियार “प्रधानमंत्री जन धन योजना” है। इस योजना के तहत गाँव के हर गरीब का एक बैंक अकाउंट होगा। उस बैंक अकाउंट से पाँच हजार डेबिट की सुविधा होगी यानी डिजिटल इंडिया में भागीदार बनने के लिए गरीब अपने जीरो बैलेंस अकाउंट से पाँच हजार की रकम निकाल पायेगा। इतना ही नहीं इस बैंक अकाउंट के जरिये उसे एक लाख का जीवन बीमा की पालिसी भी मुफ्त में मिलेगी।

एक लम्बे अरसे के बाद देश में किसी एक पार्टी की बहुमत की सरकार बनी है और एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जो किसी का मुनीम नहीं बल्कि देश की जनता द्वारा चुना गया है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के तानाशाह होने का खतरा बढ़ जाता है।

साल 2002 के गोधरा दंगे की वजह से हमेशा विपक्ष के निशाने पर रहने वाले हिन्दू ह्रदय सम्राट मोदी ने तानाशाही की राह पर चलने की बजाय विपक्ष को साथ लेकर चलने और देश को साम्प्रदायिकता, जातीयवाद, प्रांतवाद से छुटकारा दिलाने का संकल्प देश के सामने लिया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए।

ये ओपन सीक्रेट है कि दंगे होते नहीं बल्कि करवाए जाते हैं। दंगे आम आदमी नहीं करता, बल्कि राजनीतिक दल द्वारा करवाये जाते हैं। ऐसे में अगर देश की सता पर काबिज हिन्दू राष्ट्रवाद की पक्षधर रही पार्टी अगर सर्व धर्म समभाव की बात कर रही है, तो उसे तुरंत खारिज कर देने की बजाय उसे अजमाया जाना चाहिए। आचार -विचार, स्वभाव, परंपरा और मान्यताएँ, दोस्ती-दुश्मनी कुछ भी स्थायी नहीं हैं समय के साथ बदलती रहती हैं फिर राजनीतिक पार्टियाँ और उसके नेता क्यों नहीं बदल सकते?

(देश मंथन, 18 अगस्त 2014)

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